Bhagavad Gita · Chapter 15 · Verse 1
श्री भगवानुवाचऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।15.1।।
śhrī-bhagavān uvācha
ūrdhva-mūlam adhaḥ-śhākham aśhvatthaṁ prāhur avyayam
chhandānsi yasya parṇāni yas taṁ veda sa veda-vit
साधक संजीवनी — स्वामी रामसुखदास
।।15.1।। व्याख्या ऊर्ध्वमूलमधःशाखम् -- [तेरहवें अध्यायके आरम्भके दो श्लोकोंकी तरह यहाँ पन्द्रहवें अध्यायके पहले श्लोकमें भी भगवान्ने अध्यायके सम्पूर्ण विषयोंका दिग्दर्शन कराया है और ऊर्ध्वमूलम् पदसे परमात्माका? अधःशाखम् पदसे सम्पूर्ण जीवोंके प्रतिनिधि ब्रह्माजीका तथा अश्वत्थम् पदसे संसारका संकेत करके (संसाररूप अश्वत्थवृक्षके मूल) सर्वशक्तिमान् परमात्माको यथार्थरूपसे जाननेवालेको वेदवित् कहा है।]साधारणतया वृक्षोंका मूल नीचे और शाखाएँ ऊपरकी ओर होती हैं परन्तु यह संसारवृक्ष ऐसा विचित्र वृक्ष है कि इसका मूल ऊपर तथा शाखाएँ नीचेकी ओर हैंजहाँ जानेपर मनुष्य लौटकर संसारमें नहीं आता? ऐसा भगवान्का परमधाम ही सम्पूर्ण भौतिक संसारसे ऊपर (सर्वोपरि) है। संसारवृक्षकी प्रधान शाखा (तना) ब्रह्माजी हैं क्योंकि संसारवृक्षकी उत्पत्तिके समय सबसे पहले ब्रह्माजीका उद्भव होता है। इस कारण ब्रह्माजी ही इसकी प्रधान शाखा हैं। ब्रह्मलोक भगवद्धामकी अपेक्षा नीचे है। स्थान? गुण? पद? आयु आदि सभी दृष्टियोंसे परमधामकी अपेक्षा निम्न श्रेणीमें होनेके कारण ही इन्हें अधः (नीचेकी ओर) कहा गया है (टिप्पणी प0 742.1)। यह संसाररूपी वृक्ष ऊपरकी ओर मूलवाला है। वृक्षमें मूल ही प्रधान होता है। ऐसे ही इस संसाररूपी वृक्षमें परमात्मा ही प्रधान हैं। उनसे ब्रह्माजी प्रकट होते हैं? जिनका वर्णन अधःशाखम् पदसे हुआ है।सबके मूल प्रकाशक और आश्रय परमात्मा ही हैं। देश? काल? भाव? सिद्धान्त? गुण? रूप? विद्या आदि सभी दृष्टियोंसे परमात्मा ही सबसे श्रेष्ठ हैं। उनसे ऊपर अथवा श्रेष्ठकी तो बात ही क्या है? उनके समान भी दूसरा कोई नहीं है (टिप्पणी प0 742.2) (गीता 11। 43)। संसारवृक्षके मूल सर्वोपरि परमात्मा हैं। जैसे मूल वृक्षका आधार होता है? ऐसे ही परमात्मा सम्पूर्ण जगत्के आधार हैं। इसीलिये उस वृक्षको ऊर्ध्वमूलम् कहा गया है।मूलशब्द कारणका वाचक है। इस संसारवृक्षकी उत्पत्ति और इसका विस्तार परमात्मासे ही हुआ है। वे परमात्मा नित्य? अनन्त और सबके आधार हैं तथा सगुणरूपसे सबसे ऊपर नित्यधाममें निवास करते हैं? इसलिये वे ऊर्ध्व नामसे कहे जाते हैं। यह संसारवृक्ष उन्हीं परमात्मासे उत्पन्न हुआ है? इसलिये इसको ऊपरकी ओर मूलवाला (ऊर्ध्वमूल) कहते हैं।वृक्षके मूलसे ही तने? शाखाएँ? कोंपलें निकलती हैं। इसी प्रकार परमात्मासे ही सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न होता है? उन्हींसे विस्तृत होता है और उन्हींमें स्थित रहता है। उन्हींसे शक्ति पाकर सम्पूर्ण जगत् चेष्टा करता है (टिप्पणी प0 742.3)। ऐसे सर्वोपरि परमात्माकी शरण लेनेसे मनुष्य सदाके लिये कृतार्थ हो जाता है। (शरण लेनेकी बात आगे चौथे श्लोकमें तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये पदोंमें कही गयी है)।सृष्टिरचनाके लिये ब्रह्माजी प्रकृतिको स्वीकार करते हैं। परन्तु वास्तवमें वे (प्रकृतिसे सम्बन्धरहित होनेके कारण) मुक्त हैं। ब्रह्माजीके सिवाय दूसरे सम्पूर्ण जीव प्रकृति और उसके कार्य शरीरादिके साथ अहंताममतापूर्वक जितनाजितना अपना सम्बन्ध मानते हैं? उतनेउतने ही वे बन्धनमें पड़े हुए हैं और उनका बारबार पतन (जन्ममरण) होता रहता है अर्थात् उतनी ही शाखाएँ नीचेकी ओर फैलती रहती हैं। सात्त्विक? राजस और तामस -- ये तीनों गतियाँ अधःशाखम् के ही अन्तर्गत हैं (गीता 14। 18)।अश्वत्थम् -- अश्वत्थम् शब्दके दो अर्थ हैं -- (1) जो कल दिनतक भी न रह सके (टिप्पणी प0 742.4) और (2) पीपलका वृक्ष।पहले अर्थके अनुसार -- अश्वत्थ पदका तात्पर्य यह है कि संसार एक क्षण (टिप्पणी प0 743.1) भी स्थिर रहनेवाला नहीं है। केवल परिवर्तनके समूहका नाम ही संसार है। परिवर्तनका जो नया रूप सामने आता है? उसको उत्पत्ति कहते हैं थोड़ा और परिवर्तन होनेपर उसको स्थितिरूपसे मान लेते हैं और जब उस स्थितिका स्वरूप भी परिवर्तित हो जाता है? तब उसको समाप्ति (प्रलय) कह देते हैं। वास्तवमें इसकी उत्पत्ति? स्थिति और प्रलय होते ही नहीं। इसलिये इसमें प्रतिक्षण परिवर्तन होनेके कारण यह (संसार) एक क्षण भी स्थिर नहीं है। दृश्यमात्र प्रतिक्षण अदर्शनमें जा रहा है। इसी भावसे इस संसारको अश्वत्थम् कहा गया है।दूसरे अर्थके अनुसार -- यह संसार पीपलका वृक्ष है। शास्त्रोंमें अश्वत्थ अर्थात् पीपलके वृक्षकी बहुत महिमा गायी गयी है। स्वयं भगवान् भी सब वृक्षोंमें अश्वत्थ को अपनी विभूति कहकर उसको श्रेष्ठ एवं पूज्य बताते हैं -- अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम् (गीता 10। 26)। पीपल? आँवला और तुलसी -- इनकी भगवद्भावपूर्वक पूजा करनेसे वह भगवान्की पूजा हो जाती है।परमात्मासे संसार उत्पन्न होता है। वे ही संसारके अभिन्ननिमित्तोपादान कारण हैं। अतः संसाररूपी पीपलका वृक्ष भी तत्त्वतः परमात्मस्वरूप होनेसे पूजनीय है। इस संसाररूप पीपलवृक्षकी पूजा यही है कि इससे सुख लेनेकी इच्छाका त्याग करके केवल इसकी सेवा करना। सुखकी इच्छा न रखनेवालेके लिये यह संसार साक्षात् भगवत्स्वरूप है -- वासुदेवः सर्वम् (गीता 7। 19)। परन्तु संसारसे सुखकी इच्छा रखनेवालोंके लिये यह संसार दुःखोंका घर ही है। कारण कि स्वयं अविनाशी है और यह संसारवृक्ष प्रतिक्षण परिवर्तनशील होनेके कारण नाशवान्? अनित्य और क्षणभङ्गुर है। अतः स्वयंकी कभी इससे तृप्ति हो ही नहीं सकती किंतु इससे सुखकी इच्छा करके यह बारबार जन्मतामरता रहता है। इसलिये संसारसे यत्किञ्चित् भी स्वार्थका सम्बन्ध न रखकर केवल उसकी सेवा करनेका भाव ही रखना चाहिये।प्राहुरव्ययम् -- संसारवृक्षको अव्यय कहा जाता है। क्षणभङ्गुर अनित्य संसारका आदि और अन्त न जान सकनेके कारण? प्रवाहकी निरन्तरता(नित्यता)के कारण तथा इसका मूल सर्वशक्तिमान् परमेश्वर नित्य अविनाशी होनेके कारण ही इसे अव्यय कहते हैं। जिस प्रकार समुद्रका जल सूर्यके तापसे भाप बनकर बादल बनता है। फिर आकाशमें ठण्डक पाकर वही जल बादलसे पुनः जलरूपसे पृथ्वीपर आ जाता है। फिर वही जल नदीनालेका रूप धारण करके समुद्रमें चला जाता है? पुनः समुद्रका जल बादल बनकर बरसता है -- ऐसे घूमते हुए जलके चक्रका कभी भी अन्त नहीं आता। इसी प्रकार इस संसारचक्रका भी कभी अन्त नहीं आता। यह संसारचक्र इतनी तेजीसे घूमता (बदलता) है कि चलचित्र(सिनेमा) के समान अस्थिर (प्रतिक्षण परिवर्तनशील) होते हुए भी स्थिरकी तरह प्रतीत होता है।यह संसारवृक्ष अव्यय कहा जाता है। (प्राहुः)? वास्तवमें यह अव्यय (अविनाशी) है नहीं। अगर यह अव्यय होता तो न तो इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें यह कहा जाता कि इस(संसार)का जैसा स्वरूप कहा जाता है? वैसा उपलब्ध नहीं होता और न इस(संसारवृक्ष) को वैराग्यरूप दृढ़ शस्त्रके द्वारा छेदन करनेके लिये ही भगवान् प्रेरणा करते।छन्दांसि यस्य पर्णानि -- वेद इस संसारवृक्षके पत्ते हैं। यहाँ वेदोंसे तात्पर्य उस अंशसे है? जिसमें सकामकर्मोंके अनुष्ठानोंका वर्णन है (टिप्पणी प0 743.2)। तात्पर्य यह है कि जिस वृक्षमें सुन्दर फूलपत्ते तो हों? पर फल नहीं हों तो वह वृक्ष अनुपयोगी है क्योंकि वास्तवमें तृप्ति तो फलसे ही होती है? फूलपत्तोंकी सजावटसे नहीं। इसी प्रकार सुखभोग चाहनेवाले सकाम पुरुषको भोगऐश्वर्यरूप फूलपत्तोंसे सम्पन्न यह संसारवृक्ष बाहरसे तो सुन्दर प्रतीत होता है? पर इससे सुख चाहनेके कारण उसको अक्षय सुखरूप तृप्ति अर्थात् महान् आनन्दकी प्राप्ति नहीं होती।वेदविहित पुण्यकर्मोंका अनुष्ठान स्वर्गादि लोकोंकी कामनासे किया जाय तो वह निषिद्ध कर्मोंको करनेकी अपेक्षा श्रेष्ठ तो है? पर उन कर्मोंसे मुक्ति नहीं हो सकती क्योंकि फलभोगके बाद पुण्य कर्म नष्ट हो जाते हैं और उसे पुनः संसारमें आना पड़ता है (गीता 9। 21)। इस प्रकार सकामकर्म और उसका फल -- दोनों ही उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं। अतः साधकको इन (दोनों) से सर्वथा असङ्ग होकर एकमात्र परमात्मतत्त्वको ही प्राप्त करना चाहिये।पत्ते वृक्षकी शाखासे उत्पन्न होनेवाले तथा वृक्षकी रक्षा और वृद्धि करनेवाले होते हैं। पत्तोंसे वृक्ष सुन्दर दीखता है तथा दृढ़ होता है (पत्तोंके हिलनेसे वृक्षका मूल? तना एवं शाखाएँ दृढ़ होती हैं)। वेद भी इस संसारवृक्षकी मुख्य शाखारूप ब्रह्माजीसे प्रकट हुए हैं और वेदविहित कर्मोंसे ही संसारकी वृद्धि और रक्षा होती है। इसलिये वेदोंको पत्तोंका स्थान दिया गया है। संसारमें सकाम (काम्य) कर्मोंसे स्वर्गादिमें देवयोनियाँ प्राप्त होती हैं -- यह संसारवृक्षका बढ़ना है। स्वर्गादिमें नन्दनवन? सुन्दर विमान? रमणीय अप्सराएँ आदि हैं -- यह संसारवृक्षके सौन्दर्यकी प्रतीति है। सकामकर्मोंको करते रहनेसे बारम्बार जन्ममरण होता रहता है -- यह संसारवृक्षका दृढ़ होना है।इन पदोंसे भगवान् यह कहना चाहते हैं कि साधकको सकामभाव? वैदिक सकामकर्मानुष्ठानरूप पत्तोंमें न फँसकर संसारवृक्षके मूल -- परमात्माका ही आश्रय लेना चाहिये। परमात्माका आश्रय लेनेसे वेदोंका वास्तविक तत्त्व भी जाननेमें आ जाता है। वेदोंका वास्तविक तत्त्व संसार या स्वर्ग नहीं? प्रत्युत परमात्मा ही हैं (गीता 15। 15) (टिप्पणी प0 744.1)। यस्तं वेद स वेदवित् -- उस संसारवृक्षको जो मनुष्य जानता है? वह सम्पूर्ण वेदोंके यथार्थ तात्पर्यको जाननेवाला है। संसारको क्षणभङ्गुर (अनित्य) जानकर इससे कभी किञ्चिन्मात्र भी सुखकी आशा न रखना -- यही संसारको यथार्थरूपसे जानना है। वास्तवमें संसारको क्षणभङ्गुर जान लेनेपर सुखभोग हो ही नहीं सकता। सुखभोगके समय संसार क्षणभङ्गुर नहीं दीखता। जबतक संसारके प्राणीपदार्थोंको स्थायी मानते रहते हैं? तभीतक सुखभोग? सुखकी आशा और कामना तथा संसारका आश्रय? महत्त्व? विश्वास बना रहता है। जिस समय यह अनुभव हो जाता है कि संसार प्रतिक्षण नष्ट हो रहा है? उसी समय उससे सुख लेनेकी इच्छा मिट जाती है और साधक उसके वास्तविक स्वरूपको जानकर (संसारसे विमुख और परमात्माके सम्मुख होकर) परमात्मासे अपनी अभिन्नताका अनुभव कर लेता है। परमात्मासे अभिन्नताका अनुभव होनेमें ही वेदोंका वास्तविक तात्पर्य है। जो मनुष्य संसारसे विमुख होकर परमात्मतत्त्वसे अपनी अभिन्नता (जो कि वास्तवमें है) का अनुभव कर लेता है? वही वास्तवमें वेदवित् है। वेदोंके अध्ययनमात्रसे मनुष्य वेदोंका विद्वान् तो हो सकता है? पर यथार्थ वेदवेत्ता नहीं। वेदोंका अध्ययन न होनेपर भी जिसको (संसारसे सम्बन्धविच्छेदपूर्वक) परमात्मतत्त्वकी अनुभूति हो गयी है? वही वास्तवमें वेदवेत्ता (वेदोंके तात्पर्यको अनुभवमें लानेवाला) है।भगवान्ने इसी अध्यायके पन्द्रहवें श्लोकमें अपनेको वेदवित् कहा है। यहाँ वे संसारके तत्त्वको जाननेवाले पुरुषको वेदवित्त कहकर उससे अपनी एकता प्रकट करते हैं। तात्पर्य यह है कि मनुष्यशरीरमें मिले विवेककी इतनी महिमा है कि उससे जीव संसारके यथार्थ तत्त्वको जानकर भगवान्के सदृश वेदवेत्ता बन सकता है (टिप्पणी प0 744.2)परमात्माका ही अंश होनेके कारण जीवका एकमात्र वास्तविक सम्बन्ध परमात्मासे है। संसारसे तो इसने भूलसे अपना सम्बन्ध माना है? वास्तवमें है नहीं। विवेकके द्वारा इस भूलको मिटाकर अर्थात् संसारसे माने हुए सम्बन्धका त्याग करके एकमात्र अपने अंशी परमात्मासे अपनी स्वतःसिद्ध अभिन्नताका अनुभव करनेवाला ही संसारवृक्षके यथार्थ तत्त्वको जाननेवाला है और उसीको भगवान् यहाँ वेदवित् कहते हैं। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने जिस संसारवृक्षका दिग्दर्शन कराया? उसी संसारवृक्षका अब आगेके श्लोकमें अवयवोंसहित विस्तारसे वर्णन करते हैं।
Sri Anandgiri
।।15.1।।ज्ञानेन गुणात्यये दर्शिते नाशित्वे तेषां विना ज्ञानेनानत्ययादनाशित्वे तेनापि तद्योग्यत्वान्न ज्ञानं गुणात्ययहेतुरित्याशङ्कां निरस्य साक्षादेव श्रवणादिहेतुं संन्यासं विधित्सुर्ब्रह्मत्वस्य परमपुरुषार्थतां च विवक्षुरध्यायान्तरमारभते -- यस्मादिति। कर्मिणो ज्ञानिनश्च शास्त्रेऽधिकृतास्तत्र कर्मिणां कर्मानुकूलं फलमीश्वरायत्तंफलमत उपपत्तेः इति न्यायाज्ज्ञानिनामपि तत्फलमीश्वरायत्तमेवततो ह्यस्य बन्धविपर्ययौ इत्युक्तत्वाद्? यस्मादेवं तस्माद्ये भक्त्याख्येन योगेन मामेव सेवन्ते ते मत्प्रसादद्वारा ज्ञानं प्राप्य गुणातीताः मुक्ता भवन्तीति स्थितमित्यर्थः। ये त्वात्मनस्तत्त्वमेव संदेहाद्यपोहेन जानन्ति ते तेन ज्ञानेन गुणातीताः सन्तो मुक्तिं गच्छन्तीति किमु वक्तव्यमित्यर्थसिद्धमर्थमाह -- किमु वक्तव्यमिति। आत्मतत्त्वाज्ञानं यतः संसारहेतुः? ज्ञानं मोक्षानुकूलमतोऽर्जुनेन किं तदित्यपृष्टमपि तत्त्वं भगवानुक्तवान्प्रश्नाभावेऽपि तस्य तद्व्युत्पादनाभिमानादित्याह -- अति इति। तत्त्वे विवक्षिते किमिति संसारो वर्ण्यते तत्राह -- तत्रेति। अध्यायादिः सप्तम्यर्थः। वैराग्यमपि किमिति मृग्यते तत्राह -- विरक्तस्येति। इति वैराग्याय संसारवर्णनमिति शेषः। नाशसभावनायै वृक्षरूपकं बन्धहेतोर्दर्शयति -- ऊर्ध्वमूलमिति। कथं कालतः सूक्ष्मत्वं तदाह -- कारणत्वादिति। तदेव कथं कार्यापेक्षया नियतपूर्वभावित्वादित्याह -- नित्यत्वादिति। सर्वव्यापित्वाच्चोत्कर्षं संभावयति -- महत्त्वाच्चेति। ऊर्ध्वमुच्छ्रितमुत्कृष्टमिति यावत्। तस्य कूटस्थस्य कथं मूलत्वमित्याशङ्क्याह -- अव्यक्तेति। स्मृतिमूलत्वेन श्रुतिमुदाहरति -- श्रुतेश्चेति। अवाञ्च्यो निकृष्टाः शाखा इव महदाद्या यस्य स तथा। प्रकृते संसारवृक्षे पुराणसंमतिमाह -- पुराणे चेति। अव्यक्तमव्याकृतं तदेव मूलं तस्मात्प्रभवनं प्रभवो यस्य स तथा तस्यैव मूलस्याव्यक्तस्यानुग्रहादतिदृढत्वादुत्थितः संवर्धितः। तस्य लौकिकवृक्षसाधर्म्यमाह -- बुद्धीत्यादिना। वृक्षस्य हि शाखाः स्कन्धादुद्भवन्ति संसारस्य च बुद्धेः सकाशान्नानापरिणामा जायन्ते तेन बुद्धिरेव स्कन्धस्तन्मयस्तत्प्रचुरोऽयं संसारतरुरिन्द्रियाणामन्तराणि छिद्राणि कोटराणि यस्य स तथा। महान्ति भूतानि पृथिव्यादीन्याकाशान्तानि विशाखाः स्तम्भा यस्य स तथा। आजीव्यत्वमुपजीव्यत्वं? ब्रह्मणाधिष्ठितो वृक्षो ब्रह्मवृक्षस्तथापि ज्ञानं विना छेत्तुमशक्यतया सनातनश्चिरंतनः। एतच्च ब्रह्मणः परस्यात्मनो वनं वननीयं संभजनीयमत्र हि ब्रह्म प्रतिष्ठितं वृक्षस्य तस्य संसाराख्यस्य तदेव ब्रह्म सारभूतमथवास्य ब्रह्मवृक्षस्यानवच्छिन्नस्य संसारमण्डलस्य तदेतद्ब्रह्म वनमिव वनं वननीयं संभजनीयं नहि ब्रह्मातिरिक्तं संसारस्यास्पदमस्ति ब्रह्मैवाविद्यया संसरतीत्यभ्युपगमादित्यर्थः। अहं ब्रह्मेति दृढज्ञानेनोक्तं संसारवृक्षं छित्त्वा प्रतिबन्धकाभावादात्मनिष्ठो भूत्वा पुनरावृत्तिरहितं कैवल्यं प्राप्नोतीत्याह -- एतदिति। अधःशाखमित्येतद्व्याचष्टे -- महदिति। आदिशब्देनेन्द्रियादिसंग्रहः। संसारवृक्षस्यातिचञ्चलत्वे प्रमाणमाह -- प्राहुरिति। क्षणध्वंसिनोऽव्ययत्वं विरुद्धमित्याशङ्क्याह -- संसारेति। तदेवोपपादयति -- अनादीति। छादनं रक्षणं प्रावरणं वा कर्मकाण्डानि खल्वारोहावरोहफलानि नानाविधार्थवादयुक्तानि संसारवृक्षं रक्षन्ति तन्निष्ठं दोषं चावृण्वन्ति तेन तानि छन्दांसि पर्णानीव भवन्तीत्यर्थः। तदेव प्रपञ्चयति -- यथेति। उक्तेऽर्थे हेतुमाह -- धर्मेति। कर्मकाण्डानां वेदानामिति शेषः। कर्मब्रह्माख्यसर्ववेदार्थस्य तत्रान्तर्भावमुपेत्य व्याचष्टे -- वेदार्थेति। समूलसंसारवृक्षज्ञाने(कुतूहलं)ऽमूलं हित्वा मूलमेव निष्कृष्य ज्ञातुं शक्यमिति तज्ज्ञानार्थं प्रयतितव्यमिति मत्वा तज्ज्ञानस्तुतिरत्र विवक्षितेत्याह -- नहीति।
Sri Dhanpati
।।15.1।।यस्मान्मदधीनं कर्मिणां कर्मफलं ज्ञानिनां ज्ञानफलं चफलमत उपपत्तेःततो ह्यस्य बन्धविपर्ययौ इतिन्यायाभ्यामतो भक्ति योगेन मां सेवन्ते ते मत्प्रासादाज्ज्ञानप्राप्तिक्रमेण गुणातीति मोक्षं गच्छन्तीतं आत्मनस्तत्त्वमेव सम्यग्जानन्ति ते तेन ज्ञानेन गणातीताः सन्तः मुक्तिं गच्छन्तीति किमु वक्तव्यमित्यतोऽर्जुनेनापृष्टमप्यात्मनस्तत्त्वं विवक्षुर्भगवानुवाच -- ऊर्ध्वमूलमित्यादि। तत्रादौ वृक्षरुपकल्पनया वैराग्यार्थं संसारस्वरुपं वर्णयति। भगवत्तत्वज्ञाने संसाराद्विरक्तस्यैवाधिकारात्। यत्तु केचित्पूर्वाध्यायेन भगवता संसारबन्धहेतून्गुणान् व्याख्याय तेषामत्ययेन ब्रह्मभावो मोक्षो मद्भजनेन लक्ष्यत इति मां चेत्यादिनोक्तं तत्र मनुष्यस्य तव भक्तियोगेन कथं ब्रह्मभाव इत्याकाङ्क्षायां स्वस्य ब्रह्मरुपताज्ञापनाय सूत्रभूतो ब्रह्मणो हीति श्लोको भगवतोक्तः। अस्य सूत्रस्य वृत्तिस्थानीयोयं पञ्चदश आरभ्यते। भगवतः श्रीकृष्णस्य हि तत्त्वं ज्ञात्वा तत्प्रेमभजनेन गुणातीतः सन् ब्रह्मभावं कथमाप्नुयात् लोक इति। तत्र ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहमित्यादिभगवद्वचनमाकर्ण्य मत्तुल्यो मनुष्योऽयं कथमेवं वदतीति विस्मयाविष्टप्रतिमया लज्जया च किमपि प्रष्टुमक्नुवन्तमर्जनमालक्ष्य कृपया स्वस्वरुपं विवक्षुः श्रीभगवानुवाचेत्यवतारयन्ति तन्नादर्तव्यम्।अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोपि सन्।मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।मूढोयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययं।मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्। नाप्नुवन्ति महात्मनः संसिद्धिं परमां गताः।मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिनामयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरंन मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः।अहमादिर्हि दवानां महर्षिणां च सर्वशः।अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते इत्यादिबहुशः श्रुतवतः।परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्नहि ते भगतन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाःत्वमक्षरं परमं विदतव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्। त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मेअनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्। वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरुप इत्याद्युक्तवतो विश्वरुपं दृष्टवतश्चार्जुनस्य एवमभिप्रायवर्णनानौचित्यात्। ऊर्ध्वं कालतः सूक्ष्मत्वात् कारणत्वात् नित्यत्वात् महत्वाच्चोच्छ्रितमुत्कृष्टं मायाशक्तिमत् ब्रह्म मूलं यस्य सोऽयं संसार ऊर्ध्वमूलस्तमधः सर्वकारणान्मायाशक्तिमतो ब्रह्मणो निकृष्टा महदहंकारतन्मात्रादयः शाखाः यस्य सोऽधःशाखस्तं श्वोऽपि न स्थास्यतीत्यश्वत्थः क्षणभङ्गुरस्तमश्वत्थं मायामयं संसारवृक्षं अव्ययं संसारमायाया अनादिकालप्रवृत्तत्वादनाद्यनन्तदेहादिसंतानाश्रयः तत्त्वज्ञानमन्तरेणानुच्छेद्यो यः सोऽव्ययः संसारवृक्षस्तं प्राहुः श्रुतिस्मृतिवादाः कथयन्ति। तथाहिऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः इत्यादिश्रुतिवादाःअव्यक्तमूलप्रभवस्तस्यैवानुग्रहोत्थितः। बुद्धिस्कन्धमयश्चैव इन्द्रियान्तरकोटरः।।महाभूतविशाखश्च विषयैः पत्रवांस्तथा। धर्माधर्मसुपुष्पश्च सुखदुःखफलोदयः।।आजीव्यः सर्वभूतानां ब्रह्मवृक्षः सनातनः। एतद्ब्रह्मवनं चैव ब्रह्मवृक्षस्य तस्य तत्।।एतच्छित्त्वा च भित्त्वा च ज्ञानेन परमासिना। ततश्चान्त्यगतिं प्राप्य तस्मान्नावर्तते पुनः इत्यादयः स्मृतिवादाः। आजीव्य उपजीव्यः ब्रह्माधिष्ठितत्वात्। ब्रह्मवृक्षः ज्ञानं विना छेत्तुमशक्यत्वेनानादित्वाच्च। सनातनश्चिरंतनः। तच्च ब्रह्मणः परस्यात्मनो वनं वननीयं संभजनीयमत्र हि सर्वं प्रतिष्ठितं तस्य वृक्षस्य संसाराख्यस्य तदेव सारभूतं? सारभूतं? अथवास्य वृक्षस्यानवच्छिन्नस्य संसारमण्डलस्य तदेव ब्रह्मवनमिव वनं वननीयं संभजनीयं। नहि ब्रह्मातिरिक्तं संसारस्यास्पदमस्ति। ब्रह्मैवाविद्यया संभवतीत्यभ्युपगमादित्यर्थः। तस्मादब्रह्मगतिरुपान्मोक्षात्। स्पष्टमन्यत्। असेव्यफलमश्रुतां वीनां सुपर्णानां जीवानामज्ञनामयो गतिर्यस्मिन्नसौ व्ययः न विद्यते व्ययो यस्मादित्यव्ययः।तयोनन्यः पिप्पलम् इति श्रुतेरित्यर्थः। अनेन सुज्ञैरसेव्यफलत्वं ध्वन्यते। यद्वा पक्षिसामान्यवाचकविशब्देन पक्षिविशेषा हंसा लक्ष्यन्ते तेषामयः प्रचारस्तद्रहितः। नहि हंसा अश्वत्थे व्याप्रियन्ते संन्यासिनो वा जगद्विषय इति कल्पना तु श्रुत्याद्यननुगुणा सर्वज्ञानां न शोभते इत्यत आचार्यैर्न प्रदर्शिता। अत्र ऊर्ध्वमूलमधः शाखं मिथ्याभूतं जले प्रतिबिम्बितं पुनःपुनः परिदृश्यमानत्वादव्यमैन्द्रजालिकोपदर्शितमेदादृशं वाश्वत्थम्। संसारवृक्षस्य मिथ्यात्वबोधनायोपमानीकृत्येयं रुपककल्पना। तेनोर्ध्वमूलस्याधःशाखस्य क्षणभङग्ुरस्य माया मयस्याव्ययस्याश्वतथस्यैवाभावाद्रूपकासंगतिरिति न शङ्कनीयम्। केचित्तु गङ्गातरङ्गनुद्यमानोत्तुङ्गतीरतिर्यङ्निपतितः प्रबलतरपवनोन्मूलितः पतिपयमूलव्याप्तपातालः ऊर्ध्वस्थिबहुमूलो भूमिस्थकतिपयशाखः उपरिस्थितबहुशाखः अधोमूलबलेन स्थितत्वात् अव्ययस्तादृशमश्वत्थमुपमानीकृत्येयं रुपककल्पनेति वर्णयन्ति। यस्य संसारवृक्षस्य च्छादनाद्रक्षणात् छन्दांसि ऋग्यजुःसामलक्ष्णानि पर्णनीव पर्णानि? यथा वृक्षस्य परिरक्षणार्थानि पर्णानि तथा कर्मकाण्डानि च्छन्दांसि धर्माधर्मतद्धेतुफलप्रकाशनार्थत्वात् संसारवृक्षस्य परिरक्षणार्थानीत्यर्थः। छादनं प्रावरणमित्यर्थे त्वर्थवादयुक्तानां छन्दसां तन्निष्ठदोषप्रावरणार्थत्वं बोध्यम्। तं यथोक्तं संसारवृक्षं भङगुरं मायामयं साधिष्ठानं यो वेद जानाति स वेदवित् वेदार्थज्ञः। समूले संसारवृक्षे सर्वं ज्ञेयमन्तर्भवतीति तस्य ज्ञाता वेदार्थवित्त्वात् सर्वज्ञो भवतीति समूलसंसारवृक्षज्ञानं यत्नेन संपाद्यमिति बोधनाय तज्ज्ञानं स्तौति।
Sri Madhavacharya
।।15.1।।संसारच्छेत्रे नमः। संसारस्वरूपतदत्ययोपायविज्ञानान्यस्मिन्नध्याये दर्शयति। ऊर्ध्वो विष्णुः ऊर्ध्वपवित्रो वाजिनीवस्वमृतमस्मि। द्रविण ्ँ सवर्चसम् [तै.उ.1।10] इति हि श्रुतिः। ऊर्ध्व उत्तमः सर्वतः? अधो निकृष्टं शाखा भूतानि। श्वोऽप्येकप्रकारेण न तिष्ठतीत्यश्वत्थः। तथापि न प्रवाहव्ययः। पूर्वब्रह्मकाले यथास्थितिः? तथा सर्वत्रापीत्यव्ययता। फलकारणत्वाच्छन्दसां पर्णत्वम्? न हि कदाचिदप्यजाते पर्णे फलोत्पत्तिः।
Sri Neelkanth
।।15.1।।पूर्वाध्यायान्ते सुखस्यैकान्तिकस्य प्रतिष्ठा पराकाष्ठाहमित्युक्तं तत्र किं लक्षणं तत्सुखं केन वा आवृतं केन वा साधनेनास्यावरणभङ्गः केन वाधिकारिणा तत्प्राप्यमित्यादिवर्णयितुं पञ्चदशोऽध्यायः आरभ्यते -- ऊर्ध्वमूलमिति।आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते इति श्रुतिप्रसिद्धं मानुषानन्दमारभ्योत्तरोत्तरशतगुणविवृद्धानन्दसोपानपङ्क्तेरुपरिस्थितं परमानन्दाद्वयं वस्तु ऊर्ध्वं तदेव मूलं मूलकारणमस्य संसाराश्वत्थस्य तमूर्ध्वमूलम्। अधःशाखं ऊर्ध्वादधोऽधः सोपानस्थानीयाः शाखा इव शाखाः अव्यक्तमहदहंकारपञ्चतन्मात्राषोडशविकारहिरण्यगर्भविराट्प्रजापतिसुरगन्धर्वासुरनरतिर्यक्स्थावररूपा यस्य सोऽधःशाखस्तम्। न श्वोऽपि स्थातुं योग्यमनृतत्वादश्वत्थं संसारवृक्षम्। तथाप्यव्ययं मूढानामनाद्यनन्तं प्राहुर्वेदाः।ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः इत्यादयः। छन्दांसि वेदास्तदुपलक्षिता यज्ञादयस्त एव पर्णानि पर्णसंघातवच्छोभाहेतवो यस्य तरोस्तमश्वत्थं यो वेद मिथ्यात्वेन स एव वेदवित् विदितवेद्य इत्यर्थः। अत्राश्वत्थरूपकेण संसारो वर्ण्यते।
Sri Ramanujacharya
।।15.1।।श्रीभगवानुवाच -- यं संसाराख्यम् अश्वत्थम् ऊर्ध्वमूलम् अधःशाखम् अव्ययं प्राहुः श्रुतयः -- ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः। (क0 उ0 2।3।1)ऊर्ध्वमूलमवाक्शाखं वृक्षं यो वेद संप्रति (आरण्य0 1।11।5) इत्याद्याः।सप्तलोकोपरि निविष्टचतुर्मुखादित्वेन तस्य ऊर्ध्वमूलत्वम्? पृथिवीनिवासिसकलनरपशुमृगपक्षिकृमि कीटपतङ्गस्थावरान्ततया अधःशाखत्वम् असङ्गहेतुभूताद् आसम्यग् ज्ञानोदयात् प्रवाहरूपेण अच्छेद्यत्वेन अव्ययत्वम्।यस्य च अश्वत्थस्य छन्दांसि पर्णानि आहुः छन्दांसि श्रुतयः।वायव्यं श्वेतमालभेत भूतिकामः (यजुः 2।1।1)ऐन्द्राग्नमेकादशकपालं निर्वपेत् प्रजाकामः (यजुः का0 2।1) इत्यादिश्रुतिप्रतिपादितैः काम्यकर्मभिः विवर्धते अयं संसारवृक्षः इति छन्दांसि एव अस्य पर्णानि? पत्रैः हि वृक्षो वर्धते।यः तम् एवंभूतम् अश्वत्थं वेद स वेदवित्? वेदो हि संसारवृक्षस्य छेदोपायं वदति? छेद्यस्य वृक्षस्य स्वरूपज्ञानं छेदनोपायज्ञानोपयोगि इति वेदविद् इति उच्यते।तस्य मनुष्यादिशाखस्य वृक्षस्य तत्तत्कर्मकृता अपराः च अधः शाखाः पुनरपि मनुष्यपश्वादिरूपेण प्रसृताः भवन्ति? ऊर्ध्वं च गन्धर्वयक्षदेवादिरूपेण प्रसृता भवन्ति। ताः च गुणप्रवृद्धाः गुणैः सत्त्वादिभिः प्रवृद्धाः? विषयप्रवालाः शब्दादिविषयपल्लवाः।कथम् इति अत्र आह --
Sri Sridhara Swami
।।15.1।।वैराग्येण विना ज्ञानं न च भक्तिरतः स्फुटम्। वैराग्योपस्कृतं ज्ञानमीशः पञ्चदशेऽदिशत्।।1।।पूर्वाध्यायान्तेमां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते इत्यादिना परमेश्वरमेकान्तभक्त्या भजतस्तत्प्रसादलब्धज्ञानेन ब्रह्मभावो भवतीत्युक्तम्? नचैकान्तभक्तिर्ज्ञानं वाऽविरक्तस्य संभवतीति वैराग्यपूर्वकं ज्ञानमुपदेष्टुकामः प्रथमं तावत्सार्धश्लोकाभ्यां संसारस्वरूपं वृक्षरूपकालंकारेण वर्णयन्श्रीभगवानुवाच -- ऊर्ध्वमूलमिति। ऊर्ध्वमुत्तमः क्षराक्षराभ्यामुत्कृष्टः पुरुषोत्तमो मूलं यस्य तम्। अध इति ततोऽर्वाचीनाः कार्योपाधयो हिरण्यगर्भादयो गृह्यन्ते? ते तु शाखा इव शाखा यस्य तम्। विनश्वरत्वेन श्वः प्रभातपर्यन्तमपि न स्थास्यतीति विश्वासानर्हत्वादश्वत्थं प्राहुः। प्रवाहरूपेणाविच्छेदादव्ययं च प्राहुःऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः इत्याद्याः श्रुतयः। छन्दांसि वेदाः यस्य पर्णानि? धर्माधर्मप्रतिपादनद्वारेण छायास्थानीयैः कर्मफलैः संसारवृक्षस्य सर्वजीवाश्रयणीयत्वापादनात्पर्णस्थानीया वेदाः। यस्तमेवंभूतमश्वत्थं वेद स एव वेदार्थवित् संसारप्रपञ्चवृक्षस्य मूलमीश्वरः श्रीनारायणः? ब्रह्मादयस्तदंशाः शाखास्थानीयाः? स च संसारवृक्षो विनश्वरः प्रवाहरूपेण नित्यश्च वेदोक्तैः कर्मभिः सेव्यतामापादितश्चेत्येतावानेव हि वेदार्थः। अतएव विद्वान्वेदविदिति स्तूयते।
Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha
।।15.1।।एवमध्यायद्वयेन प्रथमषट्कोदितप्रकृतिपुरुषतत्प्रकारविशेषविशोधनं कृतम् तत्रेयं प्रकृतिः स्वगुणैर्यदधीनसत्तादि पुरुषश्च यदपराधाद्बद्धः यत्प्रसादाच्च मोक्ष्यत इत्युक्तम् स इदानीं मध्यमषट्कोदितः परमात्मा विशोध्यत इति सङ्गतिमाह -- क्षेत्राध्याय इत्यादिनाआरभत इत्यन्तेन। एतेनअचिन्मिश्राद्विशुद्धाच्च चेतनात्पुरुषोत्तमः। व्यापनाद्भरणात्स्वाम्यादन्यः पञ्चदशोदितः [गी.सं.19] इति सङ्ग्रहश्लोकोऽप्यनुसंहितः। त्रयोदशशेषतया चतुर्दशे वृत्ते तदन्तेमां च (26?27) इत्यादिश्लोकद्वयेन अव्यभिचारिभक्त्या भजनीयः फलप्रदश्च परमपुरुषः प्रसक्तः पञ्चदशे तत्प्रकर्षविशेषविशोधनपरतया चतुर्दशेन सङ्गतिःभजनीयस्येत्यनेन दर्शिता। विभूतिमत्त्वप्रतिपादनमिह वैलक्षण्यप्रतिपादनार्थमित्यभिप्रायेणआरभत इत्युक्तम्। प्रकृताभ्यां बद्धमुक्ताभ्यां विभूतिमत्त्वमिह वर्ण्यत इत्यपि प्रकृताध्यायद्वयसङ्गतिरभिप्रेता। तत्रऊर्ध्वमूलम् इत्यादेरध्यायारम्भग्रन्थस्य जरद्गवादिवाक्यवदनन्वितत्वम्? अन्वितत्वेऽपि प्रकृताप्रकृतप्रकरिष्यमाणासङ्गतिं च परिहर्तुमाह -- तत्र तावदिति। प्रतिपत्तिसौकर्यार्थं श्रुत्यनुसारेणेदमश्वत्थवृक्षाकारकल्पनम्। परतत्त्वबुभुत्साहेतुभूतवैराग्यार्थमित्येके? विभूतितयाऽवसितया च विभूतिमत्परत्वप्रतिपादनार्थत्वात्तस्येति। अनन्तरमसङ्गशस्त्रच्छेद्यत्वोक्तेः सङ्गविषयः संसार एवात्राश्वत्थरूपेण कल्पित इति गम्यते तत्र लौकिकाश्वत्थाद्वैलक्षण्यज्ञापनायोर्ध्वमूलत्वाद्याश्चर्यप्रदर्शनमिति भावः। ननु मूलप्रकृतिरेवात्राश्वत्थतया कल्प्यत इति किं न गृह्यतेगुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः [15।2] इत्यादीनि च तत्र सुसङ्गतानि मैवं? साक्षात्सङ्गविषयत्वाभावादसङ्गशस्त्रच्छेद्यत्वस्य च मुख्यस्याविनाशित्वेनानन्वयात्तदिदमभिप्रेत्योक्तम् -- अचित्परिणामविशेषमिति?यं संसाराख्यमिति च।अयमेवार्थः पुराणेऽपि पठ्यते -- अव्यक्तमूलप्रभवस्तस्यैवानुग्रहोच्छ्रितः। बुद्धिस्कन्धमयश्चैव इन्द्रियान्तरकोटरः।।महाभूतविशाखश्च विषयैः पत्रशाखवान्।।धर्माधर्मसुपुष्पश्च सुखदुःखफलोदयः।।आजीव्यः सर्वभूतानां ब्रह्मवृक्षः सनातनः। एतद्ब्रह्मवनं चैव ब्रह्मवृक्षस्य तस्य तत्।।एतच्छित्त्वा च भित्त्वा च ज्ञानेन परमासिना। ततश्चात्मरतिं प्राप्य यस्मान्नावर्तते पुनः [म.भा.14।35।2022ना.पु.16।5?6?7?11] इत्यादि। केचित्पुरुषाणामेकैकस्मिञ्छरीरे शिरस ऊर्ध्वत्वात्पाण्यादीनां चाधोमुखत्वादूर्ध्वमूलत्वादिकल्पनामाहुः। पुनश्चान्यथाऽऽहुःतदिदं व्यष्टिक्षेत्रम्? अथ समष्टिक्षेत्रमुच्यते कृत्स्नमिदं ब्रह्माण्डं हिरण्यगर्भशरीरं विराडित्युच्यते तस्य द्यौः शिरश्चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशः श्रोत्रे मध्यमाकाशं शरीरम्? पृथिवी पादौ? तस्मिन्नप्यूर्ध्वमूलमधश्शाखम् इति योजयितव्यम्।प्राणिवंशो वा अश्वत्थो वृक्षः तस्य मूलं ब्रह्मा उपरिष्टात्स्थितः इत्यादि।अधश्चोर्ध्वं च
Sri Abhinavgupta
।।15.1 -- 15.2।।ऊर्ध्वमूलमिति। अधश्चेति। अनेन शास्त्रान्तरेषु यदुच्यते अश्वत्थः सर्वं? स एवोपासनीयः इत्यादि? तस्य भगवद्ब्रह्मोपासा तात्पर्यमित्युच्यते। मूलं प्रशान्तरूपम् (K प्रशान्तं रूपम्)। तत् ऊर्ध्वं? सर्वतो हि निवृत्तस्य तदाप्तिः। छन्दांसि पर्णानि इति -- यथा वृक्षस्य मानत्वफलवत्त्वसरसतादयः (S? फलत्व -- ) पर्णैः सूच्यन्ते? एवं ब्रह्मतत्त्वस्य वेदोपलक्षितशास्त्रद्वारिका प्रतीतिरित्याख्यायते। गुणैः? सत्त्वादिभिः प्रवृद्धाः? देवादिस्थावरान्ततया। तस्य च शुभाशुभात्मकानि कर्माणि अधस्तनमूलानि (?N -- मूलानि यस्य)।
Sri Jayatritha
।।15.1।।अध्यायप्रतिपाद्यमर्थमाह -- संसारेति। संसरत्यनेनेति संसारः प्रकृत्यदिकं क्षेत्रम्। पूर्वाध्याये संसारैकदेशानां गुणानामेव वृत्तं दर्शितम्? अत्र पुनः समग्रं संसारस्वरूपं प्रदर्श्य तदत्ययेच्छामुत्पाद्य तत्साधनजिज्ञासुं प्रति प्रागुक्तं साधनं प्रपञ्चयति। तत्प्रसङ्गादलौकिकं भगवन्महिमानं च दर्शयत्यनेनाध्यायेनेत्यर्थः। जगद्वृक्षस्योर्ध्वमूलत्वं घटयितुमूर्ध्वशब्दाभिधेयं तावदाह -- ऊर्ध्व इति। कुतः श्रौतप्रयोगादित्याह -- ऊर्ध्वेति। आदौ तावदहमूर्ध्वेन विष्णुना पवित्रो निष्पापोऽस्मि ततो वाजिरूपश्च नेता च वाजिनीः सूर्यः तत्र वसतीति वाजिनीवसुः? तेन वाजिनीवसुना विष्णुना अमृतं प्रारब्धकर्मनिर्मुक्तश्चास्मि। स तेजसि सूर्ये सम्पन्नः [प्रश्नो.5।5] इति श्रुतेः। ततश्च तेनैव सवर्चसं सप्रभं अनुभूयमानमिति यावत्। द्रविणं धनं सुखं चास्मीत्यर्थः। वर्चसशब्दोऽकारान्तोऽप्यस्ति ब्रह्महस्तिभ्यां वर्चसः [अष्टा.5।4।78] इत्यत्र योगविभागात्समासान्तो वा? विष्णुप्रसङ्गदर्शनाय श्रुतिशेषोदाहरणम्। इदानीं तस्य तत्र प्रवृत्तौ निमित्तमाह -- ऊर्ध्व इति। उन्नतो ह्यूर्ध्व उच्यते अतो ब्रह्मादिलोकस्थत्वादिलक्षणा सूक्ष्मत्वादिगुणयोगो वा नाश्रयणीयः सर्वतः सर्वस्मात्प्रपञ्चात् सर्वैश्च गुणैः।अधश्शाखं इत्येतद्धटयन्नधश्शब्दार्थं तावदाह -- अध इति। शाखाः काः इत्यत आह -- शाखा इति। तानि हि मूलापेक्षयाऽपकृष्टानि। ननु वृक्षमात्रस्य सारूप्यमभिदधता,कथमश्वत्थत्वमस्योच्यते इत्यत आह -- श्वोऽपीति।सुपि स्थः [अष्टा.3।2।4] इति कः? श्वसः सकारस्य तकारो धातुसकारस्य लोपश्च निरुक्तत्वात्। श्वः स्थाता श्वत्थः? श्वत्थो न भवतीत्यश्वत्थः? किमुत कालान्तर इत्यपिशब्दः। ननु पदार्थानां बहुकालस्थायित्वदर्शनात्कथमेतत् इत्यत उक्तम् -- एकेति। तिष्ठतीति लुडर्थेनादरसूचनाय लट्। अथवाऽपिशब्देन वर्तमानातीतयोः समुच्चयः। ततः क्रियाप्रबन्धे लट्। तर्ह्यव्ययमिति व्याघात इत्यत आह -- तथापीति विकारित्वेऽपि। एतदपि नास्ति। जगत्प्रवाहस्य प्रलये व्ययादित्यत आह -- पूर्वेति। छन्दसां पर्णत्वं घटयति -- फलेति। फलकारित्वसादृश्यादित्यर्थः। तत्र फलं मोक्षादिकम्। छन्दसां वेदानाम्। स्यादिदं यदि पर्णानां फलकारणत्वं स्यात् तदेव कुतः अन्वयव्यतिरेकाभ्यामित्याह -- न हीति। किन्तु जात एवेत्यन्वयोऽपि वाच्यः।
Sri Madhusudan Saraswati
।।15.1।।पूर्वाध्याये भगवता संसारबन्धहेतून्गुणान्व्याख्याय तेषामत्ययेन ब्रह्मभावो मोक्षो मद्भजनेन लभ्यत इत्युक्तंमां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते। स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते इति। तत्र मनुष्यस्य तव भक्तियोगेन कथं ब्रह्मभाव इत्याकाङ्क्षायां स्वस्य ब्रह्मरूपताज्ञापनाय सूत्रभूतोऽयं श्लोको भगवतोक्तःब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च। शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च इत्यस्य सूत्रस्य वृत्तिस्थानीयोऽयं पञ्चदशोध्याय आरभ्यते। भगवतः श्रीकृष्णस्य हि तत्त्वं ज्ञात्वा तत्प्रेमजननेन गुणातीतः सन्ब्रह्मभावं कथमाप्नुयाल्लोक इति? तत्र ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहमित्यादिभगवद्वचनमाकर्ण्य मम तुल्यो मनुष्योऽयं कथमेवं वदतीति विस्मयाविष्टमतिभयाल्लज्जया च किंचिदपि प्रष्टुमशक्नुवन्तमर्जुनमालक्ष्य कृपया स्वस्वरूपं विवक्षुः श्रीभगवानुवाच -- तत्र विरक्तस्यैव संसाराद्भगवत्तत्त्वज्ञानेऽधिकारो नान्यथेति पूर्वाध्यायोक्तं परमेश्वराधीनप्रकृतिपुरुषसंयोगकार्यं संसारवृक्षरूपकल्पनया वर्णयति वैराग्याय। प्रस्तुतगुणातीतत्वोपायत्वात्तस्य -- ऊर्ध्वमूलमिति। ऊर्ध्वमुत्कृष्टं मूलं कारणं स्वप्रकाशपरमानन्दरूपत्वेन नित्यत्वेन च ब्रह्म? अथवोर्ध्वं सर्वसंसारबाधेऽप्यबाधितं सर्वसंसारभ्रमाधिष्ठानं ब्रह्म तदेव मायया मूलमस्येत्यूर्ध्वमूलम्। अध इत्यर्वाचीनाः कार्योपाधयो हिरण्यगर्भाद्या गृह्यन्ते। तेनानादिक्प्रसृतत्वाच्छाखा इव शाखा अस्येत्यधःशाखं आशुविनाशित्वेन न श्वोऽपि स्थातेति विश्वासानर्हमश्वत्थं मायामयं संसारवृक्षमव्ययमनाद्यनन्तदेहादिसन्तानाश्रयमात्मज्ञानमन्तरेणानुच्छेद्यमनन्तमव्ययमाहुः श्रुतयः स्मृतयश्च। श्रुतयस्तावत्ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः इत्याद्याः कठवल्लीषु पठिताः? अवाञ्चो निकृष्टाः कार्योपाधयो महदहंकारतन्मात्रादयो वा शाखा अस्येत्यवाक्शाख इत्यधःशाखपदसमानार्थं। सनातन इत्यव्ययपदसमानार्थम्। स्मृतयश्चअव्यक्तमूलप्रभवस्तस्यैवानुग्रहोत्थितः। बुद्धिस्कन्धमयश्चैव इन्द्रियान्तरकोटरः।।महाभूतविशाखश्च विषयैः पत्रवांस्तथा। धर्माधर्मसुपुष्पश्च सुखदुःखफलोदयः।।आजीव्यः सर्वभूतानां ब्रह्मवृक्षः सनातनः। एतद्ब्रह्मवनं चैव ब्रह्माचरति साक्षिवत्।।एतच्छित्त्वा च भित्त्वा च ज्ञानेन परमासिना। ततश्चात्मगतिं प्राप्य तस्मान्नावर्तते पुनः इत्यादयोऽव्यक्तमव्याकृतं मायोपाधिकं ब्रह्म तदेव मूलं कारणं तस्मात्प्रभवो यस्य स तथा। तस्यैव मूलस्याव्यक्तस्यानुग्रहादतिदृढत्वादुत्थितः संवर्धितः। वृक्षस्य हि शाखाः स्कन्धादुद्भवन्ति? संसारस्य च बुद्धेःसकाशान्नानाविधाः परिणामा भवन्ति तेन साधर्म्येण बुद्धिरेव स्कन्धस्तन्मयस्तत्प्रचुरोऽयम्। इन्द्रियाणामन्तराणि छिद्राण्येव कोटराणि यस्य स तथा। महान्ति भूतान्याकाशादीनि पृथिव्यन्तानि विविधाः शाखा यस्य विशाखस्तम्भो यस्येति वा। आजीव्य उपजीव्यः। ब्रह्मणा परमात्मनाऽधिष्ठितो वृक्षो ब्रह्मवृक्षः आत्मज्ञानं विना छेत्तुमशक्यतया सनातनः। एतद्ब्रह्मवनमस्य ब्रह्मणो जीवरूपस्य भोग्यं वननीयं संभजनीयमिति वनं ब्रह्म साक्षिवदाचरति न त्वेतत्कृतेन लिप्यत इत्यर्थः। एतद्ब्रह्मवनं संसारवृक्षात्मकं छित्त्वा च भित्त्वाचाहं ब्रह्मास्मीत्यतिदृढज्ञानखङ्गेन समूलं निकृत्येत्यर्थः। आत्मरूपां गतिं प्राप्य तस्मादात्मरूपान्मोक्षान्नावर्तत इत्यर्थः। स्पष्टमितरत्। अत्र गङ्गातरङ्गनुद्यमानोत्तुङ्गतीरतिर्यङ्निपतितमर्धोन्मूलितं मारुतेन महान्तमश्वत्थमुपमानीकृत्य जीवन्तमियं रूपककल्पनेति द्रष्टव्यं? तेन नोर्ध्वमूलत्वाधःशाखत्वाद्यनुपपत्तिः। यस्य मायामयस्याश्वत्थस्य छन्दांसि छादनात्तत्त्ववस्तुप्रावरणात्संसारवृक्षरक्षणाद्वा कर्मकाण्डानि ऋग्यजुःसामलक्षणानि पर्णानीव पर्णानि। यथा वृक्षस्य,परिरक्षणार्थानि पर्णानि भवन्ति तथा संसारवृक्षस्य परिरक्षणार्थानि कर्मकाण्डानि। धर्माधर्मतद्धेतुफलप्रकाशनार्थत्वात्तेषाम्। यस्तं यथाव्याख्यातं समूलं संसारवृक्षं मायामयमश्वत्थं वेद जानाति स वेदवित्। कर्मब्रह्माख्यवेदार्थवित्स एवेत्यर्थः। संसारवृक्षस्य हि मूलं ब्रह्म। हिरण्यगर्भादयश्च जीवाः शाखास्थानीयाः। स च संसारवृक्षः स्वरूपेण विनश्वरः प्रवाहरूपेण चानन्तः। स च वेदोक्तैः कर्मभिः सिच्यते ब्रह्मज्ञानेन च छिद्यत इत्येतावानेव हि वेदार्थः। यश्च वेदार्थवित्स एव सर्वविदिति समूलवृक्षज्ञानं स्तौति स वेदविदिति।
Sri Purushottamji
।।15.1।।स्वरूपज्ञानरहिता भक्तिर्नैवोपयुज्यते। पुरुषोत्तमरूपं तु ततः पञ्चदशेऽवदत्।।1।। परीतः पार्थकृपया श्रीकृष्णः करुणानिधिः। उद्दिधीर्षुश्च तद्द्वारा लोकं भक्तिप्रवर्तितम्।।2।।पूर्वाऽध्यायेमां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते [14।26] इत्यनेनाऽनन्यभजनमुक्तम् तत्सिद्ध्यर्थं स्वपुरुषोत्तमस्वरूपं सपरिकरं वदिष्यन् सार्धश्लोकद्वयेन तदङ्गत्यागज्ञापनाय स्वलीलात्मकसंसारवृक्षाद्भिन्नं संसारस्वरूपं वृक्षरूपेणाऽऽह -- ऊर्ध्वमूलमित्यादिना। ऊर्ध्वः पुरुषोत्तमो मूलं यस्य? स्वक्रीडार्थं प्रकटितत्वात्। अधः जीवादयः सेवार्थोत्पादिताः शाखा यस्य तम्। अव्ययं लीलार्थकत्वान्नित्यं स्थास्यति? दुर्लभत्वाज्जीवदर्शनयोग्यं? अतो व्यासादयोऽश्वत्थं प्राहुः। यस्य पर्णानि पत्राणि छायोपयोग्यानि तापापहानि। भगवत्स्वरूपभगवद्भजनादिप्रतिपादकत्वेन छन्दांसि वेदाः।यः इति दुर्लभाधिकारित्वम्। वेदं वेत्ति जानाति स वेदवित्? वेदार्थज्ञानवानित्यर्थः।
Sri Shankaracharya
।।15.1।। -- ऊर्ध्वमूलं कालतः सूक्ष्मत्वात् कारणत्वात् नित्यत्वात् महत्त्वाच्च ऊर्ध्वम् उच्यते ब्रह्म अव्यक्तं मायाशक्तिमत्? तत् मूलं अस्येति सोऽयं संसारवृक्षः ऊर्ध्वमूलः। श्रुतेश्च -- ऊर्ध्वमूलोऽर्वाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः (क0 उ0 2।6।1) इति। पुराणे च -- अव्यक्तमूलप्रभवस्तस्यैवानुग्रहोच्छ्रितः। बुद्धिस्कन्धमयश्चैव इन्द्रियान्तरकोटरः।।महाभूतविशाखश्च विषयैः पत्रवांस्तथा। धर्माधर्मसुपुष्पश्च सुखदुःखफलोदयः।।आजीव्यः सर्वभूतानां ब्रह्मवृक्षः सनातनः। एतद्ब्रह्मवनं चैव ब्रह्माचरति नित्यशः।।एतच्छित्त्वा च भित्त्वा च ज्ञानेन परमासिना। ततश्चात्मरतिं प्राप्य तस्मान्नावर्तते पुनः।। इत्यादि। तम् ऊर्ध्वमूलं संसारं मायामयं वृक्षम् अधःशाखं महदहंकारतन्मात्रादयः शाखा इव अस्य अधः भवन्तीति सोऽयं अधःशाखः? तम् अधःशाखम्। न श्वोऽपि स्थाता इति अश्वत्थः तं क्षणप्रध्वंसिनम् अश्वत्थं प्राहुः कथयन्ति अव्ययं संसारमायायाः अनादिकालप्रवृत्तत्वात् सोऽयं संसारवृक्षः अव्ययः? अनाद्यन्तदेहादिसंतानाश्रयः हि सुप्रसिद्धः? तम् अव्ययम्। तस्यैव संसारवृक्षस्य इदम् अन्यत् विशेषणम् -- छन्दांसि यस्य पर्णानि? छन्दांसि च्छादनात् ऋग्यजुःसामलक्षणानि यस्य संसारवृक्षस्य पर्णानीव पर्णानि। यथा वृक्षस्य परिरक्षणार्थानि पर्णानि? तथा वेदाः संसारवृक्षपरिरक्षणार्थाः? धर्माधर्मतद्धेतुफलप्रदर्शनार्थत्वात्। यथाव्याख्यातं संसारवृक्षं समूलं यः तं वेद सः वेदवित्? वेदार्थवित् इत्यर्थः। न हि समूलात् संसारवृक्षात् अस्मात् ज्ञेयः अन्यः अणुमात्रोऽपि अवशिष्टः अस्ति इत्यतः सर्वज्ञः सर्ववेदार्थविदिति समूलसंसारवृक्षज्ञानं स्तौति।।तस्य एतस्य संसारवृक्षस्य अपरा अवयवकल्पना उच्यते --,
Sri Vallabhacharya
।।15.1।।एवं पूर्वाध्याये पुरुषस्य प्रकृतिसम्बन्धो गुणसङ्गतो लीलार्थं भगवतैव कृतस्तारतम्यत इति पूर्वोक्तं साङ्ख्यं विवृतं? तत्प्रसङ्गाद्गुणविभागमुक्त्वाऽन्ते तन्निवृत्तिपूर्वकमक्षरब्रह्मात्मप्राप्तिः पुरुषोत्तमभक्ितमूला विरलस्य भक्तिमार्गीयस्य भवतीत्युक्तं इदानीं भजनीयस्य ब्रह्माद्याश्रयस्य मूलभूतस्य क्षराक्षरातीतपुरुषोत्तमस्य सर्ववेदान्ततात्पर्यभूतस्य क्षराक्षरात्मकबद्धमुक्तमूलभूततया सर्वधर्माश्रयत्वमुत्तमत्वं च वक्तुमारभते तत्र गुणसर्गेऽस्य सर्वस्य चिदचित्प्रपञ्चस्य नामरूपात्मकस्य भगवतः सच्चिदंशोद्भूतत्वाद्भगवत्स्वरूपस्य भजनीयतां तत्स्वरूपनिरूपणेन परिहरन् तन्मूलभूतस्य च तां प्रतिपादयन् श्रीभगवानुवाच -- ऊर्ध्वमूलमिति। ऊर्ध्वं ब्रह्मपर्यन्तं मूलं यस्य? यं विचित्रनामरूपप्रपञ्चाख्यं प्रसिद्धमश्वत्थं प्राहुः। भगवानपि तथा सोऽपि च।तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वं [श्वे.उ.3।9 म.ना.उ.8।14] इति वाक्यात् स भूमिं विश्वतो वृत्त्वाऽत्यतिष्ठद्दशांगुलम् [ऋक्सं.8।4।17।1] इत्यादिश्रुतेः। भगवान्मूलवृक्षरूपस्तस्माज्जगदपि जायमानं वृक्षात्मकमेव भवति। अनेन भगवतो महत्त्वं कारणत्वं च निरूपितम्।ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाखो यो(एषो)ऽश्वत्थः स सनातनः [कठो.6।11] ऊर्ध्वमूलावाक्शाखं वृक्षं यो वेद सम्प्रति इत्यादिश्रुतय आहुः। अश्वत्थादिवृक्षे एकस्मिन्कोटिशः फलानि भवन्ति तत्रैकस्मिन्फलेऽसङ्ख्यातानि बीजानीति एकस्य बीजस्यायं ब्रह्माण्डात्मको वृक्षः? सोऽपि तादृश एव। एवमनादिनिधनो वृक्षमूलो भगवानत एव क्वचिद्ब्रह्माण्डनिर्माणं भगवता स्वांशद्वारा क्वचित्तत्त्वद्वारा। अक्षरमत्र फलं तस्य तत्त्वान्यंशाः बीजं ब्रह्माण्डमिति? शकुनिभक्षि तमेव ततो निर्गतं फलतीति तत्त्वानां चेतनता निरूपिता।ऊर्ध्वमूलं इत्यादिविशेषणैर्विचित्ररचनत्वेन परमकाष्ठापन्नवस्तुकृतिसाध्यत्वात् तदंशत्वं तद्रूपत्वेन सनातनत्वं च सूच्यते। अतएवोक्तं यज्ञपत्न्युपाध्यायैःब्रह्मात्मकं ब्रह्मकार्यं वेदलोकमयं जगत् इतिप्रपञ्चो भगवत्कार्यस्तद्रूपो माययाऽभवत् इति भाष्यकारेण च। छंदासि यस्य भगवद्रूपप्रपञ्चस्य पर्णानि वायव्यं श्वेतमालभेत [यजुः2।1।1] स्वर्गकामो यजेत [आप.श्रौ.10।1।2।1] इत्यादिकानि छायासुखकराणि जीवानां भवन्ति? बाह्यतः काम्यकर्मपरत्वात्। आभ्यन्तरस्तुयन्न दुःखेन सम्भिन्नं तत्पदं स्वःपदास्पदम् इति व्यवस्थापनात्। यस्तमेवम्भूतमश्वत्थं वेद स वेदवित्। वेदो हि भगवत्कार्यभूते प्रपञ्चे अविद्यालिङ्गितजीवकृताहम्मत्वकल्पितकर्मादिपर्यावर्तसंसारविवर्तच्छेदोपायं वदति। अतएवसुवर्णजलवत्कार्यं इत्युक्तं श्रीमदाचार्यैः। तस्य चान्तरालिकस्य स्वरूपज्ञानं छेदनोपायज्ञानोपयोगीति वेदविदुच्यते।