सूर आयौ माथे पर, छाया आई पाँइन तर

नंददास

Pada 6

सूर आयौ माथे पर, छाया आई पाइँन तर, उतर ढरे पथिक डगर देखि छाँह गहरी । सोए सुकुमार लोग जोरि कै किंवार द्वार, पवन सीतल घोख मोख भवन भरत गहरी ॥ धंधी जन धंध छाँड़ि, जब तपत धूप डरन, पसु-पंछी जीव-जंतु छिपत तरुन सहरी । नंददास प्रभु ऐसे में गवन न कीजै कहुँ, माह की आधी रात जैसी ये जेठ की दुपहरी ॥
ऊधव के उपदेश सुनो ब्रज नागरीजुरि चली हें बधावन नंद महर घर