Bhagavad Gita · Chapter 16 · Verse 1
श्री भगवानुवाच
अभयं सत्त्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।।16.1।।
śhrī-bhagavān uvācha
abhayaṁ sattva-sanśhuddhir jñāna-yoga-vyavasthitiḥ
dānaṁ damaśh cha yajñaśh cha svādhyāyas tapa ārjavam
साधक संजीवनी — स्वामी रामसुखदास
।।16.1।। व्याख्या--[पंद्रहवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि 'जो मुझे पुरुषोत्तम जान लेता है, वह सब प्रकारसे मेरा ही भजन करता है अर्थात् वह मेरा अनन्य भक्त हो जाता है। इस प्रकार एकमात्र भगवान्का उद्देश्य होनेपर साधकमें दैवी-सम्पत्ति स्वतः प्रकट होने लग जाती है। अतः भगवान् पहले तीन श्लोकोंमें क्रमशः भाव, आचरण और प्रभावको लेकर दैवी-सम्पत्तिका वर्णन करते हैं।]
अभयम् (टिप्पणी प0 790.1)--अनिष्टकी आशङ्कासे मनुष्यके भीतर जो घबराहट होती है, उसका नाम भय है और उस भयके सर्वथा अभावका नाम 'अभय' है।
भय दो रीतिसे होता है--(1) बाहरसे और (2) भीतरसे।
(1) बाहरसे आनेवाला भय--(क) चोर, डाकू, व्याघ्र, सर्प आदि प्राणियोंसे जो भय होता है, वह बाहरका भय है। यह भय शरीरनाशकी आशङ्कासे ही होता है। परन्तु जब यह अनुभव हो जाता है कि यह शरीर नाशवान् है और जानेवाला ही है, तो फिर भय नहीं रहता।
बीड़ीसिगरेट, अफीम, भाँग, शराब आदिके व्यसनोंको छो़ड़नेका एवं व्यसनी मित्रोंसे अपनी मित्रता टूटनेका जो भय होता है, वह मनुष्यकी अपनी कायरतासे ही होता है। कायरता छोड़नेसे यह भाव नहीं रहता।
(ख) अपने वर्ण, आश्रम आदिके अनुसार कर्तव्यपालन करते हुए उसमें भगवान्की आज्ञाके विरुद्ध कोई काम न हो जाय हमें विद्या पढ़ानेवाले, अच्छी शिक्षा देनेवाले आचार्य, गुरु, सन्तमहात्मा, मातापिता आदिके वचनोंकी आज्ञाकी अवहेलना न हो जाय हमारे द्वारा शास्त्र और कुलमर्यादाके विरुद्ध कोई आचरण न बन जाय -- इस प्रकारका भय भी बाहरी भय कहलाता है। परन्तु यह भय वास्तवमें भय नहीं है, प्रत्युत यह तो अभय बनानेवाला भय है। ऐसा भय तो साधकके जीवनमें होना ही चाहिये। ऐसा भय होनेसे ही वह अपने मार्गपर ठीक तरहसे चल सकता है। कहा भी है --
हरिडर, गुरुडर, जगतडर, डर करनी में सार।
रज्जब डर्या सो ऊबर्या, गाफिल खायी मार।।
(2) भीतरसे पैदा होनेवाला भय--(क) मनुष्य जब पाप, अन्याय, अत्याचार आदि निषिद्ध आचरण करना चाहता है, तब (उनको करनेकी भावना मनमें आते ही) भीतरसे भय पैदा होता है। मनुष्य निषिद्ध आचरण तभीतक करता है, जबतक उसके मनमें मेरा शरीर बना रहे, मेरा मानसम्मान होता रहे, मेरेको सांसारिक भोगपदार्थ मिलते रहें, इस प्रकार सांसारिक जड वस्तुओंकी प्राप्तिका और उनकी रक्षाका उद्देश्य रहता है (टिप्पणी प0 790.2)। परन्तु जब मनुष्यका एकमात्र उद्देश्य चिन्मयतत्त्वको प्राप्त करनेका हो जाता है (टिप्पणी प0 791.1), तब उसके द्वारा अन्याय, दुराचार छूट जाते हैं और वह सर्वथा अभय हो जाता है। कारण कि उसके लक्ष्य परमात्मतत्त्वमें कभी कमी नहीं आती और वह कभी नष्ट नहीं होता।
(ख) जब मनुष्यके आचरण ठीक नहीं होते और वह अन्याय, अत्याचार आदिमें लगा रहता है, तब उसको भय लगता है। जैसे, रावणसे मनुष्य, देवता, यक्ष, राक्षस आदि सभी डरते थे, पर वही रावण जब सीताका हरण करनेके लिये जाता है, तब वह डरता है। ऐसे ही कौरवोंकी अठारह अक्षौहिणी सेनाके बाजे बजे, तो उसका पाण्डवसेनापर कुछ भी असर नहीं हुआ (गीता 1। 13), पर जब पाण्डवोंकी सात अक्षौहिणी सेनाके बाजे बजे, तब कौरवसेनाके हृदय विदीर्ण हो गये (1। 19)। तात्पर्य यह है कि अन्याय, अत्याचार करनेवालोंके हृदय कमजोर हो जाते है, इसलिये वे भयभीत होते हैं। जब मनुष्य अन्याय आदिको छोड़कर अपने आचरणों एवं भावोंको शुद्ध बनाता है, तब उसका भय मिट जाता है।
(ग) मनुष्यशरीर प्राप्त करके यह जीव जबतक करनेयोग्यको नहीं करता, जाननेयोग्यको नहीं जानता और पानेयोग्यको नहीं पाता? तबतक वह सर्वथा अभय नहीं हो सकता उसके जीवनमें भय रहता ही है।
भगवान्की तरफ चलनेवाला साधक भगवान्पर जितनाजितना अधिक विश्वास करता है और उनके आश्रित होता है? उतनाहीउतना वह अभय होता चला जाता है। उसमें स्वतः यह विचार आता है कि मैं तो परमात्माका अंश हूँ अतः कभी नष्ट होनेवाला नहीं हूँ, तो फिर भय किस बातका (टिप्पणी प0 791.2) और संसारके अंश शरीर आदि सब पदार्थ प्रतिक्षण नष्ट हो रहे हैं, तो फिर भय किस बातका ऐसा विवेक स्पष्टरूपसे प्रकट होनेपर भय स्वतः नष्ट हो जाता है और साधक सर्वथा अभय हो जाता है।
भगवान्के साथ सम्बन्ध जोड़नेपर, भगवान्को ही अपना माननेपर शरीर, कुटुम्ब आदिमें ममता नहीं रहती। ममता न रहनेसे मरनेका भय नहीं रहता और साधक अभय हो जाता है।
'सत्त्वसंशुद्धिः'-- अन्तःकरणकी सम्यक् शुद्धिको सत्त्वसंशुद्धि कहते हैं। सम्यक् शुद्धि क्या है संसारसे रागरहित होकर भगवान्में अनुराग हो जाना ही अन्तःकरणकी सम्यक् शुद्धि है। जब अपना विचार, भाव, उद्देश्य, लक्ष्य केवल एक परमात्माकी प्राप्तिका हो जाता है, तब अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है। कारण कि नाशवान् वस्तुओंकी प्राप्तिका उद्देश्य होनेसे ही अन्तःकरणमें मल, विक्षेप और आवरण -- ये तीन तरहके दोष आते हैं। शास्त्रोंमें मलदोषको दूर करनेके लिये निष्कामभावसे कर्म (सेवा), विक्षेपदोषको दूर करनेके लिये उपासना और आवरणदोषको दूर करनेके लिये ज्ञान बताया है। यह होनेपर भी अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये सबसे बढ़िया उपाय है -- अन्तःकरणको अपना न मानना।
साधकको पुराने पापको दूर करनेके लिये या किसी परिस्थितिके वशीभूत होकर किये गये नये पापको दूर करनेके लिये अन्य प्रायश्चित्त करनेकी उतनी आवश्यकता नहीं है। उसको तो चाहिये कि वह जो साधन कर रहा है, उसीमें उत्साह और तत्परतापूर्वक लगा रहे। फिर उसके ज्ञातअज्ञात सब पाप दूर हो जायँगे और अन्तःकरण स्वतः शुद्ध हो जायगा।
साधकमें ऐसी एक भावना बन जाती है कि साधनभजन करना अलग काम है और व्यापारधंधा आदि करना अलग काम है अर्थात् ये दोनों अलगअलग विभाग हैं। इसलिये व्यापार आदि व्यवहारमें झूठकपट आदि तो करने ही पड़ते हैं -- ऐसी जो छूट ली जाती है? उससे अन्तःकरण बहुत ही अशुद्ध होता है। साधनके साथसाथ जो असाधन होता रहता है, उससे साधनमें जल्दी उन्नति नहीं होती। इसलिये साधकको सदा सावधान रहना चाहिये अर्थात् नये पाप कभी न बने -- ऐसी सावधानी सदासर्वदा बनी रहनी चाहिये।
साधक भूलसे किये हुए दुष्कर्मोंके अनुसार अपनेको दोषी मान लेता है और अपना बुरा करनेवाले व्यक्तिको भी दोषी मान लेता है, जिससे उसका अन्तःकरण अशुद्ध हो जाता है। उस अशुद्धिको मिटानेके लिये साधकको चाहिये कि वह भूलसे किये हुए दुष्कर्मको पुनः कभी न करनेका दृढ़ व्रत ले ले तथा अपना बुरा करनेवाले व्यक्तिके अपराधको क्षमा माँगे बिना ही क्षमा कर दे और भगवान्से प्रार्थना करे कि हे नाथ मेरा जो कुछ बुरा हुआ है, वह तो मेरे दुष्कर्मोंका ही फल है। वह बेचारा तो मुफ्तमें ही ऐसा कर बैठा है। उसका इसमें कोई दोष नहीं है। आप उसे क्षमा कर दें। ऐसा करनेसे अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है।
'ज्ञानयोगव्यवस्थितिः'-- ज्ञानके लिये योगमें स्थित होना अर्थात् परमात्मतत्त्वका जो ज्ञान (बोध) है, वह चाहे सगुणका हो या निर्गुणका, उस ज्ञानके लिये योगमें स्थित होना आवश्यक है। योगका अर्थ है -- सांसारिक पदार्थोंकी प्राप्तिअप्राप्तिमें, मानअपमानमें, निन्दास्तुतिमें, रोगनीरोगतामें सम रहना अर्थात् अन्तःकरणमें हर्षशोकादि न होकर निर्विकार रहना।
'दानम्'-- लोकदृष्टिमें जिन वस्तुओंको अपना माना जाता है, उन वस्तुओंको सत्पात्रका तथा देश, काल, परिस्थिति आदिका विचार रखते हुए आवश्यकतानुसार दूसरोंको वितीर्ण कर देना दान है। दान कई तरहके होते हैं जैसे भूमिदान, गोदान, स्वर्णदान, अन्नदान, वस्त्रदान आदि। इन सबमें अन्नदान प्रधान है। परन्तु इससे भी अभयदान प्रधान (श्रेष्ठ) है (टिप्पणी प0 792.1)। उस अभयदानके दो भेद होते हैं --,
(1) संसारकी आफतसे, विघ्नोंसे, परिस्थितियोंसे भयभीत हुएको अपनी शक्ति, सामर्थ्यके अनुसार भयरहित करना, उसे आश्वासन देना, उसकी सहायता करना। यह अभयदान उसके शरीरादि सांसारिक पदार्थोंको लेकर होता है।
(2) संसारमें फँसे हुए व्यक्तिको जन्ममरणसे रहित करनेके लिये भगवान्की कथा आदि सुनाना (टिप्पणी प0 792.2)। गीता, रामायण, भागवत आदि ग्रन्थोंको एवं उनके भावोंको सरलभाषामें छपवाकर सस्ते दामोंमें लोगोंको देना अथवा कोई समझना चाहे तो उसको समझाना, जिससे उसका कल्याण हो जाय। ऐसे दानसे भगवान् बहुत राजी होते हैं (गीता 18। 68 -- 69) क्योंकि भगवान् ही सबमें परिपूर्ण हैं। अतः जितने अधिक जीवोंका कल्याण होता है, उतने ही अधिक भगवान् प्रसन्न होते हैं। यह सर्वश्रेष्ठ अभयदान है। इसमें भी भगवत्सम्बन्धी बातें दूसरोंको सुनाते समय साधक वक्ताको यह सावधानी रखनी चाहिये कि वह दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें विशेषता न माने, प्रत्युत इसमें भगवान्की कृपा माने कि भगवान् ही श्रोताओंके रूपमें आकर मेरा समय सार्थक कर रहे हैं।
ऊपर जितने दान बताये हैं, उनके साथ अपना सम्बन्ध न जोड़कर साधक ऐसा माने कि अपने पास वस्तु, सामर्थ्य, योग्यता आदि जो कुछ भी है, वह सब भगवान्ने दूसरोंके सेवा करनेके लिये मुझे निमित्त बनाकर दी है। अतः भगवत्प्रीत्यर्थ आवश्यकतानुसार जिसकिसीको जो कुछ दिया जाय, वह सब उसीका समझकर उसे देना दान है।
'दमः'-- इन्द्रियोंको पूरी तरह वशमें करनेका नाम दम है। तात्पर्य यह है कि इन्द्रियाँ, अन्तःकरण और शरीरसे कोई भी प्रवृत्ति शास्त्रनिषिद्ध नहीं होनी चाहिये। शास्त्रविहित प्रवृत्ति भी अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके केवल दूसरोंके हितके लिये ही होनी चाहिये। इस प्रकारकी प्रवृत्तिसे इन्द्रियलोलुपता, आसक्ति और पराधीनता नहीं रहती एवं शरीर और इन्द्रियोंके बर्ताव शुद्ध, निर्मल होते हैं।
साधकका उद्देश्य इन्द्रियोंके दमनका होनेसे अकर्तव्यमें तो उसकी प्रवृत्ति होती ही नहीं और कर्तव्यमें स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है, तो उसमें स्वार्थ, अभिमान आसक्ति, कामना आदि दोष नहीं रहते। यदि कभी किसी कार्यमें स्वार्थभाव आ भी जाता है, तो वह उसका दमन करता चला जाता है, जिससे अशुद्धि मिटती जाती है और शुद्धि होती चली जाती है और आगे चलकर उसका दम अर्थात् इन्द्रियसंयम सिद्ध हो जाता है।
'यज्ञः'-- यज्ञ शब्दका अर्थ आहुति देना होता है। अतः अपने वर्णाश्रमके अनुसार होम, बलिवैश्वदेव आदि करना यज्ञ है। इसके सिवाय गीताकी दृष्टिसे अपने वर्ण, आश्रम, परिस्थिति आदिके अनुसार जिसकिसी समय जो कर्तव्य प्राप्त हो जाय, उसको स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके दूसरोंके हितकी,भावनासे या भगवत्प्रीत्यर्थ करना यज्ञ है। इसके अतिरिक्त जीविकासम्बन्धी व्यापार, खेती आदि तथा शरीरनिर्वाहसम्बन्धी खानापीना, चलनाफिरना, सोनाजागना, देनालेना आदि सभी क्रियाएँ भगवत्प्रीत्यर्थ करना यज्ञ है। ऐसे ही मातापिता, आचार्य, गुरुजन आदिकी आज्ञाका पालन करना, उनकी सेवा करना, उनको मन, वाणी, तन और धनसे सुख पहुँचाकर उनकी प्रसन्नता प्राप्त करना और गौ, ब्राह्मण, देवता, परमात्मा आदिका पूजन करना, सत्कार करना -- ये सभी यज्ञ हैं।
'स्वाध्यायः' -- अपने ध्येयकी सिद्धिके लिये भगवन्नामका जप और गीता, भागवत, रामायण, महाभारत आदिके पठनपाठनका नाम स्वाध्याय है। वास्तवमें तो 'स्वस्य अध्यायः (अध्ययनम्) स्वाध्यायः' के अनुसार अपनी वृत्तियोंका, अपनी स्थितिका ठीक तरहसे अध्ययन करना ही स्वाध्याय है। इसमें भी साधकको न तो अपनी वृत्तियोंसे अपनी स्थितिकी कसौटी लगानी है और न वृत्तियोंके अधीन अपनी स्थिति ही माननी है। कारण कि वृत्तियाँ तो हरदम आतीजाती रहती हैं, बदलती रहती हैं। तो फिर स्वाभाविक यह प्रश्न उठता है कि क्या हम अपनी वृत्तियोंको शुद्ध न करें वास्तवमें तो साधकका कर्तव्य वृत्तियोंको शुद्ध करनेका ही होना चाहिये और वह शुद्धि अन्तःकरण तथा उसकी वृत्तियोंको अपना न माननेसे बहुत जल्दी हो जाती है क्योंकि उनको अपना मानना ही मूल अशुद्धि है। साक्षात् परमात्माका अंश होनेसे अपना स्वरूप कभी अशुद्ध हुआ ही नहीं। केवल वृत्तियोंके अशुद्ध होनेसे ही उसका यथार्थ अनुभव नहीं होता।
'तपः' -- भूखप्यास, सरदीगरमी, वर्षा आदि सहना भी एक तप है, पर इस तपमें भूखप्यास आदिको जानकर सहते हैं। वास्तवमें साधन करते हुए अथवा जीवननिर्वाह करते हुए देश, काल, परिस्थिति आदिको लेकर जो कष्ट, आफत, विघ्न आदि आते हैं, उनको प्रसन्नतापूर्वक सहना ही तप है (टिप्पणी प0 793.1) क्योंकि इस तपमें पहले किये गये पापोंका नाश होता है औह सहनेवालेमें सहनेकी एक नयी शक्ति, एक नया बल आता है।
साधकको सावधान रहना चाहिये कि वह उस तपोबलका प्रयोग दूसरोंको वरदान देनेमें, शाप देने या अनिष्ट करनेमें तथा अपनी इच्छापूर्ति करनेमें न लगाये, प्रत्युत उस बलको अपने साधनमें जो बाधाएँ आती हैं, उनको प्रसन्नतासे सहनेकी शक्ति बढ़ानेमें ही लगाये।
साधक जब साधन करता है, तब वह साधनमें कई तरहसे विघ्न मानता है। वह समझता है कि मुझे एकान्त मिले तो मैं साधन कर सकता हूँ, वायुमण्डल अच्छा हो तो साधन कर सकता हूँ इत्यादि। इन सब अनुकूलताओंकी चाहना न करना अर्थात् उनके अधीन न होना भी तप है। साधकको अपना साधन परिस्थितियोंके अधीन नहीं मानना चाहिये, प्रत्युत परिस्थितिके अनुसार अपना साधन बना लेना चाहिये। साधकको अपनी चेष्टा तो एकान्तमें साधन करनेकी करनी चाहिये, पर एकान्त न मिले तो मिली हुई परिस्थितिको भगवान्की भेजी हुई समझकर विशेष उत्साहसे प्रसन्नतापूर्वक साधनमें प्रवृत्ति होना चाहिये।
'आर्जवम्'-- सरलता, सीधेपनको आर्जव कहते हैं। यह सरलता साधकका विशेष गुण है। यदि साधक यह चाहता है कि दूसरे लोग मुझे अच्छा समझें, मेरा व्यवहार ठीक नहीं होगा तो लोग मुझे बढ़िया नहीं मानेंगे, इसलिये मुझे सरलतासे रहना चाहिये, तो यह एक प्रकारका कपट ही है। इसमें साधकमें बनावटीपन आता है, जब कि साधकमें सीधा, सरल भाव होना चाहिये। सीधा, सरल होनेके कारण लोग उसको मूर्ख, बेसमझ कह सकते हैं, पर उससे साधककी कोई हानि नहीं है। अपने उद्धारके लिये तो सरलता बड़े कामकी चीज है --
'कपट गाँठ मन में नहीं, सबसों सरल सुभाव।'
Sri Anandgiri
।।16.1।।व्यवहितेन संबन्धं वदन्नध्यायान्तरमवतारयति -- दैवीति। दैवी सूचिता राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीमित्यादाविति शेषः। प्रकृतीनां विस्तरेण दर्शनं कुत्रोपयोगीत्याशङ्क्य विभज्योपयोगमाह -- संसारेति। अतीते चाध्याये कर्मानुबन्धीन्यधश्च मूलान्यनुसंततानीत्यत्र कर्मव्यङ्ग्या वासनाः संसारस्यावान्तरमूलत्वेनोक्तास्ता मनुष्यदेहे प्राग्भवीयकर्मानुसारेण व्यज्यमानाः सात्त्विकादिभेदेन दैव्यादिप्रकृतित्रयत्वेन विभक्ता विस्तितीर्षुर्भगवानुक्तवानित्याह -- भगवानिति। अभीरुता शास्त्रोपदिष्टेऽर्थे संदेहं हित्वानुष्ठाननिष्ठत्वं? परवञ्चना परस्य व्याजेन वशीकरणम्? माया हृदयेऽन्यथा कृत्वा बहिरन्यथा व्यवहरणम्? अनृतमयथादृष्टकथनम्। आदिपदेन विप्रलम्भादिग्रहः। उक्तमर्थं संक्षिप्याह -- शुद्धेति। एषेत्यभयाद्या ज्ञानादिस्थित्यन्ता त्रिधोक्तेति यावत्। तामेव सात्त्विकीं प्रकृतिं प्रकटयति -- यत्रेति। ज्ञाने कर्मणि वाधिकृतानामभीरुताद्या या प्रकृतिः सा तेषां तत्र सात्त्विकी संपदित्यर्थः। महाभाग्यानामत्युत्तमा दैवी संपदुक्ता? संप्रति सर्वेषां यथासंभवं संपदं व्यपदिशति -- दानमिति। बाह्यकरणविशेषे कारणमाह -- अन्तःकरणस्येति। देवयज्ञादिरित्यादिशब्देन पितृयज्ञो भूतयज्ञो मनुष्ययज्ञश्चेति त्रयमुक्तम्। ब्रह्मयज्ञस्य स्वाध्यायेन पृथक्करणात्।
Sri Dhanpati
।।16.1।।मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः। राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः।।महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः। भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्। इति दैव्यासुरी राक्षसी चेति प्राणिनां प्रकृतयो नवमेऽध्याये सूचिताः। अतीतानन्तराध्याये चअधश्च मूलान्यनुसंततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके इत्यत्र कर्मव्यङ्ग्या वासनाः संसारस्यावान्तर्मूलत्वेनोक्ताः ता मनुष्यदेहे प्राग्भवीयकर्मानुसारेण व्यज्यमानाः सात्त्विककराजसतामसभेदेन दैव्यादिप्रकृतित्वेन विभक्ता आविश्चिकीर्षुर्द्वे आहद्वया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च इत्यादिश्रुत्यनुसारेण राक्षसीमासुर्यामन्तर्भाव्य मोक्षहेतुभूताया दैव्याः प्रकृतेरुपादानायेतरयोर्हानाय च श्रीभगवानुवाच। तत्रादावादानाय दैवीं संपदमाह -- अभयमित्यादित्रिभिः। अभयमभीरुता शास्त्रोपदिष्टेऽर्थे संदेहं विहायानुष्ठाननिष्ठता एकाकी सर्वपरिग्रहशून्यः कथं जीविष्यामीति भयरहितता वा आत्मचिन्तनाय गिरिदर्यादिनिवासेऽपि भयाभाव इति वा। सत्त्वस्यान्तःकरणस्य शुद्धिः परस्य व्याजेन वशीकरणरुपस्य वञ्जनस्य हृदयेऽन्यथाकृत्वा बहिरन्यथा व्यवहरणरुपाया मायाया अयथादृष्टकथनात्मकस्यानृतस्य विप्रलम्भभ्रमादेश्च परिवर्जनं शुद्धस्वभावेन व्यवहार इत्यर्थः। ज्ञानं शास्त्रादाचार्याच्चात्मदिपदार्थानामवगमः? इन्द्रियाद्युपसंहारेणैकाग्रतयावगतानां स्वात्मसंवेद्यतापादनं योगस्तयोर्व्यवस्थितिः व्यवस्थानं तन्निष्ठता। दानं यथाशक्ति अन्नादीनां संविभागः। दमश्च बाह्यकरणानामुपशमोऽन्तःकरणस्योपशमं शान्तिं वक्ष्यति। यज्ञश्च श्रौतोऽग्निहोत्रादिः देवयज्ञः स्मार्तश्च पितृयज्ञो भूतयज्ञो मनुष्यज्ञश्चेति त्रिविधः। स्वाध्यायोऽदृष्टार्थे ऋग्वेदाद्यध्ययनं तदध्यापनं च ब्रह्मयज्ञः। तपो वक्ष्यमाणं शारीरादि। आर्जवं सर्वदा ऋजुत्वं। यत्तु सत्त्वानां दुष्टप्राणिनां व्याघ्रदीनां संशुद्धिः स्वभावपरित्यागो यस्मादितीदृशः प्रभावविशेषः। अन्तःकरणशुद्धेः शान्तिरिति च वक्ष्यमाणत्वादिति तन्नादर्तव्यम्। उक्तान्तःकरणशुद्य्धपेक्षया तदुपशमस्य विलक्षणतायाः सुवचत्वेन कुकल्पनानौचित्यात्। ज्ञानमात्मचिन्तरं योगो नित्यकर्मयोगाः तयोर्व्यवस्थितिः रात्रौ ज्ञानं दिवा यथाकालं कर्मयोग इत्येवंलक्षणा व्यवस्था। दानं तेषां कर्मणामीश्वरेर्पणम्। पात्रे त्यागस्योत्तरत्र त्यागशब्देन गृहीतत्वात्। यदा त्वभयं सर्वभूताभयदानसंकल्पपरिपालनं एतच्चानयेषामपि परमहंसधर्माणामुपलक्षणम्। सत्त्वसंशुद्धिः श्रवणादिपरिपाकेनान्तःकरणस्यासंभावनाविपरीतभावनादिमलराहित्यम्। ज्ञानमात्मसाक्षात्कारः? योगो मनोनाशवासनाक्षयानुकूलः पुरुषप्रयत्नस्ताभ्यां विशिष्टा संसारविलक्षणावस्थितिर्जीवन्मुक्तर्ज्ञान्योगव्यवस्थितिरित्येवं व्याख्यायेत तदा फलभूतैव दैवी संपदियं द्रष्टव्येत्यादिव्याख्यानेषु सम्यग्विचार्य समीचीनभाष्यस्योपलक्षणार्थतयोपादेयमन्यत्तु हेयम्।
Sri Madhavacharya
।।16.1।। साधनविघ्नहर्त्रे नमः। पुमर्थसाधनविरोधीत्यनेनाध्यायेन दर्शयति -- तपो ब्रह्मचर्यादि।ब्रह्मचर्यादिकं तपः इति ह्यभिधानम्।
Sri Neelkanth
।।16.1।।नवमाध्याये राक्षसी आसुरी दैवी चेति तिस्रः संपद उक्तास्तासु राक्षसीमासुर्यामेवान्तर्भाव्य द्वे एव संपदावत्र व्युत्पाद्येतेद्वया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च इति श्रुतावभयसत्त्वशुद्ध्यादिधीवृत्तयो देवाः दम्भदर्पादिधीवृत्तयोऽसुरा इति द्वैराश्यस्यैव दर्शनात्। पूर्वाध्यायान्ते इदमुक्तं मयानघेत्यर्जुनं संबोधयताऽनघत्वं दैवसंपत्तिमत्त्वं तद्विपर्ययस्त्वासुरीसंपदिति दर्शयितुं श्रीभगवानुवाच -- अभयमिति। अभयं स्वोच्छेदबुद्ध्यभावः। सत्त्वसंशुद्धिः चित्तनैर्मल्यम्। ज्ञानं श्रवणादिजन्यं? योगो ज्ञातेऽर्थे चित्तप्रणिधानं तयोर्व्यवस्थितिः। निर्दिष्टैषा मुख्या दैवीसंपत्। दानं यथाशक्ति संविभागोऽन्नादीनाम्। दमो बाह्येन्द्रियनियमः। यज्ञः श्रौतस्मार्तादिः। स्वाध्यायो वेदाध्ययनम्। तपो वक्ष्यमाणलक्षणं शारीरादित्रिविधम्। आर्जवं ऋजुत्वं सर्वदा।
Sri Ramanujacharya
।।16.1।।श्रीभगवानुवाच -- इष्टानिष्टवियोगसंयोगरूपस्य दुःखस्य हेतुदर्शनजं दुःखं भयम्? तन्निवृत्तिः अभयम्।सत्त्वसंशुद्धिः सत्त्वस्य अन्तःकरणस्य रजस्तमोभ्याम् असंस्पृष्टत्वम्।ज्ञानयोगव्यवस्थितिः प्रकृतिवियुक्तात्मस्वरूपविवेकनिष्ठा।दानं न्यायार्जितधनस्य पात्रे प्रतिपादनम्।दमः मनसो विषयौन्मुखनिवृत्तिसंशीलनम्।यज्ञः फलाभिसन्धिरहितभगवदाराधनरूपमहायज्ञाद्यनुष्ठानम्।स्वाध्यायः सविभूतेः भगवतः तदाराधनप्रकारस्य च प्रतिपादकः कृत्स्नो वेदः? इति अनुसंधाय वेदाभ्यासनिष्ठा।तपः कृच्छ्रचान्द्रायणद्वादश्युपवासादेः भगवत्प्रीणनकर्मयोग्यतापादनस्य करणम्।आर्जवम् मनोवाक्कायकर्मवृत्तीनाम् एकनिष्ठा परेषु।
Sri Sridhara Swami
।।16.1।।आसुरीं संपदं त्यक्त्वा दैवीमेवाश्रिता नराः। मुच्यन्त इति निर्णेतुं तद्विवेकोऽथ षोडशे।।1।।पूर्वाध्यायान्तेएतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत इत्युक्तम् तत्र क एतत्तत्त्वं बुध्यते को वा न बुध्यत इत्यपेक्षायां तत्त्वज्ञानेऽधिकारिणोऽनधिकारिणश्च विवेकार्थं षोडशाध्यायारम्भः। निरूपिते हि कार्यार्थेऽधिकारिजिज्ञासा भवति। तदुक्तं भट्टैःभारी यो येन वोढव्यः स प्रागान्दोलितो यदा। तदा कस्तस्य वोढेति शक्यं कर्तुं निरूपणम् इति। तत्राधिकारिविशेषणभूतां दैवीं संपदमाह -- श्रीभगवान् -- अभयमिति त्रिभिः। अभयं भयाभावः? सत्त्वस्य चित्तस्य संशुद्धिः सुप्रसन्नता? ज्ञानयोगे आत्मज्ञानोपाये व्यवस्थितिः परिनिष्ठा? दानं स्वभोज्यस्यान्नादेर्यथोचितं संविभागः? दमो बाह्येन्द्रियसंयमः? यज्ञो यथाधिकारं दर्शपूर्णमासादिः? स्वाध्यायो ब्रह्मयज्ञादिर्जपयज्ञः? तप उत्तराध्याये वक्ष्यमाणं शारीरादि? आर्जवमवक्रता।
Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha
।।16.1।।तृतीयषट्कस्य त्रिकभेदादिप्रकारः प्रागेवास्माभिः प्रपञ्चितः तत्र त्रिकभेदं प्रदर्श्य त्रिभिः सङ्गततया षोडशमवतारयितुं तत्त्वत्रयविशोधनपरस्य त्रयोदशादित्रिकस्यार्थं क्रमादनुवदति -- अतीतेनाध्यायत्रयेणेति। गुणसङ्गतद्विपर्ययहेतुत्वमिति पाठः। कप्रत्ययप्रयोगाभावेऽप्यत्र बहुव्रीहित्वमेवेति।इति गुह्यतमं शास्त्रम् [15।20] इति पूर्वाध्यायान्ते शास्त्रमुपक्षिप्तम्। अनघभारतशब्दाभ्यां च तदधिकारी सूचितः। स एव हिमा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव [16।5] इति वक्ष्यते। तत्रोक्तार्थव्यवसायस्य शास्त्राधीनत्वात्पुरुषस्य शास्त्रवश्यत्वं तावद्वक्तव्यम्। तच्चतस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि [16।24] इत्यध्यायान्ते वक्ष्यति। तदर्थमेव च पूर्वाध्यायान्तसूचिताधिकारिविशेषविवेचनायात्रादौ दैवासुरविभागोक्तिः। तदभिप्रायेण संगृहीतंदैवासुरविभागोक्तिपूर्विका शास्त्रवश्यता। तत्त्वानुष्ठानविज्ञानस्थेम्ने षोडश उच्यते [गी.सं.20] इति। तदेतत्सर्वमभिप्रेत्याह -- अनन्तरमिति।उक्तस्य कृत्स्नस्यार्थस्येति -- वक्ष्यमाणस्यानुष्ठानविवेकस्याप्युपलक्षणम्। उक्तैकदेशविशोधनरूपत्वाद्वा तदविवक्षा। सङ्ग्रहश्लोकोक्तानुष्ठानमपिकृत्स्नस्येति विशेषणेन अन्तर्भावितम्। हेयोपादेयस्वभावकथनस्य हानोपादानार्थतया फलितमाह -- शास्त्रवश्यतां वक्तुमिति। शास्त्रवश्यत्वकथनेदेवासुरविभागोक्तिः कुत्रोपकुरुते तत्राह -- शास्त्रवश्यतद्विपरीतयोरिति। भगवदाज्ञा हि शास्त्रं? तदनुवर्तिनो देवास्तेनानुगृह्यन्ते अतस्तथा वर्तितव्यम्। तदाज्ञातिक्रामिणोऽसुरास्तेन निगृह्यन्ते अतस्तथा न वर्तितव्यमिति भावः। नैसर्गिकविरोधद्योतनायात्र वक्ष्यमाणसर्गशब्दोपादानम्। विभागोऽत्र गुणक्रियादिभिर्वक्ष्यमाणैःयया स्वप्नं (सुप्तं) भयं शोकम् [18।35] इत्यादिभिः। तमश्शीलं हि भयम् तत्सात्त्विकस्य दैवसर्गस्य न भवतीत्यभिप्रायेण भयनिरूपणार्थं तत्प्रतियोगिस्वरूपं शिक्षयति -- इष्टानिष्टेति। वियोगसंयोगशब्दाविष्टानिष्टाभ्यां यथाक्रममन्वेतव्यौ। इदं च स्वरूपकथनम् न तु भयलक्षणानुप्रविष्टम् आगामिदुःखहेतुदर्शनजं दुःखमित्येव हि तत्।सत्त्वसंशुद्धिः सत्त्वाधिष्ठानमन्तःकरणमिह सत्त्वम् तस्य समीचीना शुद्धिः संशुद्धिः सर्वदोषनिवृत्तिः। तत्र कन्दभूतरजस्तमोनिवृत्त्या कामरागासूयावञ्चनादिसर्वदोषनिवृत्तिमभिप्रेत्याह -- रजस्तमोभ्यामसंस्पृष्टत्वमिति। ज्ञानयोगशब्दोऽत्र न कर्मयोगादीनां व्यवच्छेदार्थः? तेषामपि सात्त्विकोपादेयत्वात् अतः कर्मज्ञानभक्तीनां साधारणं शास्त्रीयं शुद्धात्मस्वरूपविवेचनमिह विवक्षितमित्याह -- प्रकृतिवियुक्तेति। ज्ञानमेवात्रोपायत्वाद्योगः। यद्वा शास्त्रजन्यज्ञाननिष्पाद्यं चिन्तनं ज्ञानयोगः।न्यायार्जितेत्यादिकं दान्तस्य शास्त्रीयाकारप्रदर्शनम्? अनेवङ्करणस्य राजसतामसत्वेन वक्ष्यमाणत्वात्। एतच्च यथाविभवमनुसन्धेयम्। दमनं दमः तच्चान्तःकरणकर्मकं अमार्गान्निवर्तनं प्रकरणान्तरादिसिद्धमाह -- मनस इति। बाह्येन्द्रियनियमनं हि शान्तिशब्देन वक्ष्यति। एतेन केषाञ्चिदनयोः शब्दयोर्व्युत्क्रमेणार्थव्याख्यानं निरस्तम्।यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् [16।17] इत्यासुरयज्ञानां वक्ष्यमाणत्वादत्र मोक्षप्रकरणेऽभिमतं सात्त्विकं यज्ञविशेषमाह -- फलाभिसन्धिरहितेति। समस्तनित्यनैमित्तिकोपलक्षणतयाऽत्र यज्ञोपादानमित्यादिशब्दः। अपकृष्टदेवताविषयस्य अल्पफलकाम्यकर्मविधायकस्य च वेदभागस्य यावानर्थउदपानन्यायान्मुमुक्षुणाऽनभ्यसनीयत्वमाशङ्क्य तत्रापि त्रैवर्गिकवेदाभ्यासाद्व्यावृत्तिं प्रकरणलब्धामाह -- स विभूतेरिति। सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति [कठो.2।15] सर्वे वेदा यत्रैकं भवन्ति [आ.3।11।1] इत्यादिक्रमेणानुसन्धाय पठत उपनिषदभ्यासविधिप्रयुक्तस्य सर्वं प्रणवाष्टाक्षरषडक्षरद्विषट्कनिषदुपनिषदभ्यासकल्पमित्यभिप्रायः। एतेन अन्या वाचो विमुञ्चथ [मुं.उ.2।2।5] इत्यादिकमप्यन्यपरं निवृत्तम्?ओमित्ये(वं ध्यायथामात्मानं)वात्मानं ध्यायथ [मुं.उ.2।2।6] इति ध्यानदशायां प्रणवस्यैवोपादेयत्वे तात्पर्याच्च। यद्यपि स्वेनाधीयत इति स्वाध्यायः स्वशाखा? तथापिन चैकं प्रति शिष्यते इति न्यायात्सर्वशाखानुगतस्यार्थस्यानुसन्धेयत्वात्? जपविधेश्च सर्वत्राविशेषात्वेदाभ्यासनिष्ठेति सामान्येनोक्तम्। शास्त्रीयो भोगसङ्कोचस्तप इति लक्षिते तद्विशेषानुदाहरति -- कृच्छ्रेति।एकभु(भ)क्तेन नक्तेन तथैवायाचितेन च। उपवासेन (चैवायं पादकृच्छ्रः प्रकीर्तितः) दानेन न निर्द्वादशिको भवेत् [या.स्मृ.318अत्रिस्मृ.124] इत्यादिविहितद्वादशीसमाराधनार्थैकादश्युपवासोऽत्र द्वादश्युपवास इत्युक्तः। यद्वा तिथिव्रतेषु तिथिद्वयव्रते च द्वादश्युपवासोऽप्यस्त्येव। आदिशब्देन करणत्रयनिष्पाद्यानां वक्ष्यमाणानां तपसां ग्रहणम्। राजसतामसग्राह्यफलार्थतपोव्यवच्छेदार्थमाह -- भगवत्प्रीणनकर्मयोग्यतापादनस्येति। तपसा शुद्धस्य ह्यर्चनादिष्वधिकारः। अत्रान्येषामपि करणत्रयस्य स्वस्मिन्नैकरूप्यात्तद्व्यावृत्त्यर्थमाह -- परेष्विति।,
Sri Abhinavgupta
।।16.1 -- 16.5।।एतद्बुद्ध्वा इत्युक्तम्। बोधश्च नाम श्रुतिमयज्ञानान्तरम् (S श्रुत -- ) इदमित्थम् इत्येवंभूतयुक्तिचिन्ताभावनामयज्ञानोदेयेन (S??N चिन्तामयज्ञानोदयेन) विचारविमर्शपरमर्शादिरूपेण विजातीयन्यक्कारविरहिततद्भावनामयस्वभ्यस्ताकारविज्ञानलाभे सति भवति। यद्वक्ष्यते (S तद्वक्ष्यते N तद्वक्ष्यति) -- विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसी तथा कुरु (XVIII? 63) इति। तत्र श्रुतिमये ज्ञाने गुरुशास्त्रे एव प्राधान्येन प्रभवतः युक्तिचिन्ताभावनामये तु विमर्शक्षमता असाधारणा शिष्यगुणसंपत् ( -- रणशिष्य -- ) प्रधानभूता। अतः अर्जुनस्यास्त्येवासौ इत्यभिप्रायेण वक्ष्यमाणं विमृश्यैतत् इति वाक्यं सविषयं कर्तुं परिकरबन्धयोजनाभिप्रायेण आह भगवान् गुरुः अभयम् इत्यादि।आसुरभागसन्नविष्टा तामसी किल अविद्या। सा प्रवृद्धया दिव्यांशग्राहित्या विद्यया बाध्यते ( प्रवृद्धाया -- विद्याया बध्यते) इति वस्तुस्वभाव एषः। त्वं च विद्यात्मानं दिव्यमंशं सात्त्विकमभिप्रपन्नः तस्मादान्तरीं मोहलक्षणामविद्यां विहाय बाह्याविद्यात्मशत्रुहननलक्षणं (S बाह्यविद्या) शास्त्रीयव्यापारम् अनुतिष्ठ इत्यध्यायारम्भः।तथाहि -- अभयमित्यादि पाण्डवेत्यन्तम्। दिव्यांशस्य इमानि चिह्नानि तानि स्फुटमेवाभिलक्ष्यन्ते (S? स्फुटमेवोपलक्ष्यन्ते)। दमः (S omits दमः) इन्द्रियजयः। चापलं पूर्वापरमविमृश्य यत् करणम्? तदभावः अचापलम्। तेजः आत्मनि उत्साहग्रहणेन मितत्वापाकरणम्। दैवी संपदेषा। सा च तव विमोक्षाय? कामनापरिहारात्। अतस्त्वं शोकं मा प्रापः -- यथा भ्रात्रादीन् हत्वा सुखं कथमश्नुवीय इति। शिष्टं स्पष्टम्।
Sri Jayatritha
।।16.1।।अध्यायप्रतिपाद्यं दर्शयति -- पुमर्थेति। यद्यपि पूर्वयोरध्याययोः साधनप्रतिपादन एव तात्पर्यं? तथापि तन्न प्रपञ्चितम्। किं नाम बन्धस्वरूपम्। साधनमनुतिष्ठता च तद्विरोधिनां त्यागोऽवश्यं करणीयः। पूर्वाध्याये चनिर्मानमोहाः [15।5] इत्यादिना पुमर्थयोर्ज्ञानमोक्षयोः साधनंयतन्तोऽप्यकृतात्मानः [15।11] इत्यादिना तद्विरोधि च सङ्क्षेपेणोक्तम्? तदुभयमिदानीं प्रपञ्चनीयम्। सुरासुरलक्षणं च तथेति तदनेनाध्यायेन दर्शयतीत्यर्थः।तपो वक्ष्यमाणं इति कश्चित् (शां.) तदसत्?देवद्विजगुरुप्राज्ञ -- [17।14] इत्यादिनोक्तस्यात्र ग्रहणे शौचादेरपि तपोग्रहणेन गृहीतत्वात् पुनरुक्तिप्रसङ्गात्? अतो वक्ष्यमाणान्तर्गतं यदत्र पृथगुच्यते तद्व्यतिरिक्तमेव? तच्च प्रधानस्यैवोपलक्षणत्वोपपत्तेर्नोपवासादीति भावेन सप्रमाणकमाह -- तप इति।
Sri Madhusudan Saraswati
।।16.1।।अनन्तराध्यायेअधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके इत्यत्र मनुष्यदेहे प्राग्भवीयकर्मानुसारेण व्यज्यमाना वासनाः संसारस्यावान्तरमूलत्वेनोक्तास्ताश्च दैव्यासुरी राक्षसी चेति प्राणिनां प्रकृतयो नवमेऽध्याये सूचिताः। तत्र वेदबोधितकर्मात्मज्ञानोपायानुष्ठानप्रवृत्तिहेतुः सात्त्विकी शुभवासना दैवी प्रकृतिरित्युच्यते। एवं वैदिकनिषेधातिक्रमेण स्वभावसिद्धरागद्वेषानुसारिसर्वानर्थप्रवृत्तिहेतुभूता राजसी। तामसी चाशुभवासनासुरी राक्षसी च प्रकृतिरुच्यते। तत्रच विषयभोगप्राधान्येन रागप्राबल्यादासुरीत्वं? हिंसाप्राधान्येन द्वेषप्राबल्याद्राक्षसीत्वमिति विवेकः। संप्रति तु शास्त्रानुसारेण तद्विहितप्रवृत्तिहेतुभूता सात्त्विकी शुभवासना दैवी संपत्? शास्त्रातिक्रमेण तन्निषिद्धविषयप्रवृत्तिहेतुभूता राजसी? तामसी चाशुभवासना राक्षस्यासुर्योरेकीकरणेनासुरीसंपदिति द्वैराश्येन शुभाशुभवासनाभेदंद्वया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च इत्यादिश्रुतिप्रसिद्धः शुभानामादानायाशुभानां हानाय च प्रतिपादयितुं षोडशोऽध्याय आरभ्यते। तत्रादौ श्लोकत्रयेणादेयां दैवीं संपदं श्रीभगवानुवाच -- अभयमिति। शास्त्रोपदिष्टेऽर्थे संदेहं विनाऽनुष्ठाननिष्ठत्वं एकाकी सर्वपरिग्रहशून्यः कथं जीविष्यामीति भयराहित्यं वाऽभयम्? सत्त्वस्यान्तःकरणस्य शुद्धिर्निर्मलता तस्याः सम्यक्ता भगवत्तत्त्वस्फूर्तियोग्यता सत्त्वसंशुद्धिः परवञ्चनमायानृतादिपरिवर्जनं वा परस्य व्याजेन वशीकरणं परवञ्चनं? हृदयेऽन्यथा कृत्वा बहिरन्यथा व्यवहरणं माया? अयथादृष्टकरणमनृतमित्यादि? ज्ञानं शास्त्रादात्मतत्त्वस्यावगमः? चित्तैकाग्रंतयां तस्य स्वानुभवारूढत्वं योगस्तयोर्व्यवस्थितिः सर्वदा तन्निष्ठता ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। यदा तु अभयं सर्वभूताभयदानसंकल्पपालनं एतच्चान्येषामपि परमहंसधर्माणामुपलक्षणम्। सत्त्वसंशुद्धिश्रवणादिपरिपाकेणान्तःकरणस्यासंभावनाविपरीतभावनादिमलराहित्यं। ज्ञानमात्मसाक्षात्कारः। योगो मनोनाशवासनाक्षयानुकूलः पुरुषप्रयत्नस्ताभ्यां विशिष्टा संसारिविलक्षणावस्थितिर्जीवन्मुक्तिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिरित्येवं व्याख्यायते तदा फलभूतैव दैवी संपदियं द्रष्टव्या। भगवद्भक्तिं विनान्तःकरणसंशुद्धेरयोगात्तया सापि कथितामहात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः। भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् इति नवमे दैव्यां संपदि भगवद्भक्तेरुक्तत्वाच्च भगवद्भक्तेरतिश्रेष्ठत्वादभयादिभिः सह पाठो न कृत इति द्रष्टव्यम्। महाभाग्यानां परमहंसानां फलभूतां दैवीं संपदमुक्त्वा ततो न्यूनानां गृहस्थादीनां साधनभूतामाह -- दानं स्वस्वत्वास्पदानामन्नादीनां यथाशक्ति शास्त्रोक्तः संविभागः। दमो बाह्येन्द्रियसंयमः ऋतुकालाद्यतिरिक्तकाले मैथुनाद्यभावः। चकारोऽनुक्तानां निवृत्तिलक्षणधर्माणां समुच्चयार्थः। यज्ञश्च श्रौतोऽग्निहोत्रदर्शपूर्णमासादिः? स्मार्तो देवयज्ञः पितृयज्ञो भूतयज्ञो मनुष्ययज्ञ इति चतुर्विधः। ब्रह्मयज्ञस्य स्वाध्यायपदेन पृथगुक्तेः। चकारोऽनुक्तानां प्रवृत्तिलक्षणधर्माणां समुच्चयार्थः। एतत्त्रयं गृहस्थस्य। स्वाध्यायो ब्रह्मयज्ञः अदृष्टार्थमृग्वेदाद्यध्ययनरूपो यज्ञशब्देन पञ्चविधमहायज्ञोक्तिसंभवेऽप्यसाधारण्येन ब्रह्मचारिधर्मत्वकथनार्थं पृथगुक्तिः। तपस्त्रिविधं शारीरादि सप्तदशे वक्ष्यमाणं वानप्रस्थस्यासाधारणो धर्मः। एवं चतुर्णामाश्रमाणामसाधारणान्धर्मानुक्त्वा चतुर्णां वर्णानामसाधारणधर्मानाह -- आर्जवं अवक्रत्वं श्रद्दधानेषु श्रोतृषु स्वज्ञातार्थासंगोपनम्।
Sri Purushottamji
।।16.1।।विमुक्तिबन्धज्ञानार्थं दैवीसम्पत्तथाऽऽसुरी। सलक्षणा सकार्या च षोडशे विनिरूप्यते।।1।।पूर्वाध्यायान्तेएतद्बुद्धा बुद्धिमान् कृतकृत्यः स्यात् [15।20] इत्युक्तम्? तत्र सृष्टौ बहव एव बुद्धिमन्तो दृश्यन्ते ते कथं नैतज्ज्ञानार्थं यतन्ते यतमानेष्वपि कथं न सर्वे एव ज्ञात्वा भजनेन कृतकृत्या भवन्ति इत्याशङ्क्याऽत्र दैवजीवा दैव्यामेव सम्पदि जाता अधिकारिणो यतमानाः कृतकृत्या भवन्तीति ज्ञापनाय दैवीसम्पत्स्वरूपमाह -- अभयमित्यादित्रयेण। अभयं भयाभावः? कालादिसर्वनियामकत्वेनेश्वरज्ञानात् सत्त्वस्य चित्तस्य सम्यक् शुद्धिः गुरूपसत्त्यादिना प्राप्तभगवन्नामावृत्त्या भगवत्परत्वम्? ज्ञानयोगव्यवस्थितिः ज्ञानयोगे भगवज्ज्ञानोपाये व्यवस्थितिरेकाग्रतया स्थितिः? दानं यथाशक्त्यनभिलाषेण भगवत्प्रीत्यर्थमन्नादिविभागः? दम इन्द्रियनिग्रहः? यज्ञो यथाशक्ति यथाविधि यथाधिकारमग्निहोत्रादिकरणम्। चकारेण भगवद्विभूतिज्ञानेन? नान्यथेत्युच्यते। स्वाध्यायो ब्राह्मयज्ञादिः? तपो भगवदर्थं देहादिक्लेशः? आर्जवं कौटिल्यराहित्यम्।
Sri Shankaracharya
।।16.1।। --,अभयम् अभीरुता। सत्त्वसंशुद्धिः सत्त्वस्य अन्तःकरणस्य संशुद्धिः संव्यवहारेषु परवञ्चनामायानृतादिपरिवर्जनं शुद्धसत्त्वभावेन व्यवहारः इत्यर्थः।।ज्ञानयोगव्यवस्थितिः ज्ञानं शास्त्रतः आचार्यतश्च आत्मादिपदार्थानाम् अवगमः? अवगतानाम् इन्द्रियाद्युपसंहारेण एकाग्रतया स्वात्मसंवेद्यतापादनं योगः? तयोः ज्ञानयोगयोः व्यवस्थितिः व्यवस्थानं तन्निष्ठता। एषा प्रधाना दैवी सात्त्विकी संपत्। यत्र येषाम् अधिकृतानां या प्रकृतिः संभवति? सात्त्विकी सा उच्यते। दानं यथाशक्ति संविभागः अन्नादीनाम्। दमश्च बाह्यकरणानाम् उपशमः अन्तःकरणस्य उपशमं शान्तिं वक्ष्यति। यज्ञश्च श्रौतः अग्निहोत्रादिः। स्मार्तश्च देवयज्ञादिः? स्वाध्यायः ऋग्वेदाद्यध्ययनम् अदृष्टार्थम्। तपः वक्ष्यमाणं शारीरादि। आर्जवम् ऋजुत्वं सर्वदा।।किं च --,
Sri Vallabhacharya
।।16.1 -- 16.3।।पूर्वाध्यायेयो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् [15।19] इत्युक्तं? तत्रबुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः इत्युक्तत्वादसम्मूढस्य दैवत्वं? तदितरस्य चासुरत्वमिति विभजन् पूर्वं दैवीं सम्पदमाह त्रिभिः श्रीभगवान् -- अभयमिति। एते षड्विंशतिगुणाः दैवीं सम्पदमभिजातस्य भवन्ति? देवसम्बन्धिनी दैवी। देवा भगवद्वचनानुवर्त्तिर्धमशीलास्तेषां सम्पत्साधनरूपा सामग्री सृष्टिर्वा? सा च भगवन्निगमधर्मानुवर्त्तिकैव? तामभिजातस्य दैवजीवस्य भवन्तीत्यर्थः।