Bhagavad Gita · Chapter 13 · Verse 21

कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते।पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते।।13.21।।
kārya-kāraṇa-kartṛitve hetuḥ prakṛitir uchyate puruṣhaḥ sukha-duḥkhānāṁ bhoktṛitve hetur uchyate
साधक संजीवनी — स्वामी रामसुखदास
।।13.21।। व्याख्या --   [इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्रके विषयमें यच्च (जो है)? यादृक् च (जैसा है)? यद्विकारि (जिन विकारोंवाला है) और यतश्च यत् (जिससे जो उत्पन्न हुआ है) -- ये चार बातें सुननेकी आज्ञा दी थी। उनमेंसे यच्च का वर्णन पाँचवें श्लोकमें और यद्विकारि का वर्णन छठे श्लोकमें कर दिया। यादृक् च का वर्णन आगे इसी अध्यायके छब्बीसवेंसत्ताईसवें श्लोकोंमें करेंगे। अब यतश्च यत् का वर्णन करते हुए प्रकृतिसे विकारों और गुणोंको उत्पन्न हुआ बताते हैं। इसमें भी देखा जाय तो विकारोंका वर्णन पहले छठे श्लोकमें इच्छा द्वेषः आदि पदोंसे किया जा चुका है। यहाँ गुण प्रकृतिसे उत्पन्न होते हैं -- यह बात नयी बतायी है।बारहवेंसे अठारहवें श्लोकतक ज्ञेय तत्त्व(परमात्मा) का वर्णन है और यहाँ उन्नीसवेंसे चौंतीसवें श्लोकतक पुरुष(क्षेत्रज्ञ) का वर्णन है। वहाँ तो ज्ञेय तत्त्वके अन्तर्गत ही सब कुछ है और यहाँ पुरुषके अन्तर्गत सब कुछ है अर्थात् वहाँ ज्ञेय तत्त्वके अन्तर्गत पुरुष है और यहाँ पुरुषके अन्तर्गत ज्ञेय तत्त्व है। तात्पर्य यह है कि ज्ञेय तत्त्व (परमात्मा) और पुरुष (क्षेत्रज्ञ) -- दोनों तत्त्वसे दो नहीं हैं? प्रत्युत एक ही हैं।]प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि -- यहाँ प्रकृतिम्पद सम्पूर्ण क्षेत्र(जगत्)की कारणरूप मूल प्रकृतिका वाचक है। सात प्रकृतिविकृति (पञ्चमहाभूत? अहंकार और महत्तत्त्व) तथा सोलह विकृति (दस? इन्द्रियाँ? मन और पाँच विषय) -- ये सभी प्रकृतिके कार्य हैं और प्रकृति इन सबकी मूल कारण है।पुरुषम् पद यहाँ क्षेत्रज्ञका वाचक है? जिसको इसी अध्यायके पहले श्लोकमें क्षेत्रको जाननेवाला कहा गया है।प्रकृति और पुरुष -- दोनोंको अनादि कहनेका तात्पर्य है कि जैसे परमात्माका अंश यह पुरुष (जीवात्मा) अनादि है? ऐसे ही यह प्रकृति भी अनादि है। इन दोनोंके अनादिपनेमें फरक नहीं है किन्तु दोनोंके स्वरूपमें फरक है। जैसे -- प्रकृति गुणोंवाली है और पुरुष गुणोंसे सर्वथा रहित है प्रकृतिमें विकार होता है और पुरुषमें विकार नहीं होता प्रकृति जगत्की कारण बनती है और पुरुष किसीका भी कारण नहीं बनता प्रकृतिमें कार्य एवं कारणभाव है और पुरुष कार्य एवं कारणभावसे रहित है।उभौ एव कहनेका तात्पर्य है कि प्रकृति और पुरुष -- दोनों अलगअलग हैं। अतः जैसे प्रकृति और पुरुष अनादि हैं? ऐसे ही उन दोनोंका यह भेद (विवेक) भी अनादि है।इसी अध्यायके पहले श्लोकमें आये इदं शरीरं क्षेत्रम् पदोंसे मनुष्यशरीरकी तरफ ही दृष्टि जाती है अर्थात् व्यष्टि मनुष्यशरीरका ही बोध होता है और क्षेत्रज्ञः पदसे मनुष्यशरीरको जाननेवाले व्यष्टि क्षेत्रज्ञका ही,बोध होता है। अतः प्रकृति और उसके कार्यमात्रका बोध करानेके लिये यहाँ प्रकृतिम् पदका और मात्र क्षेत्रज्ञोंका बोध करानेके लिये यहाँ पुरुषम् पदका प्रयोग किया गया है।इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें क्षेत्रज्ञकी परमात्माके साथ एकता जाननेके लिये विद्धि पदका प्रयोग किया था और यहाँ पुरुषकी प्रकृतिसे भिन्नता जाननेके लिये विद्धि पदका प्रयोग किया गया है। तात्पर्य है कि मनुष्य स्वयंको और शरीरको एक समझता है? इसलिये भगवान् यहाँ विद्धि पदसे अर्जुनको यह आज्ञा देते हैं कि ये दोनों सर्वथा अलगअलग हैं -- इस बातको तुम ठीक तरहसे समझ लो।विकारांश्च गुणंश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् -- इच्छा? द्वेष? सुख? दुःख? संघात? चेतना और धृति -- इन सात विकारोंको तथा सत्त्व? रज और तम -- इन तीन गुणोंको प्रकृतिसे उत्पन्न हुए समझो। इसका तात्पर्य यह है कि पुरुषमें विकार और गुण नहीं हैं।सातवें अध्यायमें तो भगवान्ने गुणोंको अपनेसे उत्पन्न बताया है (7। 12) और यहाँ गुणोंको प्रकृतिसे उत्पन्न बताते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि वहाँ भक्तिका प्रकरण होनेसे भगवान्ने गुणोंको अपनेसे उत्पन्न बताया है और गुणमयी मायासे तरनेके लिये अपनी शरणागति बतायी है। परन्तु यहाँ ज्ञानका प्रकरण होनेसे गुणोंको प्रकृतिसे उत्पन्न बताया है। अतः साधक गुणोंसे अपना सम्बन्ध न मानकर ही गुणोंसे छूट सकता है।कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते -- आकाश? वायु? अग्नि? जल और पृथ्वी तथा शब्द? स्पर्श? रूप? रस और गन्ध -- इन दस(महाभूतों और विषयों)का नाम कार्य है। श्रोत्र? त्वचा? नेत्र? रसना? घ्राण? वाणी? हस्त? पाद? उपस्थ और गुदा तथा मन? बुद्धि और अहंकार -- इन तेरह(बहिःकरण और अन्तःकरण)का नाम करण है। इन सबके द्वारा जो कुछ क्रियाएँ होती हैं? उनको उत्पन्न करनेमें प्रकृति ही हेतु है।जो उत्पन्न होता है? वह कार्य कहलाता है और जिसके द्वारा कार्यकी सिद्धि होती है? वह करण कहलाता है अर्थात् क्रिया करनेके जितने औजार (साधन) हैं? वे सब करण कहलाते हैं। करण तीन तरहके होते हैं -- (1) कर्मेन्द्रियाँ? (2) ज्ञानेन्द्रियाँ और (3) मन? बुद्धि एवं अहंकार। कर्मेन्द्रियाँ स्थूल हैं? ज्ञानेन्द्रियाँ सूक्ष्म हैं और मन? बुद्धि एवं अहंकार अत्यन्त सूक्ष्म हैं। कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियोंको बहिःकरण कहते हैं तथा मन? बुद्धि और अहंकारको अन्तःकरण कहते हैं। जिनसे क्रियाएँ होती है? वे कर्मेन्द्रियाँ हैं और कर्मेन्द्रियों तथा ज्ञानेन्द्रियोंपर जो शासन करते हैं? वे मन? बुद्धि और अहंकार हैं। तात्पर्य है कि कर्मेन्द्रियोंपर ज्ञानेन्द्रियोंका शासन है? ज्ञानेन्द्रियोंपर मनका शासन है? मनपर बुद्धिका शासन है और बुद्धिपर अहंकारका शासन है। मन? बुद्धि और अहंकारके बिना कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ काम नहीं करतीं। ज्ञानेन्द्रियोंके साथ जब मनका सम्बन्ध हो जाता है? तब विषयोंका ज्ञान होता है। मनसे जिन विषयोंका ज्ञान होता है? उन विषयोंमेंसे कौनसा विषय ग्राह्य है और कौनसा त्याज्य है? कौनसा विषय ठीक है और कौनसा बेठीक है -- इसका निर्णय बुद्धि करती है। बुद्धिके द्वारा निर्णीत विषयोंपर अहंकार शासन करता है।अहंकार दो तरहका होता है -- (1) अहंवृत्ति और (2) अहंकर्ता। अहंवृत्ति किसीके लिये कभी दोषी नहीं होती? पर उस अहंवृत्तिके साथ जब स्वयं (पुरुष) अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है? तादात्म्य कर लेता है? तब वह अहंकर्ता बन जाता है। तात्पर्य है कि अहंवृत्तिसे मोहित होकर? उसके परवश होकर स्वयं उस अहंवृत्तिसे मोहित होकर? उसके परवश होकर स्वयं उस अहंवृत्तिमें अपनी स्थिति मान लेता है तो वह कर्ता बन जाता है -- अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते (गीता 3। 27)।प्रकृतिका कार्य बुद्धि (महत्तत्त्व) है और बुद्धिका कार्य अहंवृत्ति (अहंकार) है। यह अहंवृत्ति है तो बुद्धिका कार्य? पर इसके साथ तादात्म्य करके स्वयं बुद्धिका मालिक बन जाता है अर्थात् कर्ता और भोक्ता बन जाता है -- पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् (गीता 13। 21)। परन्तु जब तत्त्वका बोध हो जाता है? तब स्वयं न कर्ता बनता है और न भोक्ता ही बनता है -- शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते (गीता 13। 31)। फिर कर्तृत्वभोक्तृत्वरहित पुरुषके शरीरद्वारा जो कुछ क्रियाएँ होती हैं? वे सब क्रियाएँ अहंवृत्तिसे ही होती हैं। इसी अहंवृत्तिके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको गीतामें कई तरहसे बताया गया है जैसे -- प्रकृतिके द्वारा ही सब क्रियाएँ होती हैं। (13। 29) प्रकृतिके गुणोंद्वारा ही सब क्रियाएँ होती हैं (3। 27) गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं (3। 28) गुणोंके सिवाय दूसरा कोई कर्ता नहीं है (14। 19) इन्द्रियाँ ही अपनेअपने विषयोंमें बरत रही हैं (5। 9) आदि। तात्पर्य है कि बहिःकरण और अन्तःकरणके द्वारा जो क्रियाएँ होती हैं? वे सब प्रकृतिसे ही होती हैं।पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते -- अनुकूल परिस्थितिके आनेपर सुखी (राजी) होना -- यह सबका भोग है और प्रतिकूल परिस्थितिके आनेपर दुःखी (नाराज) होना -- यह दुःखका भोग है। यह सुखदुःखका भोग पुरुष(चेतन)में ही होता है -- प्रकृति(जड)में नहीं क्योकि जड प्रकृतिमें सुखीदुःखी होनेकी सामर्थ्य नहीं है। अतः सुखदुःखके भोक्तापनमें पुरुष हेतु कहा गया है। अगर पुरुष अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितियोंसे मिलकर राजीनाराज न हो तो वह सुखदुःखका भोक्ता नहीं बन सकता।सातवें अध्यायके चौथेपाँचवें श्लोकोंमें भगवान्ने अपरा (जड) और परा (चेतन) नामसे अपनी दो प्रकृतियोंका वर्णन किया है। ये दोनों प्रकृतियाँ भगवान्के स्वभाव हैं? इसलिये ये दोनों स्वतः ही भगवान्की ओर जा रही हैं। परन्तु परा प्रकृति (चेतन)? जो परमात्माका अंश है और जिसकी स्वाभाविक रुचि परमात्माकी ओर जानेकी ही है? तात्कालिक सुखभोगमें आकर्षित होकर अपरा प्रकृति(जड)के साथ तादात्म्य कर लेता है। इतना ही नहीं? प्रकृतिके साथ तादात्म्य करके वह प्रकृतिस्थ पुरुषके रूपमें अपनी एक स्वतन्त्र सत्ताका निर्माण कर लेता है (गीता 13। 21)? जिसको अहम् कहते हैं। इस अहम् में जड और चेतन दोनों हैं। सुखदुःखरूप जो विकार होता है? वह जडअंशमें ही होता है? पर जडसे तादात्म्य होनेके कारण उसका परिणाम ज्ञाता चेतनपर होता है अर्थात् जडके सम्बन्धसे सुखदुःखरूप विकारको चेतन अपनेमें मान लेता है कि मैं सुखी हूँ? मैं दुःखी हूँ। जैसे? घाटा लगता है दूकानमें? पर दूकानदार कहता है कि मुझे घाटा लग गया। ज्वर शरीरमें आता है? पर मान लेता है कि मेरेमें ज्वर आ गया। स्वयंमें ज्वर नहीं आता (टिप्पणी प0 696)? यदि आता तो कभी मिटता नहीं।सुखदुःखका परिणाम चेतनपर होता है? तभी वह सुखदुःखसे मुक्ति चाहता है। अगर वह सुखीदुःखी न हो? तो उसमें मुक्तिकी इच्छा हो ही नहीं सकती। मुक्तिकी इच्छा जडके सम्बन्धसे ही होती है क्योंकि जडको स्वीकार करनेसे ही बन्धन हुआ है। जो अपनेको सुखीदुःखी मानता है? वही सुखदुःखरूप विकारसे अपनी मुक्ति चाहता है और उसीकी मुक्ति होती है। तात्पर्य है कि तादात्म्यमें मुक्ति(कल्याण) की इच्छामें चेतनकी मुख्यता और भोगोंकी इच्छामें जडकी मुख्यता होती है? इसलिये अन्तमें कल्याणका भागी चेतन ही होता है? जड नहीं।विकृतिमात्र जडमें ही होती है? चेतनमें नहीं। अतः वास्तवमें सुखीदुःखी होना चेतनका धर्म नहीं है? प्रत्युत जडके सङ्गसे अपनेको सुखीदुःखी मानना ज्ञाता चेतनका स्वभाव है। तात्पर्य है कि चेतन सुखीदुःखी होता नहीं? प्रत्युत (सुखाकारदुःखाकार वृत्तिसे मिलकर) अपनेको सुखीदुःखी मान लेता है। चेतनमें एकदूसरेसे विरुद्ध सुखदुःखरूप दो भाव हो ही कैसे सकते हैं दो रूप परिवर्तनशील प्रकृतिमें ही हो सकते हैं। जो परिवर्तनशील नहीं है? उसके दो रूप नहीं हो सकते। तात्पर्य यह है कि सब विकार परिवर्तनशीलमें ही हो सकते हैं। चेतन स्वयं ज्योंकात्यों रहते हुए भी परिवर्तनशील प्रकृतिके संगसे उसके विकारोंको अपनेमें आरोपित करता रहता है। यह सबका अनुभव भी है कि हम सुखमें दूसरे तथा दुःखमें दूसरे नहीं हो जाते। सुख और दुःख दोनों अलगअलग हैं? पर हम एक ही रहते हैं इसीलिये कभी सुखी होते हैं और कभी दुःखी होते हैं। सम्बन्ध --   पूर्वश्लोकमें भगवान्ने पुरुषको सुखदुःखके भोगनेमें हेतु बताया। इसपर प्रश्न होता है कि कौनसा पुरुष सुखदुःखका भोक्ता बनता है इसका उत्तर अब भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।
Sri Anandgiri
।।13.21।।श्लोकान्तरं प्रश्नोत्तरत्वेनावतारयति -- यदिति। निमित्तं वक्तुमादौ संसारित्वमस्याविद्यैक्याध्यासादित्याह -- पुरुष इति। यस्मात्प्रकृतिमात्मत्वेन गतस्तस्माद्भुङ्क्त इति योजना। गुणविषयं भोगमभिनयति -- सुखीति। अविद्याया भोगहेतुत्वात्किं कारणान्वेषणयेत्याशङ्क्याह -- सत्यमपीति। सङ्गस्य जन्मादौ संसारे प्रधानहेतुत्वे मानमाह -- स यथेति। उक्तेऽर्थे द्वितीयार्धमवतार्य व्याचष्टे -- तदेतदित्यादिना। साध्याहारं योजनान्तरमाह -- अथवेति। सदसद्योनीर्विविच्य व्याचष्टे -- सद्योनय इति। योनिद्वयनिर्देशान्मध्यवर्तिन्यो मनुष्ययोनयोऽपि ध्वनिता इत्याह -- सामर्थ्यादिति। सङ्गस्य संसारकारणत्वे नाविद्यायास्तत्कारणत्वमेकस्मादेव हेतोस्तदुपपत्तेरित्याशङ्क्याह -- एतदिति। अविद्योपादानं सङ्गो निमित्तमित्युभयोरपि कारणत्वं सिध्यतीत्यर्थः। द्विविधहेतूक्तेर्विवक्षितं फलमाह -- तच्चेति। सासङ्गस्याज्ञानस्य स्वतोऽनिवृत्तेस्तन्निवर्तकं वाच्यमित्याशङ्क्याह -- अस्येति। वैराग्ये सति संन्यासस्तत्पूर्वकं च ज्ञानं सासङ्गाज्ञाननिवर्तकमित्यर्थः। उक्ते ज्ञाने मानमाह -- गीतेति। अध्यायादौ चोक्तं ज्ञानमुदाहृतमित्याह -- तच्चेति। तदेव ज्ञानं यज्ज्ञात्वेत्यादिना न सत्तन्नासदित्यन्तेनान्यनिषेधेन सर्वतःपाणिपादमित्यादिना चातद्धर्माध्यासेनोक्तमित्याह -- यज्ज्ञात्वेति।
Sri Dhanpati
।।13.21।।के पुनर्विकारा गुणाश्च प्रकृतिसंभवा इत्याकाङ्क्षायां तान्यदर्शयन् प्रकृतेः संसारहेतुत्वं दर्शयति -- कार्येति। कार्यं शरीरम्। कार्यग्रहणेन शरीरारम्भकाणि भूतानि विषयाश्च गृह्यन्ते। करणानि देहस्थानि। ज्ञानेन्द्रियपञ्चकं कर्मेन्द्रियपञ्चकं मनो बुद्धिरहंकारश्चेति त्रयोदश। करणग्रहणेन करणाश्रितत्वात्सुघदुःखमोहात्मका गुणा गृह्यन्ते। तेषां कार्यकरणानां कर्तत्वे उत्पादकत्वे प्रकृतिरारम्भकत्वेन हेतुः कारणमुच्यते। एवं कार्यकरणकर्तृत्वेन संसारस्य कारणं प्रकृतिरुक्ता। कार्यकारणकर्तृत्वे इति पाठेप्ययमेवार्थः। यद्वा एकादशेन्द्रियाणि प़ञ्चविषयाः षोडशविकाराः कार्यं महानहंकारो भूततन्मात्राणि पञ्चेति सप्तप्रकृतिविकृतयः कारणं तेषां कर्तत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते इत्यर्थः। एवमपरप्रकृतेः संसारकारणत्वं प्रदर्श्य,परप्रकृतेस्तत्कारणत्वं दर्शयति। पुरुषः जीवः क्षेत्रज्ञः सुखदुःखानां भोग्यानां भोक्तृत्वे उपलब्धृत्वे हेतुरुच्यते। तथाच कार्यकारणसुखदुःस्वरुपेण हेतुफलात्मना प्रकृतेः परिणामाभावे पुरुषस्य च चेतनस्य तदुपलब्धृत्वेऽसति संसारो न संभवतीत्यतः प्रकृतिपुरुषयोः कार्यकारणकर्तृत्वेन सुखदुःभोक्तृत्वेन च संसारकारणत्वमिति। संसारश्च सुखदुःखभोगः पुरुषस्य च सुखदुःखानां भोक्तृत्वं संसारित्वं। अन्ये तु यथाभाष्यं व्याख्यातमित्युक्त्वा वर्णयन्ति। यद्वा पुरुषस्य कार्यत्वे कारणत्वे कर्तत्वे च प्रकृतिरेव पुरुषतादात्म्यं प्राप्ता हेतुर्भवति। तथा प्रकृतेः सुखदुःखभोक्तृत्वे स्वच्छायाप्रदाने पुरुषः कारणं कार्यत्वादयः प्राकृतदेहेन्द्रियबुद्धिधर्माः सन्तश्चिदात्मन्यारोप्यन्ते गौरोहममुष्य पुत्रोऽहं काणोऽहं खञ्जोऽहं करोभ्यमकार्षमहमिति तथा चिच्छायापन्ना बुद्धिः तेचयाम्यहं सुखदुःखादीनुपालमे इति मन्यत। सायं प्रकृतिपुरुषोरन्योन्यधर्माध्यासः संसारस्य कारणमित्युपपादितं भवति। सांख्याभिमतं पुरुषस्य भोक्तृत्वमपि निरस्तं भवति। अन्यथा प्रकृतिः कर्त्री पुरुषो भोक्तेति कर्तृत्वभोक्तृत्वयोर्वैयदिकण्यमापद्येत। नच भोक्तुर्निर्विकारित्वमपि वक्तुं शक्यमिति। अत्रेदमवधेयम्। यथा मूलं व्याख्यानकर्तृ़णां सर्वज्ञानां भाष्कृतां व्याख्याने सांख्यमतस्येश्वरानधिष्ठितं जडं प्रधानं कर्तृ चेतनश्च भोक्तेत्येवंरुपस्य नास्ति प्रवेशः प्रकृतिरीश्वरस्य हि विकारकारणशक्तिस्त्रिगुणात्मिका माया पुरुषः जीवः क्षेत्रज्ञ इत्येवं तैरुक्तत्वात्। उत्तरश्लोके पुरुषो भोक्ता प्रकृतिस्थः प्रकृतावविद्यालक्षणायां स्थिति इत्यादिवक्ष्यमाणत्वाच्च। तताचाविद्यैक्याध्यासादात्मनो भोक्तृत्वेन संसारित्वमिति वस्तुतो निर्विकारत्वं दुर्निवारम्। यद्यपि प्रकृतिस्थस्य कर्तृत्वभोक्तृत्वे तथापि कर्तृत्वे उपाधिप्राधान्यात्पृकृतेः कर्तृत्वमुच्यते। भोक्तृत्वे तूपहितस्य प्राधान्याज्जीवस्य भोक्तृत्वमतो न वैयधिकरण्यदोषोऽपीत्यादिसर्वं भाष्यादेव लभ्यत इत्यतोऽध्याहारेण क्लिष्टकल्पनया च भाष्यातिरिक्तव्याख्यानप्रदर्शनं नोचितमिति। एतेन कार्यं यज्ञब्रह्महत्यादि कारणं पुरोडाशखङ्गादि कर्तृत्वं साधनप्रयोक्तृत्वं तच्च तच्चेति द्वन्द्वे एकवद्भावः। हेतुः प्रकृतिरुच्यते एवं चेत्प्रकृतेरेव स्वर्गनरकादि भवेन्न जीवस्य। तथाच बन्धाभावान्न मोक्षे जीवानां प्रयत्नः स्यादित्यत आह। पुरुषइत्यादिकाः पूर्वोत्तरप्रकरणानुरोधविनिर्मुक्ता भाष्यबहिर्भूताः कल्पना निराकृता वेदितव्याः।
Sri Madhavacharya
।।13.21।।कार्यं शरीरम्।शरीरं कार्यमुच्यते इत्यभिधानम्। कारणानीन्द्रियाणि भोगोऽनुभवः। स हि चिद्रूपत्वादनुभवति। प्रकृतिश्च जडत्वात्परिणामिनी।कार्यकारणकर्त्तृत्वे कारणं प्रकृतिं विदः। भोक्तृत्वे सुखदुःखानां पुरुषं प्रकृतेः परम् [3।26।8] इति भागवते।
Sri Neelkanth
।।13.21।।उभयोरपि संसारं प्रति कारणत्वे द्वारमाह -- कार्येति। कार्यं शरीरं तदारम्भकाणि भूतानि विषयाश्च। कारणं त्रयोदशेन्द्रियाणि तदाश्रिताश्च सुखदुःखमोहात्मका गुणाश्च। करणेतिपाठेऽपि स एवार्थः। एतयोः कार्यकारणयोः कर्तृत्वे निमित्ते सति कर्तृत्वेनेत्यर्थः। हेतुः संसारस्य कारणं प्रकृतिर्भवति। तथा पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वेन संसारस्य हेतुरिति। यदि हि कार्यकारणसुखदुःखस्वरूपहेतुफलात्मना प्रकृतिर्न परिणमेत तदा पुरुषः किमुपलभेत। अनुपलब्ध्वा वा कथं संसारी स्यात्। अनुपलब्धृका वा प्रकृतिः कुत्रोपयुज्येत। तस्मादुपलभ्योपलब्धृसंयोगः संसारकारणमिति यथाभाष्यं व्याख्यातम्। यद्वा पुरुषस्य कार्यत्वे कारणत्वे कर्तृत्वे च प्रकृतिरेव पुरुषतादात्म्यं प्राप्ता हेतुर्भवति। वह्नितादात्म्यं प्राप्तं लोहं वह्नेश्चतुष्कोणत्वादाविव हेतुर्भवति? तथा प्रकृतेः सुखदुःखभोक्तृत्वे स्वच्छायाप्रदानेन पुरुषः कारणम् वह्निरिव लोहस्य स्वच्छायाप्रदानेन दग्धृत्वे। तथाहि कार्यत्वादयः प्राकृतदेहेन्द्रियबुद्धिधर्माः सन्तश्चिदात्मन्यारोप्यन्ते गौरोऽहममुष्यपुत्रोऽहं काणोऽहं खञ्जोऽहं करोम्यहमकार्षमहमिति। तथा चिच्छायापन्ना बुद्धिश्चेतयाम्यहं सुखदुःखादीनुपलभे इति मन्यते। सोऽयं प्रकृतिपुरुषयोरन्योन्यधर्माध्यासः संसारस्य कारणमित्युपपादितं भवति। सांख्याभिमतं पुरुषस्य भोक्तृत्वमपि निरस्तं भवति। अन्यथा प्रकृतिः कर्त्री पुरुषो भोक्तेति कर्तृत्वभोक्तृत्वयोर्वैयधिकरण्यमापद्येत। न च भोक्तुः पुरुषस्य निर्विकारत्वमपि वक्तुं शक्यमित्यन्यत्र विस्तरः। द्वन्द्वान्ते श्रूयमाणं पदं प्रत्येकमभिसंबध्यत इति त्वप्रत्ययस्य पूर्वाभ्यामपि संबन्धे कार्यत्वं कारणत्वं कर्तृत्वं चेति विग्रहः द्वन्द्वैकवद्भावश्चप्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनभावे प्रथमा इत्यादिवत्।
Sri Ramanujacharya
।।13.21।।गुणशब्दः स्वकार्येषु औपचारिकः? स्वतःस्वानुभवैकसुखः पुरुषः प्रकृतिस्थः प्रकृतिसंसृष्टः प्रकृतिजान् गुणान् प्रकृतिसंसर्गौपाधिकान् सत्त्वादिगुणकार्यभूतान् सुखदुःखादीन् भुङ्क्ते अनुभवति।प्रकृतिसंसर्गहेतुम् आह -- पूर्वपूर्वप्रकृतिपरिणामरूपदेवमनुष्यादियोनिविशेषेषु स्थितः अयं पुरुषः तत्तद्योनिप्रयुक्तसत्त्वादिगुणमयेषुसुखदुःखादिषु सक्तः तत्साधनहेतुभूतेषु पुण्यपापकर्मसु प्रवर्तते? ततः तत्पुण्यपापफलानुभवाय सदसद्योनिषु साध्वसाधुयोनिषु जायते। ततः च कर्म आरभते? ततः च जायते? यावद् अमानित्वादिकान् आत्मप्राप्तिसाधनभूतान् गुणान् न सेवते? तावद् एव संसरति? तदिदम् उक्तम् -- कारणं गुणसङ्गः अस्य सदसद्योनिजन्मसु। इति।
Sri Sridhara Swami
।।13.21।।विकाराणां प्रकृतिसंभवत्वं दर्शयन्पुरुषस्य संसारहेतुत्वं दर्शयति -- कार्यकारणेति। कार्यं शरीरम्? कारणानि सुखदुःखसाधनानीन्द्रियाणि? तेषां कर्तृत्वे तदाकारपरिणामे प्रकृतिर्हेतुरुच्यते कपिलादिभिः। पुरुषो जीवस्तत्कृतसुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते। अयं भावःयद्यप्यचेतनायाः प्रकृतेः स्वतः कर्तृत्वं न संभवति? तथा पुरुषस्याप्यविकारिणो भोक्तृत्वं न संभवति? तथापि कर्तृत्वं नाम क्रियानिर्वर्तकत्वम् तच्चाचेतनस्यापि चेतनादृष्टवशाच्चैतन्याधिष्ठितत्वात्संभवति। यथा वह्नेरूर्ध्वज्वलनम्? वायोस्तिर्यग्गमनम्? वत्सादृष्टवशात्स्तन्यपयसः क्षरणमित्यादि। अतः पुरुषसंनिधानात्प्रकृतेः कर्तृत्वमुच्यते। भोक्तृत्वं च सुखदुःखसंवेदनम्। तच्चेतनधर्म एवेति संनिधानात्पुरुषस्य भोक्तृत्वमुच्यत इति।
Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha
।।13.21।।अथान्योन्यसंसृष्टयोः प्रकृतिपुरुषयोः संसर्गविशेषनिबन्धनो व्यापारभेद उच्यते -- कार्यकारण इति श्लोकेन।कार्यं शरीरमिति। प्रकरणात् कारणशब्दस्य समभिव्याहाराच्च अत्र कार्यशब्दो भोगायतनाख्यकार्यविशेषपर इति भावः।इन्द्रियाणि दशैकं च [13।6] इति इन्द्रियादिप्रकृतविषयोऽत्र कारणशब्द इत्याहज्ञानकर्मात्मकानीति। एतेनकार्यं भूततन्मात्ररूपेण दशविधम् कारणं बुद्ध्यहङ्काररूपेण त्रयोदशविधम् तेषां स्वरूपोत्पत्तौ प्रतिक्षणपरिणामे च हेतुर्मूलप्रकृतिः इत्यादिव्याख्यानान्तराणि निरस्तानि।कार्यकरणकर्तृत्वे इति (शं.) परोक्तं पाठान्तरमप्रसिद्धेरनादृतम्। कर्तृशब्दोऽत्र न प्रयत्नाद्याश्रयत्वपरः? अचेतने तदसम्भवात् अतो यथास्वं व्यापारश्रयत्वं विवक्षितमित्याह -- तेषां क्रियाकारित्व इति। यद्यप्यबुद्धिपूर्वेषु केषुचिन्मनश्श्रोत्रादिव्यापारेषु पुरुषेच्छाधीनत्वं नास्ति? तथापि तेषां पुरुषभोगार्थत्वात् भोक्तृत्वदशापन्नपुरुषसन्निधानरूपमधिष्ठानमपेक्षितम् बाहुल्येन च प्रयत्नाधीनत्वमस्तीत्यभिप्रायेणाहपुरुषाधिष्ठितेति। विभज्य व्यापारनिर्देशात्प्रकृतिरेवेत्यवधारणलाभः।ननु पुरुषाधिष्ठिता प्रकृतिरित्ययुक्तं? प्रलयदशायां करणकलेवरविधुरस्य संसारिणः स्वेच्छया प्रकृत्यधिष्ठानासम्भवादित्यत्राहपुरुषाधिष्ठितक्षेत्राकारपरिणतेति। भोगतत्साधनयोराश्रयत्वलक्षणं हेतुत्वमिह विविच्यत इत्यभिप्रायेण प्रकृत्याश्रयत्वादिकथनम्। प्रकृतेः कर्तृत्वेकर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात् [ब्र.सू.2।3।33] इत्यादिभिः सूत्रैर्विरोधः स्यादित्यत्राहपुरुषस्याधिष्ठातृत्वमेवेति। यदि पुरुषस्याधिष्ठातृत्वमात्रं? तदा साक्षात्कर्तृत्वं प्रकृतेरेवेति पुरुषस्य कर्तृत्वमौपचारिकं स्यादित्यत्राहशरीराधिष्ठानेति।अयमभिप्रायः -- न हि प्रयत्नाधीनपरिस्पन्दाश्रयत्वलक्षणं कर्तृत्वं पुरुषस्य सूत्र्यते तत्र शास्त्रार्थवत्त्वादिहेतूनामन्यथासिद्धेः नच शरीरादिप्रेरकप्रयत्नाश्रयत्वे कर्तृशब्दस्यौपचारिकता? कृतिप्रयत्नयोः पर्यायत्वात्कृत्याश्रयत्वरूपत्वाच्च कर्तृत्वस्य। ततश्चान्यत्रैव कर्तृत्वमौपचारिकमिति फलितम्। यदि पुनर्यथास्वं व्यापाराश्रयत्वमेव सर्वेषां कर्तृत्वमित्युच्यते तथापि पुरुषस्य कर्तृत्वं मुख्यमेव।ननुपुरुषः सुखदुःखानां भोक्ता इत्ययुक्तम्? शुद्धस्य पुरुषस्य प्रियाप्रियविधुरत्वश्रुतेः। यद्यपि मोक्षे विलक्षणं सुखमनुभूयते? तथापि दुःखप्रसङ्गस्तु नास्त्येवेत्यत्राह -- प्रकृतिसंसृष्ट इति। नह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति [छां.उ.8।12।1] इत्यपि श्रूयत इति भावः। विषयेन्द्रियादिरूपेण परिणतायाः प्रकृतेरपि भोक्तृत्वे हेतुत्वमस्ति तत्कथं पुरुषो विशिष्य निर्दिश्यते इत्यत्राहसुखदुःखानुभवाश्रय इति। तत्कालस्वसमवेतसुखदुःखसाक्षात्कारो भोग इति भोगलक्षणमप्यनेन सूचितम्। एतेन निर्विकारपुरुषसन्निधानात् प्रकृतेरेव भोक्तृत्वमिति पक्षो निरस्तः। तदापुरुषोऽस्ति भोक्तृभावात् [सां.का.17]पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य [सां.का.21] इत्यादिस्वग्रन्थविरोधश्च। अयं हि पक्षः शारीरकेरचनानुपपत्तेश्च [ब्र.सू.2।2।1] इत्यारभ्यविप्रतिषेधाच्चासमञ्जसम् [ब्र.सू.2।2।10] इत्यन्तैः सूत्रैर्विस्तरेण प्रतिक्षिप्तः। अत्र च श्लोके यदि प्रकृतेरेव भोक्तृत्वमपि विवक्षितं स्यात्? तदा कर्तृत्वे भोक्तृत्वे च प्रकृतिरेव हेतुरिति वक्तव्यम् नतु विवेक्तव्यम् भोक्तृत्वस्यापि कर्तृत्वविशेषत्वात्?शास्त्रफलं प्रयोक्तरि [पू.मी.3।7।10] इति न्यायाच्च।न च वाच्यं कर्तृत्वं प्रकृतेः स्वतस्सिद्धं? भोक्तृत्वे तु तस्याः पुरुषो हेतुरिति प्रदर्शनाय विवेक इति पुरुषनिरपेक्षायाः केवलायाः प्रकृतेः कर्तृत्वस्याप्ययोगादनभ्युपगमाच्च। अन्यथा विशुद्धकेवलज्ञानोदयेऽपि तेन निवृत्तप्रसवामर्थवशात्सप्तरूपविनिवृत्ताम् [सां.का.65] इत्युक्तसप्तरूपविनिवृत्तिभङ्गप्रसङ्गात्। तथाच मुक्तावपि यथापूर्वमेव प्रकृतिप्रवृत्तिः स्यात्।सङ्घातपरार्थत्वात्ित्रगुणादिविपर्ययादधिष्ठानात्। पुरुषोऽस्ति भोक्तृभावात्कैवल्यार्थप्रवृत्तेश्च।।जननमरणकरणानां प्रतिनियमादयुगपत्प्रवृत्तेश्च। पुरुषबहुत्वं सिद्धं त्रैगुण्यविपर्यया(च्चैव)च्च।।[सां.का.1718] इत्यधिष्ठानायुगपत्प्रवृत्तिभ्यां पुरुषतद्बहुत्वकल्पनं च भज्येत। अत्रपुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान्
Sri Abhinavgupta
।।13.20 -- 13.23।।एतल्लक्षणं कृत्वा परीक्षा क्रियते -- प्रकृतिमित्यादि पर इत्यन्तम्। प्रकृतिरप्यनादिः (?N कार्यकारणप्रकृतिरप्यनादिः) कारणान्तराभावात्। ,विकाराः पटादयः। प्रकृतिरिति कार्यकारणभावे हेतुः। पुरुषस्तु प्रधान्यात् भोक्ता। प्रकृतिपुरुषयोः पङ्ग्वन्धवत् किलान्योन्यापेक्षा वृत्तिः। अत एवास्य [पुरुषस्य] शास्त्रकृद्भिः नानाकारैर्नामभिरभिधीयते रूपम् उपद्रष्टा इत्यादिभिः। अयमत्र तात्पर्यार्थः -- प्रकृतिः तद्विकारः? चतुर्दशविधः सर्गः? तथा पुरुषः? एतत्सर्वम् अनादि नित्यं च ब्रह्मतत्वाच्छुरितत्वे सति तदनन्यत्वात्।
Sri Jayatritha
।।13.21।।कारणानामपि कार्यत्वात् पृथगुक्तिर्व्यर्थेत्यतो रूढिमाश्रित्य कार्यकारणशब्दौ व्याख्याति -- कार्यमिति।भोक्तृत्वे इत्यत्र प्रकृत्यर्थो भोगोऽभ्यवहारादिसुखादिविषयो न सम्भवति? अत आह -- भोग इति। स्वीयतया साक्षात्कार इत्यर्थः। भोगः प्रकृतेरेव न पुरुषस्य? अतःपुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुः इति कथमुक्तं इति साङ्खयाः। तत्राह -- स हीति। न तु प्रकृतिः? अचैतन्यादिति शेषः। ननुकार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिः इत्युक्तम्? कर्तृत्वं च ज्ञानेच्छाप्रत्यययोगः तत्कथं प्रकृतेर्भोगासम्भवः इत्यत आह -- प्रकृतिश्चेति। चस्त्वर्थः परिणामिकारणत्वात्कर्तृत्वमित्युपचर्यत इति भावः। श्लोकार्थे पुराणसम्मतिमाह -- कार्येति।कारणं विदुः इत्त्युत्तरार्धेऽनुवर्तते।
Sri Madhusudan Saraswati
।।13.21।।विकाराणां प्रकृतिसंभवत्वं विवेचयन् पुरुषस्य संसारहेतुत्वं दर्शयति -- कार्येति। कार्यं शरीरं करणानीन्द्रियाणि तत्स्थानि त्रयोदश देहारम्भकाणि भूतानि। विषयाश्चेह कार्यग्रहणेन गृह्यन्ते। गुणाश्च सुखदुःखमोहात्मकाः करणाश्रयत्वात्करणग्रहणेन गृह्यन्ते। तेषां कार्यकरणानां कर्तृत्वे तदाकारपरिणामे हेतुः कारणं प्रकृतिरुच्यते महर्षिभिः। कार्यकारणेति दीर्घपाठेपि स एवार्थः। एवं प्रकृतेः संसारकारणत्वं व्याख्याय पुरुषस्यापि यादृशं तत्तदाह -- पुरुष इति। पुरुषः क्षेत्रज्ञः परा प्रकृतिरिति प्राग्व्याख्यातः स सुखदुःखानां सुखदुःखमोहानां भोग्यानां सर्वेषामपि भोक्तृत्वे वृत्त्युपरक्तोपलम्भे हेतुरुच्यते।
Sri Purushottamji
।।13.21।।एतदेव विशदयति -- कार्येति। कार्यस्य स्वरसानुभवात्मकस्य कारणानि देहगुणादीनि तेषां कर्तृत्वे प्रकटकरणे हेतुः प्रकृतिः पूर्वोक्तरूपा शक्तिरुच्यते। तथैव पुरुषः सुखदुःखानां सङ्गमविरहात्मकादीनां भोक्तृत्वे तद्रसज्ञत्वे हेतुः कारणमुच्यते।
Sri Shankaracharya
।।13.21।। --,कार्यकरणकर्तृत्वे -- कार्यं शरीरं करणानि तत्स्थानि त्रयोदश। देहस्यारम्भकाणि भूतानि पञ्च विषयाश्च प्रकृतिसंभवाः विकाराः पूर्वोक्ताः इह कार्यग्रहणेन गृह्यन्ते। गुणाश्च प्रकृतिसंभवाः सुखदुःखमोहात्मकाः करणाश्रयत्वात् करणग्रहणेन गृह्यन्ते। तेषां कार्यकरणानां कर्तृत्वम् उत्पादकत्वं यत् तत् कार्यकरणकर्तृत्वं तस्मिन् कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः कारणम् आरम्भकत्वेन प्रकृतिः उच्यते। एवं कार्यकरणकर्तृत्वेन संसारस्य कारणं प्रकृतिः। कार्यकारणकर्तृत्वे इत्यस्मिन्नपि पाठे? कार्यं यत् यस्य विपरिणामः तत् तस्य कार्यं विकारः विकारि कारणं तयोः विकारविकारिणोः कार्यकारणयोः कर्तृत्वे इति। अथवा? षोडश विकाराः कार्यं सप्त प्रकृतिविकृतयः कारणम् तान्येव कार्यकारणान्युच्यन्ते तेषां कर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिः उच्यते? आरम्भकत्वेनैव। पुरुषश्च संसारस्य कारणं यथा स्यात् तत् उच्यते -- पुरुषः जीवः क्षेत्रज्ञः भोक्ता इति पर्यायः? सुखदुःखानां भोग्यानां भोक्तृत्वे उपलब्धृत्वे हेतुः उच्यते।।कथं पुनः अनेन कार्यकरणकर्तृत्वेन सुखदुःखभोक्तृत्वेन च प्रकृतिपुरुषयोः संसारकारणत्वमुच्यते इति? अत्र उच्यते -- कार्यकरणसुखदुःखरूपेण हेतुफलात्मना प्रकृतेः परिणामाभावे? पुरुषस्य च चेतनस्य असति तदुपलब्धृत्वे? कुतः संसारः स्यात् यदा पुनः कार्यकरणसुखदुःखस्वरूपेण हेतुफलात्मना परिणतया प्रकृत्या भोग्यया पुरुषस्य तद्विपरीतस्य भोक्तृत्वे न अविद्यारूपः संयोगः स्यात्? तदा संसारः स्यात् इति। अतः यत् प्रकृतिपुरुषयोः कार्यकरणकर्तृत्वेन सुखदुःखभोक्तृत्वेन च संसारकारणत्वमुक्तम्? तत् युक्तम्। कः पुनः अयं संसारो नाम सुखदुःखसंभोगः संसारः। पुरुषस्य च सुखदुःखानां संभोक्तृत्वं संसारित्वमिति।।यत् पुरुषस्य सुखदुःखानां भोक्तृत्वं संसारित्वम् इति उक्तं तस्य तत् किं निमित्तमिति उच्यते --,
Sri Vallabhacharya
।।13.21।।सृष्ट्यां तयोः कार्यभेदमाह -- कार्येति। कार्यं बन्धमोक्षरूपं? तस्य कारणरूपा विकारा गुणाश्च एतेषां कर्त्तृत्वे समुत्पादकत्वे पुरुषाधिष्ठिता प्रकृतिर्हेतुः?प्रकृतिसम्भवान् [13।20] इत्युक्तत्वात्। पुरुषस्य तु तदन्तश्चेतयितृत्वमेव तदपेक्षयाऽधिकंकर्त्ता शास्त्रार्थवत्वात् [ब्र.सू.2।3।33] इत्यादिसूत्रोक्तं क्षेत्राधिष्ठानप्रयत्नहेतुत्त्वमेव पुरुषस्य कर्तृत्वं प्राकृतवदभ्युपगम्यते। स तु तत्संसृष्टस्तदुद्भूतानां सुखदुःखानां,भोक्तृत्वे हेतुः सुखदुःखाद्यनुभवाश्रयः। यद्यप्युभयं क्षेत्रधर्म इति वक्तव्यं तथापि विक्रियाया जडावसानत्वात् क्षेत्रप्राधान्यं भोगस्य चिदवसानत्वदर्शनाच्चेतनाप्राधान्यमित्यर्थः।