Bhagavad Gita · Chapter 18 · Verse 17

यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते।।18.17।।
yasya nāhankṛito bhāvo buddhir yasya na lipyate hatvā ‘pi sa imāl lokān na hanti na nibadhyate
साधक संजीवनी — स्वामी रामसुखदास
।।18.17।। व्याख्या --   यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते -- जिससे मैं करता हूँ -- ऐसा अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धिमें मेरको फल मिलेगा -- ऐसे स्वार्थभावका लेप नहीं है। इसको ऐसे समझना चाहिये -- जैसे शास्त्रविहित और शास्त्रनिषिद्ध -- ये सभी क्रियाएँ एक प्रकाशमें होती हैं और प्रकाशके ही आश्रित होती हैं परन्तु प्रकाश किसी भी क्रियाका कर्ता नहीं बनता अर्थात् प्रकाश उन क्रियाओँको न करनेवाला है और न करानेवाला है। ऐसे ही स्वरूपकी सत्ताके बिना विहित और निषिद्ध -- कोई भी क्रिया नहीं होती परन्तु वह सत्ता उन क्रियाओंको न करनेवाली है और न करानेवाली है -- ऐसा जिसको साक्षात् अनुभव हो जाता है? उसमें मैं क्रियाओंको करनेवाला हूँ -- ऐसा अहंकृतभाव नहीं रहता और अमुक चीज चाहिये? अमुक चीज नहीं चाहिये अमुक घटना होनी चाहिये? अमुक घटना नहीं होनी चाहिये -- ऐसा बुद्धिमें लेप (द्वन्द्वमोह) नहीं रहता। अहंकृतभाव और बुद्धिमें लेप न रहनेसे उसके कर्तृत्व और भोक्तृत्व -- दोनों नष्ट हो जाते हैं अर्थात् अपनेमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व -- ये दोनों ही नहीं हैं? इसका वास्तविक अनुभव हो जाता है।प्रकृतिका कार्य स्वतःस्वाभाविक ही चल रहा है? परिवर्तित हो रहा है और अपना स्वरूप केवल उसका प्रकाशक है -- ऐसा समझकर जो अपने स्वरूपमें स्थित रहता है? उसमें मैं करता हूँ ऐसा अहंकृतभाव नहीं होता क्योंकि अंहकृतभाव प्रकृतिके कार्य शरीरको स्वीकार करनेसे ही होता है। अहंकृतभाव सर्वथा मिटनेपर उसकी बुद्धिमें फल मेरेको मिले ऐसा लेप भी नहीं होता अर्थात् फलकी कामना नहीं होती।अहंकृतभाव एक मनोवृत्ति है। मनोवृत्ति होते हुए भी यह भाव स्वयं(कर्ता)में रहता है क्योंकि कर्तृत्व और अकर्तृत्व भाव स्वयं ही स्वीकार करता है।हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते -- वह इन सम्पूर्ण प्राणियोंको एक साथ मार डाले? तो भी वह मारता नहीं क्योंकि उसमें कर्तृत्व नहीं है और वह बँधता भी नहीं क्योंकि उसमें भोक्तृत्व नहीं है। तात्पर्य यह है कि उसका न क्रियाओंके साथ सम्बन्ध है और न फलके साथ सम्बन्ध है।वास्तवमें प्रकृति ही क्रिया और फलमें परिणत होती है। परन्तु इस वास्तविकताका अनुभव न होनेसे ही पुरुष (चेतन) कर्ता और भोक्ता बनता है। कारण कि जब अहंकारपूर्वक क्रिया होती है? तब कर्ता? करण और कर्म -- तीनों मिलते हैं और तभी कर्मसंग्रह होता है। परन्तु जिसमें अहंकृतभाव नहीं रहा? केवल सबका प्रकाशक? आश्रय? सामान्य चेतन ही रहा? फिर वह कैसे किसको मारे और कैसे किससे बँधे उसका मारना और बँधना सम्भव ही नहीं है (गीता 2। 19)।सम्पूर्ण प्राणियोंको मारना क्या है जिसमें अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धिमें लेप नहीं है -- ऐसे मनुष्यका शरीर जिस वर्ण और आश्रममें रहता है? उसके अनुसार उसके सामने जो परिस्थिति आ जाती है? उसमें प्रवृत्त होनेपर उसे पाप नहीं लगता। जैसे? किसी जीवन्मुक्त क्षत्रियके लिये स्वतः युद्धकी परिस्थिति प्राप्त हो जाय तो वह उसके अनुसार सबको मारकर भी न तो मारता है और न बँधता है। कारण कि उसमें अभिमान और स्वार्थभाव नहीं है।यहाँ अर्जुनके सामने भी युद्धका प्रसङ्ग है। इसलिये भगवान्ने हत्वापि पदसे अर्जुनको युद्धके लिये प्रेरणा की है। अपि पदका भाव हैं -- कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः (गीता 4। 20) कर्मोंमें अच्छी तरह प्रवृत्त होनेपर भी वह कुछ नहीं करता। सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते (गीता 6। 31) सर्वथा बर्ताव करता हुआ भी वह योगी मेरेमें रहता है। शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते (गीता 13। 31) शरीरमें स्थित होनेपर भी न करता है और न लिप्त होता है। तात्पर्य यह है कि कर्मोंमें साङ्गोपाङ्ग प्रवृत्त होनेके समय और जिस समय कर्मोंमें प्रवृत्त नहीं है? उस समय भी स्वरूपकी निर्विकल्पता ज्योंकीत्यों रहती है अर्थात् क्रिया करनेसे अथाव क्रिया न करनेसे स्वरूपमें कुछ भी फरक नहीं पड़ता। कारण कि क्रियाविभाग प्रकृतिमें है? स्वरूपमें नहीं।वास्तवमें यह अहंभाव (व्यक्तित्व) ही मनुष्यमें भिन्नता करनेवाला है। अहंभाव न रहनेसे परमात्माके साथ भिन्नताका कोई कारण ही नहीं है। फिर तो केवल सबका आश्रय? प्रकाशक सामान्य चेतन रहता है। वह न तो क्रियाका कर्ता बनता है? और न फलका भोक्ता ही बनता है। क्रियाओंका कर्ता और फलका भोक्ता तो वह पहले भी नहीं था। केवल नाशवान् शरीरके साथ सम्बन्ध मानकर जिस अहंभावको स्वीकार किया है? उसी अहंभावसे उसमें कर्तापन और भोक्तापन आया है।अहम् दो प्रकारका होता है -- अहंस्फूर्ति और अहंकृति। गाढ़ नींदसे उठते ही सबसे पहले मनुष्यको अपने होनेपन(सत्तामात्र) का भान होता है? इसको अहंस्फूर्ति कहते हैं। इसके बाद वह अपनेमें मैं अमुक नाम? वर्ण? आश्रम आदिका हूँ -- ऐसा आरोप करता है? यही असत्का सम्बन्ध है। असत्के सम्बन्धसे अर्थात् शरीरके साथ तादात्म्य माननेसे शरीरकी क्रियाको लेकर मैं करता हूँ -- ऐसा भाव उत्पन्न होता है? इसको अहंकृति कहते हैं।अहम् को लेकर ही अपनेमें परिच्छिन्नता आती है। इसलिये अहंस्फूर्तिमें भी किञ्चित् परिच्छिन्नता (व्यक्तित्व) रह सकती है। परन्तु यह परिच्छिन्नता बन्धनकारक नहीं होती अर्थात् परिच्छिन्नता रहनेपर भी अहंस्फूर्ति दोषी नहीं होती। कारण कि अहंकृति अर्थात् कर्तृत्वके बिना अपनेमें गुणदोषका आरोप नहीं होता।,अहंकृति आनेसे ही अपनेमें गुणदोषका आरोप होता है? जिससे शुभअशुभ कर्म बनते हैं। बोध होनेपर अहंस्फूर्तिमें जो परिच्छिन्नता है? वह जल जाती है और स्फूर्तिमात्र रह जाती है। ऐसी स्थितिमें मनुष्य न मारता है और न बँधता है।न हन्ति न निबध्यते (न मारता है और न बँधता है) का क्या भाव है एक निर्विकल्पअवस्था होती है और एक निर्विकल्पबोध होता है। निर्विकल्पअवस्था साधनसाध्य है और उसका उत्थान भी होता है अर्थात् वह एकरस नहीं रहती। इस निर्विकल्पअवस्थासे भी असङ्गता होनेपर स्वतःसिद्ध निर्विकल्पबोधका अनुभव होता है। निर्विकल्पबोध साधनसाध्य नहीं है और उसमें निर्विकल्पता किसी भी अवस्थामें किञ्चिन्मात्र भी भंग नहीं होती। निर्विकल्पबोधमें कभी परिवर्तन हुआ नहीं? होगा नहीं और होना सम्भव भी नहीं। तात्पर्य है कि उस निर्विकल्पबोधमें कभी हलचल आदि नहीं होते? यही न हन्ति न निबध्यते का भाव है।अहंकृतभाव और बुद्धिमें लेप न रहनेका उपाय क्या है क्रियारूपसे परिवर्तन केवल प्रकृतिमें ही होता है और उन क्रियाओंका भी आरम्भ और अन्त होता है तथा उन कर्मोंके फलरूपसे जो पदार्थ मिलते हैं? उनका भी संयोगवियोग होता है। इस प्रकार क्रिया और पदार्थ -- दोनोंके साथ संयोगवियोग होता रहता है। संयोगवियोग होनेपर भी स्वयं तो प्रकाशकरूपसे ज्योंकात्यों ही रहता है। विवेकविचारसे ऐसा अनुभव होनेपर अहंकृतभाव और बुद्धिमें लेप नहीं रहता। सम्बन्ध --   ज्ञान और प्रवृत्ति (क्रिया) दोषी नहीं होते? प्रत्युत कर्तृत्वाभिमान ही दोषी होता है क्योंकि कर्तृत्वाभिमानसे ही कर्मसंग्रह होता है -- यह बात आगेके श्लोकमें बताते हैं।
Sri Anandgiri
।।18.17।।विपरीतदृष्टेर्दुर्मतित्वं शिष्ट्वा सम्यग्दृष्टेः सुमतित्वं प्रश्नपूर्वकमाह -- कः पुनरित्यादिना। अहं कर्तेत्यात्मनि कर्तृत्वप्रत्ययाभावे कुत्र कर्तृत्वधीरित्याशङ्क्याह -- एत इति। कथं तर्हि कर्तृत्वधीरात्मनीत्याशङ्क्याधिष्ठानादीनां तद्व्यापाराणां च साक्षित्वादित्याह -- अहं त्विति। आत्मनो न स्वतोऽस्ति क्रियाशक्तिमत्त्वमित्यत्र प्रमाणमाह -- अप्राणो हीति। नापि तस्य स्वतो ज्ञानशक्तिमत्त्वमित्याह -- अमना इति। उपाधिद्वयासंबन्धे शुद्धत्वं फलितमाह -- शुभ्र इति। कारणसंबन्धादशुद्धिमाशङ्क्योक्तं -- अक्षरादिति। कार्यकारणयोरात्मास्पर्शित्वेन पार्थक्ये सद्वितीयत्वमाशङ्क्य तयोरवस्तुत्वान्मैवमित्याह -- केवल इति। जन्मादिसर्वविक्रियारहितत्वेन कौटस्थ्यमाह -- अविक्रिय इति। बुद्धिर्यस्येत्यादि व्याचष्टे -- बुद्धिरिति। नानुशायिनी नानुशयवती। न क्लेशशालिनीत्यर्थः। द्वितीयपादस्याक्षरार्थमुक्त्वा वाक्यार्थमाह -- इदमिति। पापं कर्मेदमा परामृश्यते। लोकानां प्राणसंबन्धाभावे कुतो हिंसेत्याशङ्क्याह -- प्राणिन इति। विरुद्धार्थोक्त्या स्तुतिरपि न युक्तेति शङ्कते -- नन्विति। विरोधं परिहरति -- नैष दोष इति। लौकिकदृष्टिमवष्टभ्य हत्वापीति निर्देशं विशदयति -- देहादीति। तात्त्विकीं दृष्टिमास्थाय न हन्तीत्यादि निर्देशमुपपादयति -- यथेति। नाहं कर्ता किंतु कर्तृतद्व्यापारयोः साक्षी क्रियाज्ञानशक्तिमदुपाधिद्वयविनिर्मुक्तः शुद्धः सन् कार्यकारणासंबन्धोऽद्वितीयोऽविक्रिय इत्येवं पारमार्थिकदृष्टेर्यथादर्शितत्वं द्रष्टव्यम्। हत्वापीत्येतन्न हन्तीत्यादि चोभयं दृष्टिद्वयावष्टम्भादुपपन्नमित्युपसंहरति -- तदुभयमिति। केवलमेवात्मानं कर्तारं पश्यन्दुर्मतिरित्यत्रात्मविशेषणसमर्पककेवलशब्दसामर्थ्यादात्मनो विशिष्टस्य कर्तृत्वमिति शङ्कते -- नन्विति। आत्मनो वैशिष्ट्यायोगान्न विशिष्टस्यापि कर्तृत्वमिति दूषयति -- नैष दोष इति। अविक्रियस्वाभाव्येऽपि कथमात्मनोऽसंहतत्वमित्याशङ्क्याह -- विक्रियेति। अधिष्ठानादिभिरात्मनः संहननेऽपि न कर्तृत्वमविक्रियस्य क्रियान्वयव्याघातादित्याह -- संहत्येति। संहतत्वानुपपत्तिं व्यक्तीकरोति -- नत्विति। असंहतत्वे फलितमाह -- इति नेति। कथं तर्हि केवलत्वमात्मनि केवलशब्दादुक्तं तदाह -- अत इति। अकर्तृत्वमात्मनोऽभ्युपपन्नं नास्याविक्रियत्वमुपैतीत्याशङ्क्याह -- अविक्रियत्वं चेति। तत्र स्मृतिवाक्यान्युदाहरति -- अविकार्योऽयमिति। नायं हन्ति न हन्यत इत्यादिवाक्यमादिशब्दार्थः। उक्तवाक्यानामात्माविक्रियत्वे तात्पर्यं सूचयति -- असकृदिति। निष्कलं निष्क्रियं शान्तमित्यादि वाक्यं श्रुतावादिशब्दार्थः? यानि वाक्यानि तैरात्मनोऽविक्रियत्वं दर्शितमिति योजना? न्यायतश्च तद्दर्शितमिति पूर्वेण संबन्धः। न्यायमेव दर्शयति -- निरवयवमिति। न तावेदात्मा स्वतो विक्रियते निरवयवत्वादाकाशवन्नापि परतोऽसङ्गस्याकार्यस्य पराधीनत्वायोगादित्यर्थः। किंचात्मनः स्वनिष्ठा वा,विक्रियाधिष्ठानादिनिष्ठा वा? नाद्यः स्वनिष्ठविक्रियानुपपत्तेरात्मनो दर्शितत्वादित्याशयेनाह -- विक्रियावत्त्वेति। सा चायुक्तेत्युक्तमिति शेषः। द्वितीयं दूषयति -- नेत्यादिना। अधिष्ठानादिकृतमपि कर्म तद्योगादात्मन्यागच्छतीत्याशङ्क्य तदागमनं वास्तवमाविद्यं वेति विकल्प्याद्यं दूषयति -- नहीति। द्वितीयं निरस्यति -- यत्त्विति। आत्मन्यविद्याप्रापितं कर्म नात्मीयमित्येतद्दृष्टान्ताभ्यामुपपादयति -- यथेत्यादिना। आत्मनोऽविक्रियत्वेन कर्तृत्वाभावे फलितमाह -- तस्मादिति। ननु प्रागेवात्मनोऽविक्रियत्वं प्रतिपादितं तदिह कस्मादुच्यते तत्राह -- नायमिति। शास्त्रादौ प्रतिज्ञातं हेतुपूर्वकं संक्षिप्योक्त्वा मध्ये तत्र तत्र प्रसङ्गं कृत्वा प्रसारितां कर्माधिकारनिवृत्तिमिहोपसंहरतीति संबन्धः। प्रतिज्ञातस्य हेतुनोपपादितस्यान्ते निगमनं किमर्थमित्याशङ्क्याह -- शास्त्रार्थेति। कर्माधिकारो विदुषो नेति स्थिते तस्य देहाभिमानाभावे सत्यविद्योत्थसर्वकर्मत्यागसिद्धेरनिष्टमिष्टं मिश्रं चेति त्रिविधं कर्मफलं संन्यासिनां नेति प्रागुक्तं युक्तमेवेति परमप्रकृतमुपसंहरति -- एवंचेति। ये पुनरविद्वांसो देहाभिमानिनस्तेषां त्रिविधं कर्मफलं संभवत्येवेति हेतुवचनसिद्धमर्थं निगमयति -- तद्विपर्ययाच्चेति। अधिष्ठानादिकृतं कर्म नात्मकृतमविदुषामेव कर्माधिकारो देहाभिमानित्वेन तत्त्यागायोगाद्देहाभिमानाभावात्तु विदुषां कर्माधिकारनिवृत्तिरित्युपसंहृतमर्थं संक्षिप्याह -- इत्येष इति। उक्तश्च गीतार्थो वेदार्थत्वादुपादेय इत्याह -- स एष इति। कथमयमर्थो वेदार्थोऽपि प्रतिपत्तुं शक्यते तत्राह -- निपुणेति। भाष्यकृता मानयुक्तिभ्यां विभज्यानुक्तत्वान्नास्यार्थस्योपादेयत्वमित्याशङ्क्याह -- तत्रेति।
Sri Dhanpati
।।18.17।।कः पुनः सुमतिः यः सम्यक्पश्यतीत्यपेक्षायामाह -- यस्येति। यस्य शास्त्राचार्योपदेशन्यासंस्कृतबुद्धित्वादहंकृतोऽहंकर्तेत्येवंलक्षणो भावो भावनाप्रत्ययः एते एव पञ्चाधिष्ठानदयोऽविद्ययात्मनि कल्पिताः सर्वकर्मणां कर्तारो नाहमहं तु तद्य्वापराणां साक्षिभूतोअप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः?केवलोऽविक्रियश्चे त्येवं पश्यतोऽहंकृतो भावो नास्तीत्यर्थः। बुद्धिर्यस्य न लिप्यते बुद्धिरन्तःकरणं यस्यात्मन उफाधिभूता न लिप्यतेऽहमकार्ष तेनाहं नरकं गमिष्टामिति क्लेशशालिनी न भवतीत्यर्थः। स सुमतिः कृतबुद्धिः सम्यक् द्रष्टा इमान्प्रत्यक्षादिनानुभूयमानान् लोकान्प्राणिनो हत्वापि न हन्ति हननक्रियां न करोति कर्तृत्वाभिमानरहितत्वात्। न निंबध्यते नापि तत्कार्येण हननक्रियाफलेन संबध्यते निर्लिप्तबुद्धित्वात्। भावः सद्भावः अहंकृतोऽहमिति व्यपदेशार्हो न? अहंकारबाधेन शुद्धस्वरुपमात्रपरिशेषादिति वाहंकृतोऽहंकारस्य भावस्तत्तादात्म्यं यस्य न विवेकेन बाधितत्वादितिवेति केचित्। यस्य नाहंकृत इति समानाधिकरणे षष्ठ्यौ। ततश्च यस्य लिङ्गलक्षणस्योपाधेरहंकारात्मिकां वृत्तिमनुत्पादयतोऽहमध्यसशून्यस्वभावः सत्ता। यद्वाहमहंकृतिं करोतीत्यहंकृदन्तःकरणं यस्य संबन्धिनोऽहंकृतोऽन्तःकरणस्य न भावः न स्थितिः। अहंकृतिशून्यं यस्यान्तःकरणमित्यर्थः। तथाहमा कृतोऽहमध्यासमूलक इतियावत्। एवंविधो भावः पदार्थो ममेत्यध्यासरुपो यस्य लिङ्गात्मनो नास्तीत्युभयविधाध्यासशून्यत्वमुक्तं भवति। यस्य प्रमातुर्भावः प्रत्ययमात्रस्वरुप आत्मा नाहंकृतः अहमिव कृतोऽहंकारतादात्म्यप्रापितोऽहंकृतस्तथा न यस्य बुद्धिर्लिप्यते आत्मभावेन रञ्जिता न भवति यस्य बुद्धेर्व्यतिरिक्तमात्मानं पश्यतो बुद्धिधर्माः कर्तृत्वादयो नात्मनि प्रतीयन्ते इति कर्त्रात्मवादितार्किकनिरासः। यस्यच आत्मधर्माश्यैतन्यादयो बुद्धौ न संसृज्यन्ते इति बुद्धमेव चेतनां वदतो बौद्धस्य निरासः। चिदचितोरन्योन्यस्मिन्नन्योन्यधर्माध्यासो यस्य नास्तीत्यर्थ इत्यन्ते। यस्य बुद्धिः शास्त्राचार्यसमाहिता तैलधारेवाविच्छिन्ना न लिप्यते विजातीयप्रत्ययलेपं न प्राप्नोति स पश्यतीति स विद्वानिति पूर्वश्लोकस्य पश्यतिपदानुषङ्गेण योज्यम्। कथंपुनरयमेवंविध इति ज्ञेयमित्याशङ्क्य चेष्टालिङ्गकमनुमानमाह -- हत्वापीति। हन्धातुनात्र तदुपाया लक्ष्यन्ते अवस्थितानिति चाध्याह्नियन्ते। ततश्च हिंसोपायभूतान्पाषाणप्रहरणादीनुपायान्कृत्वावस्थितनिमाँल्लोकान्स्वयं न हन्ति अहंममाभिमानशून्यत्वादित्यर्थः। अतश्च न निबध्यते नास्य बन्धो जीवन्मुक्तत्वादिरितीतरे। हत्वापि न हन्ति न निबध्यत इतिवाक्यशेषे हेतुत्वेन प्रतीयमानस्य यस्येत्यादेः? एतत्फलभूतेन प्रतीयमानस्य हत्वापीत्यादे श्च पूर्वपरानुगुण्येन व्याख्यानं कृतवतां सर्वज्ञानां मार्गप्रदर्शकानां भाष्यकृतामुदाहृतयत्किंत्कल्पनाकरणेन न्यूनता नापादनीया। ननु यद्यपि स्तुरिरियं तथापि हत्वापि न हन्तीति विप्रतिषिद्धमुच्यामानं कथमुपद्यत इतिचेत् देहाद्यात्मबुद्य्धा हन्ताहमिति हि लोकैर्द़्दश्यते। नाहं कर्ता किंतु तद्य्वापारसाक्षी क्रियाज्ञानशक्तिमदुपाधिद्वयविनिर्मुक्तः शुद्धःसन् कार्यकारणासंबद्धोऽद्वितीयोऽविक्रिय इत्येवं हि विद्वान्पश्यति लौकिकीं पारमार्थिकीं च दृष्टिमाश्रित्य तदुभयमुपपद्यत एवेति गृहाण। तथाच यः केवलमात्मानं अकर्तारं कर्तारं पश्यति स दुर्मतिः। यस्तु यथाभूतं आत्मानमकर्तारं पश्यति स सुमतिरिति द्वयोः संपिण्डितार्थः। ननुआत्मानं केवलं तु यः इति केवलपदप्रयोगादधिष्ठानादिविशिष्टः करोत्येव आत्मा। एवंविशिष्टस्य कर्तत्वे सति केवलमात्मानं यः कर्तारं पश्यति स दर्मतिरितिचेन्न। श्रुतिदधिष्ठानादिविशिष्टः करोत्येव आत्मा। एवंविशिष्टस्य कर्तृत्वे सति केवलमात्मानं यः कर्तारं पश्यति स दुर्मतिरितिचेन्न। श्रुतिस्मृत्यादिभिरात्मनोऽविक्रियस्वभावत्वप्रतिपादनात्। तथाच श्रुतिःअसङ्गो ह्ययं पुरुषःसाक्षी चेता केवलो निर्गुणश्चअप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परःअज आत्मा महान्ध्रुवःनिष्फलं निष्क्रियंध्यायतीव लेलायतीव इत्येवमाद्या। स्मृतयश्चकथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कंअविकार्योऽयमुच्यतेप्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यतेशरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते इत्येवमाद्याः। न्यायाश्च न तावदात्मास्वतो विक्रियते निरवयवत्वादाकाशवत्। नापि परतोऽसङ्गस्याविकार्यस्य स्वतन्त्रस्य परतो विक्रियावत्त्वायोगात्। किंचात्मनो विक्रियावत्त्वाभ्युपगमे तस्य स्वनिष्ठाविक्रिया अधिष्ठानादिनिष्ठा वा। नाद्यः। श्रुत्यादिभिरात्मनोऽविक्रियत्वप्रतिपादनात्। न द्वितीयः। अन्यनिष्ठाविक्रियाऽन्यस्मिन्निति विप्रतिषिद्धत्वात्। अविद्यया गमितमपि नान्यनिष्ठत्वमन्यस्य यथा रजतत्वं न शुक्तिकायां यथा तलमलिनत्वं बाहैर्गमितमविद्यया नाकाशस्य तथाधिष्ठानादिविक्रियापि तेषामेव नात्मनस्तस्मादविक्रियस्यात्मनः केनचित्संहननं संहत्य वा कर्तत्वं संभवतीति केवलत्वामात्मनः स्वाभाविकं केवलशब्दोऽनुवदति। नायं हन्ति न हन्यत इति प्रतिज्ञाय न जायत इत्यादिना हेतुवचनेनाविक्रियत्वमुक्त्वा वेदाविनाशिनमिति विदुषः कर्माधिकारनिवृत्तिं शास्त्रादौ संक्षेपत उक्त्वा तत्रतत्र प्रसङ्गं कृत्वा प्रसारितं न हन्ति न निबध्यत इत्युपसंहरति।,एवंसति देहभृत्त्वाभिमानानुपपत्त्वाविद्याकृताशेषकर्मसंन्यासेपपत्तेः परमार्थसंन्यासिनामनिष्टादित्रिविधं कर्मणः फलं न भवतीत्युपपन्नं तद्विपर्ययश्चेतरेषां भवतीत्येतच्चापरिहार्यमित्येष गीताशास्त्रस्यार्थ उपसंहृतः। स एष वेदार्थसारो निपुणमतिभिः पण्डितैर्विचार्ये प्रतिपत्तव्य इति।
Sri Madhavacharya
।।18.17।।तज्ज्ञानं स्तौति -- यस्येति। यस्त्वीषद्बध्यते स ईषदहङ्कारी च।
Sri Neelkanth
।।18.17।।द्वितीयं प्रयोजनमाह -- यस्येति। यस्य प्रमातुर्भावः प्रत्ययमात्रस्वरूप आत्मा नाहंकृतः अहमिव कृतः अहंकारतादात्म्यं प्रापितोऽहंकृतस्तथा न। यस्य बुद्धिर्न लिप्यते आत्मभावेन रञ्जिता न भवति। यस्य बुद्धेर्व्यतिरिक्तमात्मानं पश्यतो बुद्धिधर्माः कर्तृत्वादयो नात्मनि प्रतीयन्त इति कर्त्रात्मवादितार्किकनिरासः। यस्य च आत्मधर्माश्चैतन्यादयो बुद्धौ न संसृज्यन्त इति बुद्धिमेव चेतनां वदतो बौद्धस्य निरासः। चिदचितोरन्योन्यस्मिन्नन्योन्यधर्माध्यासो बाध्यत इति दुःखादिसंसर्गनिषेधेन भोक्तृत्वाभावो दर्शितः।हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते इति तु स्तुतिमात्रम्। कर्तृत्वस्यैव बाधेन हन्तृत्वायोगात्? दग्धपटवत्कर्तृत्वानुवृत्तावपि हननक्रियायां प्रवर्तकस्य रागद्वेषादेरभावाच्च। एतेनात्मनस्तात्त्विकमकर्तृत्वं भावयता कृतं कर्मातात्त्विककर्तृत्वाभिमाननिमित्तं स्वफलं प्रस्तोतुं नार्हतीति दर्शितम्। नहि रज्जुसर्पे रज्जुबुद्धिं कृत्वा प्रहरतः सर्पक्षोभजं दंशनादिफलं भवति। सर्पे तु तथा कुर्वतस्तद्भवत्येव तद्वदिदमपि ज्ञेयम्।
Sri Ramanujacharya
।।18.17।।परमपुरुषकर्तृत्वानुसन्धानेन यस्य भावः कर्तृत्वविशेषविषयो मनोवृत्तिविशेषो न अहंकृतो न अहमभिमानकृतःअहं करोमि इति ज्ञानं यस्य न विद्यते इत्यर्थः। बुद्धिः यस्य न लिप्यते? अस्मिन् कर्मणि मम कर्तृत्वाभावाद् एतत् फलं न मया संबध्यते? न च मदीयम् इदं कर्म इति यस्य बुद्धिः जायते इत्यर्थः। स इमान् लोकान् युद्धे हत्वा अपि तान् न निहन्ति न केवलं भीष्मादीन् इत्यर्थः। ततः तेन युद्धाख्येन कर्मणा न निबध्यते? तत्फलं न अनुभवति इत्यर्थः।सर्वम् इदम् अकर्तृत्वाद्यनुसन्धानं सत्त्वगुणवृद्ध्या एव भवति इति सत्त्वस्य उपादेयताज्ञापनाय कर्मणि सत्त्वादिगुणकृतं वैषम्यं प्रपञ्चयिष्यन् कर्मचोदनाप्रकारं तावद् आह --
Sri Sridhara Swami
।।18.17।।कस्तर्हि सुमतिः यस्य कर्मलेपो नास्तीत्युक्तमित्यपेक्षायामाह -- यस्येति। अहमिति कुतोऽहं कर्तेत्येवंभूतो भावोऽभिप्रायो यस्य नास्ति। यद्वा अहंकृतोऽहंकारस्य भावः कर्तृत्वाभिनिवेशो यस्य नास्ति। शरीरादीनामेव कर्मकर्तृत्वालोचनादित्यर्थः। अतएव यस्य बुद्धिर्न लिप्यते इष्टानिष्टबुद्ध्या कर्मसु न सज्जते स एवंभूतो देहादिव्यतिरिक्तात्मदर्शी इमाँल्लोकान्सर्वानपि प्राणिनो लोकदृष्ट्या हत्वापि विविक्ततया स्वदृष्ट्या न हन्ति। नच तत्फलैर्निबध्यते बन्धनं न प्राप्नोति। किं पुनः सत्त्वशुद्धिद्वारा परोक्षज्ञानोत्पत्तिहेतुभिः कर्मभिस्तस्य बन्धशङ्केत्यर्थः। तदुक्तम्ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः। लिप्यते न स पापेन इति।
Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha
।।18.17।।दुर्मतिप्रसङ्गे कस्तर्हि सुमतिः इति बुभुत्सायामेवंविधाकर्तृत्वानुसन्धानस्य प्रयोजनमुच्यते -- यस्येति श्लोकेन। भावोऽत्राभिप्रायः अर्थान्तरानन्वयात्। स च प्रकरणात् समभिव्याहाराच्च विशेष्यते -- कर्तृत्वविषयो मनोवृत्तिविशेष इति।अहंकृतः इत्यत्र कर्त्रर्थत्वानन्वयात्कर्मार्थत्वेऽपि मनोवृत्तिविशेषस्याहमभिमानविषयत्वायोगात्तन्मूलत्वमात्रमिह विवक्षितमित्याहअहमभिमानकृत इति। अत्राहंशब्देनाहमभिमानलक्षणा वा। यद्वाअहंकृतः इतिभुक्ता ब्राह्मणाः इतिवत्कर्तरि क्तः अहमभिमानकृत इति फलितोक्तिः। ननु आत्मनोऽहमर्थत्वात्कथमहमभिमानवर्जनम् तत्राऽऽह -- अहं करोमीति। सावधारणमिदं योज्यम्? अन्यथा साक्षात्कर्तृत्वविरोधात्। एवं कर्तृत्वत्यागे कण्ठोक्ते परिशेषात्तेनार्थसिद्धः फलसङ्गत्यागोबुद्धिर्यस्य न लिप्यते इत्यनूद्यत इत्याहअस्मिन्निति। नाविरतो दुश्चरितात् [कठो.1।2।23] इत्यादिप्रतिषिद्धवैधेतरहननव्युदासाय शास्त्रोपक्रमादिसिद्धमनुकृष्याऽऽहयुद्धे हत्वापीति। न हन्ति -- हननाभिमानजन्यादृष्टवत्तया तत्फलसम्बन्धयोग्यहन्त्रन्तरविलक्षण इत्यर्थः। अन्यथाहत्वाऽपि न हन्ति इति व्याघातात्।,यत्तु परैरत्रोक्तम् -- आत्मनो हननकर्तृत्वाभावात्तत्कार्यणाधर्मफलेन न सम्बध्यत इत्युच्यते इति तदसत्?यस्य नाहंकृतो भावः इति विशेषणवैयर्थ्यात् अविदुषोऽन्यस्यापि तन्मते कर्तृत्वाभावात्तस्मिन्नपि च कर्मफललेपस्य मिथ्यात्वाभ्युपगमात्।कथं भीष्मम् [2।4] इत्यादेः प्रश्नस्य केमुत्येन प्रतिक्षेपार्थम्इमाँल्लोकान् इति सामान्येनोच्यत इत्यभिप्रायेणाऽऽह -- न केवलमिति। अत्रन हन्ति इत्यस्यन निबध्यते इति व्याख्यानमिति योजना समीचीने गत्यन्तरे सम्भवति न युक्ता। अतःयस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते इत्यनयोर्हेतुसाध्यभावेनावस्थितयोः फलमपि हेतुसाध्यभावेनन हन्ति न निबध्यते इत्यनूद्यत इत्याह -- तत इति।न निबध्यते इत्यनेन कर्मसाध्यमोक्षविरोधिफलानन्वयो विवक्षित इत्यभिप्रायेणाऽऽह -- तत्फलं नानुभवतीति। एतेन क्रियाकाले नाहङ्कारः क्रियोत्तरकाले मया कृतमिति प्रतिसन्धानालेपः?न हन्ति न निबध्यते इत्युभाभ्यामैहिकामुष्मिकप्रत्यवायप्रतिषेधः इति योजनान्तरं निरस्तम्।
Sri Abhinavgupta
।।18.13 -- 18.17।।अधुना व्यवहारदशायामपि पञ्चस्वपि कर्महेतुषु स्थितेषु बलादेवामी ( बलादमी ) अविद्यान्धाः पुमांसः स्वात्मन्येव सकलकर्तृभावभारमारोपयन्ति ( आरोपयन्त्येते )। अतो निजयैव धिया,आत्मानं बध्नन्ति? न तु वस्तुस्थित्या अस्य बन्धः इत्युपदिश्यते -- पञ्चेत्यादि न निबद्ध्यते इत्यन्तम्। कृतः अन्तः? निश्चयः यत्रेति कृतान्तः? सिद्धान्तः। अधिष्ठानं? विषयः। दैवम्? प्रागर्जितं शुभाशुभम्। पञ्चैते अधिष्ठानादयः सामग्रीरूपतां प्राप्ताः सर्वकर्मसु हेतवः।अन्ये तु? अधिष्ठीयते अनेन सर्वं कर्म इति बुद्धिगतं रजोलब्धवृत्तिकं धृतिश्रद्धासुखविविदिषाविविदिषारूपपञ्चकपरिणामिकर्मयोगशब्दवाच्यमधिष्ठानं क्वचित् प्रयत्नशब्देन उक्तम्। कर्ता? अनुसन्धाता बुद्धिलक्षणः। करणं मनश्चक्षुरादि? बाह्यमपि च खड्गादि। चेष्टा प्राणापानादिका। दैवशब्देन धर्माधर्मौ ताभ्यां च बुद्धिगताः सर्वेऽपि भावा उपलक्षिताः [ इति ]। अन्ये तु अधिष्ठानम् ईश्वरं मन्यन्ते।अकृतबुद्धित्वात्? अनिश्चितप्रज्ञतया। यः पुनरहंकारवियोगदार्ढ्येन प्रागुक्तयुक्तिशतशोधितेन कर्माणि करोति न स बन्धभाक् ( ? N न संबन्धभाक् )? कृतबुद्धित्वात् इत्याशयः।
Sri Jayatritha
।।18.17।।अवश्यं चैतदेवं यावतोत्तरश्लोके स्वात्मानकारणं जानतः स्तुतिः क्रियते? अन्यथा सहायस्य कारणत्वं जानतः स्तुतिः क्रियते? अन्यथा सहायस्य कारणत्वं जानतः स्तुतिः क्रियेतेति भावेनाऽऽह -- तदिति। स्वात्मनो निष्क्रियत्वज्ञानम्। ननु निरहङ्कारस्यापि इन्द्रादेर्वृत्रवधादिनेषद्बन्धो दृश्यते तत्कथमेतत् इत्यत आह -- यस्त्विति। इयं च कल्पना वक्तुराप्तत्वादिना युज्यते।
Sri Madhusudan Saraswati
।।18.17।।तदेवं चतुर्भिः श्लोकैःअनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्। भवत्यत्यागिनां प्रेत्य इति चरणत्रयं व्याख्यातम्। इदानींनतु संन्यासिनां क्वचित् इति तुरीयं चरणमेकेन व्याचष्टे -- यस्येति। यस्य पूर्वोक्तविपरीतस्य पुण्यैः कर्मभिः क्षपितेषु विवेकविरोधिपापेषु नित्यानित्यवस्तुविवेकादिसाधनचतुष्टयं प्राप्तवतः शास्त्राचार्योपदेशन्यायजनिताकर्त्रभोक्तृस्वप्रकाशपरमानन्दाद्वितीयब्रह्मात्मसाक्षात्कारस्याज्ञाने सकार्ये बाधिते न भवत्यहं कर्तेत्येवंरूपो भावः प्रत्ययो यस्य भावः सद्भावोऽहंकृतोऽहमिति व्यपदेशार्हो नाहंकारबाधेन शुद्धस्वरूपमात्रपरिशेषादिति वाहंकृतोऽहंकारस्य भावस्तत्तादात्म्यं यस्य न विवेकेन बाधितत्वादिति वा बाधितानुवृत्तावप्येत एव पञ्चाधिष्ठानादयो मायया मयि सर्वात्मनि कल्पिताः सर्वकर्मणां कर्तारो मया स्वप्रकाशचैतन्येनासङ्गेन कल्पितसंबन्धेन प्रकाश्यमानाः। अहं तु न कर्ता किंतु कर्तृतद्व्यापाराणां साक्षिभूतः क्रियाज्ञानशक्तिमदुपाधिद्वयनिर्मुक्तः शुद्धः सर्वकार्यकारणासंबद्धः कूटस्थनित्यो निर्द्वयः सर्वविकारशून्यःअसङ्गो ह्ययं पुरुषःसाक्षी चेता केवलो निर्गुणश्चअप्राणो ह्यमनाः शुद्धोऽक्षरात्परतः परःअज आत्मा महान्ध्रुवःसलिल एको द्रष्टाऽद्वैतःअजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणःनिष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् इत्यादिश्रुतिभ्यः।अविकार्योयमुच्यतेप्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते। तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः। गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जतेशरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते इत्यादिस्मृतिभ्यश्च। तस्मान्नाहं कर्तेत्येवं परमार्थदृष्टेर्बुद्धिरन्तःकरणं यस्य न लिप्यते नानुशयिनी भवति। इदमहमकार्षमेतत्फलं भोक्ष्य इत्यनुसन्धानं कर्तृत्ववासनानिमित्तं लेपोऽनुशयः। स च पुण्ये कर्मणि हर्षरूपः पापे पश्चात्तापरूपः। ईदृशेन द्विविधेनापि लेपेन बुद्धिर्न युज्यते कर्तृत्वाभिमानबाधात्। तथाच ज्ञानिनं प्रकृत्य श्रुतिःएतमुहैवैते न तरत इत्यतः पापमकरवमित्यतः कल्याणमकरवमित्युभे उ हैवैष एते तरति नैनं कृताकृते तपतः। तदेतदृचाभ्युक्तम्। एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्। तस्यैव स्यात्पदवित्तं विदित्वा न लिप्यते कर्मणा पापकेन इति। पापकेनेति पुण्यस्याप्युपलक्षणम्। वर्धते कनीयानिति च पुण्यपापयोः परितोषपरितापाभिप्रायम्। एवं यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते स पूर्वोक्तदुर्मतिविलक्षणः सुमतिः परमार्थदर्शी पश्यत्यकर्तारमात्मानं केवलं सकर्तृकत्वाभिमानाभावादनिष्टादित्रिविधकर्मफलभागी न भवतीत्येतावति शास्त्रार्थेऽहंकाराभावबुद्धिलेपाभावौ स्तोतुमाह -- हत्वेति। हत्वा हिंसित्वापि न इमाँल्लोकान्सर्वान्प्राणिनो न हन्ति हननक्रियायाः कर्ता न भवत्यकर्तृस्वरूपसाक्षात्कारान्न निबध्यते। नापि तत्कार्येणाधर्मफलेन संबध्यते। अत्र नाहंकृतो भाव इत्यस्य फलं न हन्तीति? बुद्धिर्न लिप्यत इत्यस्य फलं न निबध्यत इति अनेन च कर्मालेपप्रदर्शनेऽतिशयमात्रमुक्तं नतु सर्वप्राणिहननं संभवति हत्वापीति कर्तृत्वाभ्यनुज्ञाबाधितकर्तृत्वदृष्ट्या लौकिक्या? न हन्तीति कर्तृत्वनिषेधः शास्त्रीयया परमार्थदृष्ट्येति न विरोधः। शास्त्रादौ नायं हन्ति न हन्यत इति सर्वकर्मासंस्पर्शित्वमात्मनः प्रतिज्ञाय न जायत इत्यादिहेतुवचनेन साधयित्वा वेदाविनाशिनमित्यादिना विदुषः सर्वकर्माधिकारनिवृत्तिः संक्षेपेणोक्ता मध्ये च तेन तेन प्रसङ्गेन प्रसारितेह शास्त्रार्थे तावत्त्वप्रदर्शनायोपसंहृता न हन्ति न निबध्यत इति। एवं चाविद्याकल्पितानामधिष्ठानाद्यनात्मकृतानां सर्वेषामपि कर्मणामात्मविद्यया समुच्छेदोपपत्तेः परमार्थसंन्यासिनामनिष्टादि त्रिविधं कर्मफलं न भवतीत्युपपन्नम्। परमार्थसंन्यासश्चाकर्त्रात्मसाक्षात्कार एव। जनकादीनामेतादृशसंन्यासित्वेऽपि बलवत्प्रारब्धकर्मवशाद्बाधितानुवृत्त्या परपरिकल्पनया वा कर्मदर्शनं न विरुद्धं परमहंसानामीदृशानां भिक्षाटनादिवत्। अतएव ज्ञानफलभूतो विद्वत्संन्यास उच्यते। साधनभूतस्तु विविदिषासंन्यासोऽनेवंविधोऽपि प्रथममुत्तरकाले ज्ञानोत्पत्तावेवंविधो भवतीति वक्ष्यते।
Sri Purushottamji
।।18.17।।अथ गुरूपदेशकृतबुद्धेर्मदाज्ञयाऽवश्यकर्त्तव्यत्वेन मदिच्छया जायमानत्वेन चाहङ्काररहितस्य कर्मफलाभावं कैमुतिकन्यायेन प्रदर्शयन्नाह -- यस्येति। अहङ्कृतःअहं कर्ता इत्येतादृशो मिथ्याभिनिवेशरूपो भावो यस्य नास्ति। किञ्च यस्य बुद्धिर्मदिच्छया ज्ञातसुखदुःखफलेषु कृतकर्मजज्ञाने न लिप्यते न सज्जते? स इमाँल्लोकानासुरान् मदिच्छया हत्वाऽपि लोकैर्हन्तृत्वेन परिदृश्यमानोऽपि न हन्ति? किन्तु मदिच्छयैव हन्ति अतएव तेन कर्मणा न निबध्यते? बन्धनं न प्राप्नोतीत्यर्थः। यत्र विपरीतकर्मबन्धनाभावस्तत्र विहितकर्मणा मत्सेवादिप्रतिबन्धकफलाप्रतिबन्धे किं वाच्यम् इति भावः।
Sri Shankaracharya
।।18.17।। -- यस्य शास्त्राचार्योपदेशन्यायसंस्कृतात्मनः न भवति अहंकृतः अहं कर्ता इत्येवंलक्षणः भावः भावना प्रत्ययः -- एते एव पञ्च अधिष्ठानादयः अविद्यया आत्मनि कल्पिताः सर्वकर्मणां कर्तारः? न अहम्? अहं तु तद्व्यापाराणां साक्षिभूतः अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः (मु0 उ0 2।1।2) केवलः अविक्रियः इत्येवं पश्यतीति एतत् -- बुद्धिः अन्तःकरणं यस्य आत्मनः,उपाधिभूता न लिप्यते न अनुशयिनी भवति -- इदमहमकार्षम्? तेन अहं नरकं गमिष्यामि इत्येवं यस्य बुद्धिः न लिप्यते -- सः सुमतिः? सः पश्यति। हत्वा अपि सः इमान् लोकान्? सर्वान् इमान् प्राणिनः इत्यर्थः? न हन्ति हननक्रियां न करोति? न निबध्यते नापि तत्कार्येण अधर्मफलेन संबध्यते।।ननु हत्वापि न हन्ति इति विप्रतिषिद्धम् उच्यते यद्यपि स्तुतिः। नैष दोषः? लौकिकपारमार्थिकदृष्ट्यपेक्षया तदुपपत्तेः। देहाद्यात्मबुद्ध्या हन्ता अहम् इति लौकिकीं दृष्टिम् आश्रित्य हत्वापि इति आह। यथादर्शितां पारमार्थिकीं दृष्टिम् आश्रित्य न हन्ति न निबध्यते इति। एतत् उभयम् उपपद्यते एव।।ननु अधिष्ठानादिभिः संभूय करोत्येव आत्मा? कर्तारमात्मानं केवलं तु (गीता 18।16) इति केवलशब्दप्रयोगात्। नैष दोषः? आत्मनः अविक्रियस्वभावत्वे अधिष्ठानादिभिः संहतत्वानुपपत्तेः। विक्रियावतो हि अन्यैः संहननं संभवति? संहत्य वा कर्तृत्वं स्यात्। न तु अविक्रियस्य आत्मनः केनचित् संहननम् अस्ति इति न संभूय कर्तृत्वम् उपपद्यते। अतः केवलत्वम् आत्मनः स्वाभाविकमिति केवलशब्दः अनुवादमात्रम्। अविक्रियत्वं च आत्मनः श्रुतिस्मृतिन्यायप्रसिद्धम्। अविकार्योऽयमुच्यते (गीता 2।25) गुणैरेव कर्माणि क्रियन्ते शरीरस्थोऽपि न करोति (गीता 13।31) इत्यादि असकृत् उपपादितं गीतास्वेव तावत्। श्रुतिषु च ध्यायतीव लेलायतीव इत्येवमाद्यासु। न्यायतश्च -- निरवयवम् अपरतन्त्रम् अविक्रियम् आत्मतत्त्वम् इति राजमार्गः। विक्रियावत्त्वाभ्युपगमेऽपि आत्मनः स्वकीयैव विक्रिया स्वस्य भवितुम् अर्हति? न अधिष्ठानादीनां कर्माणि आत्मकर्तृकाणि स्युः। न हि परस्य कर्म परेण अकृतम् आगन्तुम् अर्हति। यत्तु अविद्यया गमितम्? न तत् तस्य। यथा रजतत्वं न शुक्तिकायाः यथा वा तलमलिनत्वं बालैः गमितम् अविद्यया? न आकाशस्य? तथा अधिष्ठानादिविक्रियापि तेषामेव? न आत्मनः। तस्मात् युक्तम् उक्तम् अहंकृतत्वबुद्धिलेपाभावात् विद्वान् न हन्ति न निबध्यते इति। नायं हन्ति न हन्यते (गीता 2।19) इति प्रतिज्ञाय न जायते (गीता 2।20) इत्यादिहेतुवचनेन अविक्रियत्वम् आत्मनः उक्त्वा? वेदाविनाशिनम् (गीता 2।21) इति विदुषः कर्माधिकारनिवृत्तिं शास्त्रादौ संक्षेपतः उक्त्वा? मध्ये प्रसारितां तत्र तत्र प्रसङ्गं कृत्वा इह उपसंहरति शास्त्रार्थपिण्डीकरणाय विद्वान् न हन्ति न निबध्यते इति। एवं च सति देहभृत्त्वाभिमानानुपपत्तौ अविद्याकृताशेषकर्मसंन्यासोपपत्तेः संन्यासिनाम् अनिष्टादि त्रिविधं कर्मणः फलं न भवति इति उपपन्नम् तद्विपर्ययाच्च इतरेषां भवति इत्येतच्च अपरिहार्यम् इति एषः गीताशास्त्रार्थः उपसंहृतः। स एषः सर्ववेदार्थसारः निपुणमतिभिः पण्डितैः विचार्य प्रतिपत्तव्यः इति तत्र तत्र प्रकरणविभागेन दर्शितः अस्माभिः शास्त्रन्यायानुसारेण।।अथ इदानीं कर्मणां प्रवर्तकम् उच्यते --,
Sri Vallabhacharya
।।18.17।।यस्येति। अधिष्ठानादौ परमात्मनि मुख्यकर्तृकत्वानुसन्धानतोऽहङ्कृतो भावः स्वस्मिन् कर्तृत्वाभिमानकृतो मानसो विकारो न भवति? बुद्धिश्च न लिप्यते फलादौ? स हत्वाऽपीमाँल्लोकान् न हन्ति न केवलं भीष्मादीनित्यर्थः। ततस्तेन कर्मणा न निबद्ध्यते तत्फलं नानुभवतीत्यर्थः। तदुक्तं -- ब्रह्मण्याधाय कर्माणि [5।10] इति। अत्र कर्तृत्वादिकं साक्षात्कर्तरि परदेवतायां निर्दोषपूर्णविग्रहे ब्रह्मण्यनुसन्धायेति ज्ञेयम्।