Bhagavad Gita · Chapter 7 · Verse 4
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।7.4।।
bhūmir-āpo ’nalo vāyuḥ khaṁ mano buddhir eva cha
ahankāra itīyaṁ me bhinnā prakṛitir aṣhṭadhā
साधक संजीवनी — स्वामी रामसुखदास
।।7.4।। व्याख्या--'भूमिरापोऽनलो वायुः ৷৷. विद्धि मे पराम्'--परमात्मा सबके कारण हैं। वे प्रकृतिको लेकर सृष्टिकी रचना करते हैं(टिप्पणी प0 397.1)। जिस प्रकृतिको लेकर रचना करते हैं, उसका नाम 'अपरा प्रकृति' है और अपना अंश जो जीव है, उसको भगवान् 'परा प्रकृति' कहते हैं। अपरा प्रकृति निकृष्ट, जड और परिवर्तनशील है तथा परा प्रकृति श्रेष्ठ, चेतन और परिवर्तनशील है।प्रत्येक मनुष्यका भिन्न-भिन्न स्वभाव होता है। जैसे स्वभावको मनुष्यसे अलग सिद्ध नहीं कर सकते, ऐसे ही परमात्माकी प्रकृतिको परमात्मासे अलग (स्वतन्त्र) सिद्ध नहीं कर सकते। यह प्रकृति प्रभुका ही एक स्वभाव है; इसलिये इसका नाम 'प्रकृति' है। इसी प्रकार परमात्माका अंश होनेसे जीवको परमात्मासे भिन्न सिद्ध नहीं कर सकते; क्योंकि यह परमात्माका स्वरूप है। परमात्माका स्वरूप होनेपर भी केवल अपरा प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़नेके कारण इस जीवात्माको प्रकृति कहा गया है। अपरा प्रकृतिके सम्बन्धसे अपनेमें कृति (करना) माननेके कारण ही यह जीवरूप है। अगर यह अपनेमें कृति न माने तो यह परमात्मस्वरूप ही है; फिर इसकी जीव या प्रकृति संज्ञा नहीं रहती अर्थात् इसमें बन्धनकारक कर्तृत्व और भोक्तृत्व नहीं रहता (गीता 18। 17)।यहाँ अपरा प्रकृतिमें पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार--ये आठ शब्द लिये गये हैं। इनमेंसे अगर पाँच स्थूल भूतोंसे स्थूल सृष्टि मानी जाय तथा मन, बुद्धि और अहंकार--इन तीनोंसे सूक्ष्म सृष्टि मानी जाय तो इस वर्णनमें स्थूल और सूक्ष्म सृष्टि तो आ जाती है, पर कारणरूप प्रकृति इसमें नहीं आती। कारणरूप प्रकृतिके बिना प्रकृतिका वर्णन अधूरा रह जाता है। अतः आदरणीय टीकाकारोंने पाँच स्थूल भूतोंसे सूक्ष्म पञ्चतन्मात्राओं (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध) को लिया है जो कि पाँच स्थूल भूतोंकी कारण हैं। 'मन' शब्दसे अहंकार लिया है, जो कि मनका कारण है। 'बुद्धि' शब्दसे महत्तत्त्व (समष्टि बुद्धि) और 'अहंकार' शब्दसे प्रकृति ली गयी है। इस प्रकार इन आठ शब्दोंका ऐसा अर्थ लेनसे ही समष्टि अपरा प्रकृतिका पूरा वर्णन होता है; क्योंकि इसमें स्थूल, सूक्ष्म और कारण--ये तीनों समष्टि शरीर आ जाते हैं। शास्त्रोंमें इसी समष्टि प्रकृतिका 'प्रकृति-विकृति' के नामसे वर्णन किया गया है (टिप्पणी प0 397.2)। परन्तु यहाँ एक बात ध्यान देनेकी है कि भगवान्ने यहाँ अपरा और परा प्रकृतिका वर्णन 'प्रकृति-विकृति' की दृष्टिसे नहीं किया है। यदि भगवान् 'प्रकृति-विकृति' की दृष्टिसे वर्णन करते तो चेतनको प्रकृतिके नामसे कहते ही नहीं; क्योंकि चेतन न तो प्रकृति है और न विकृति है। इससे सिद्ध होता है कि भगवान्ने यहाँ जड और चेतनका विभाग बतानेके लिये ही अपरा प्रकृतिके नामसे जडका और परा प्रकृतिके नामसे चेतनका वर्णन किया है।यहाँ यह आशय मालूम देता है कि पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश--इन पाँच तत्त्वोंके स्थूलरूपसे स्थूल सृष्टि ली गयी है और इनका सूक्ष्मरूप जो पञ्चतन्मात्राएँ कही जाती हैं, उनसे सूक्ष्मसृष्टि ली गयी है। सूक्ष्मसृष्टिके अङ्ग मन, बुद्धि और अहंकार हैं।अहंकार दो प्रकारका होता है--(1) 'अहं-अहं' करके अन्तःकरणकी वृत्तिका नाम भी अहंकार है जो कि करणरूप है। यह हुई 'अपरा प्रकृति', जिसका वर्णन यहाँ चौथे श्लोकमें हुआ है और (2) 'अहम्रूपसे व्यक्तित्व, एकदेशीयताका नाम भी अहंकार है, जो कि कर्तारूप है अर्थात् अपनेको क्रियाओंका करनेवाला मानता है। यह हुई 'परा प्रकृति', जिसका वर्णन यहाँ पाँचवें श्लोकमें हुआ है। यह अहंकार कारणशरीरमें तादात्म्यरूपसे रहता है। इस तादात्म्यमें एक जड-अंश है और एक चेतन-अंश है। इसमें जो जड-अंश है, वह कारण-शरीर है और उसमें जो अभिमान करता है, वह चेतन-अंश है। जबतक बोध नहीं होता, तबतक यह जड-चेतनके तादात्म्यवाला कारण-शरीरका 'अहम्' कर्तारूपसे निरन्तर बना रहता है। सुषुप्तिके समय यह सुप्तरूपसे रहता है अर्थात् प्रकट नहीं होता। नींदसे जगनेपर 'मैं सोया था, अब जाग्रत् हुआ हूँ' इस प्रकार 'अहम्' की जागृति होती है। इसके बाद मन और बुद्धि जाग्रत् होते हैं; जैसे--मैं कहाँ हूँ, कैसे हूँ--यह मनकी जागृति हुई और मैं इस देशमें, इस समयमें हूँ--ऐसा निश्चय होना बुद्धिकी जागृति हुई। इस प्रकार नींदसे जगनेपर जिसका अनुभव होता है, वह 'अहम्' परा प्रकृति है और वृत्तिरूप जो अहंकार है, वह अपरा प्रकृति है। इस अपरा प्रकृतिको प्रकाशित करनेवाला और आश्रय देनेवाला चेतन जब अपरा प्रकृतिको अपनी मान लेता है, तब वह जीवरूप परा प्रकृति होती है--'ययेदं धार्यते जगत्।'
अगर यह परा प्रकृति अपरा प्रकतिसे विमुख होकर परमात्माके ही सम्मुख हो जाय, परमात्माको ही अपना माने और अपरा प्रकृतिको कभी भी अपना न माने अर्थात् अपरा प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्धरहित होकर निर्लिप्तताका अनुभव कर ले तो इसको अपने स्वरूपका बोध हो जाता है। स्वरूपका बोध हो जानेपर परमात्माका प्रेम प्रकट हो जाता है (टिप्पणी प0 398), जो कि पहले अपरा प्रकृतिसे सम्बन्ध रखनेसे आसक्ति और कामनाके रूपमें था। वह प्रेम अनन्त, अगाध, असीम, आनन्दरूप और प्रतिक्षण वर्धमान है। उसकी प्राप्ति होनेसे यह परा प्रकृति प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाती है, अपने असङ्गरूपका अनुभव होनेसे ज्ञात-ज्ञातव्य हो जाती है और अपरा प्रकृतिको संसारमात्रकी सेवामें लगाकर संसारसे सर्वथा विमुख होनेसे कृतकृत्य हो जाती है। यही मानव-जीवनकी पूर्णता है, सफलता है।
Sri Anandgiri
।।7.4।।ज्ञानार्थं प्रयत्नस्य तद्द्वारा ज्ञानलाभस्य तदुभयद्वारेण मुक्तेश्च दुर्लभत्वाभिधानस्य श्रोतृप्ररोचनं फलमिति मत्वाह श्रोतारमिति। आत्मनः सर्वात्मकत्वेन परिपूर्णत्वमवतारयन्नादावपरां प्रकृतिमुपन्यस्यति आहेति। भूमिशब्दस्य व्यवहारयोग्यस्थूलपृथिवीविषयत्वं व्यावर्तयति भूमिरितीति। तत्र हेतुमाह भिन्नेति। प्रकृतिसमभिव्याहाराद्गन्धतन्मात्रं स्थूलपृथिवीप्रकृतिरुत्तरविकारो भूमिरित्युच्यते न विशेष इत्यर्थः। भूमिशब्दवदबादिशब्दानामपि सूक्ष्मभूतविषयत्वमाह तथेति। तेषामपि प्रकृतिसमानाधिकृतत्वाविशेषात्तन्मात्राणां पूर्वपूर्वप्रकृतीनामुत्तरोत्तरविकाराणां न विशेषत्वसिद्धिरित्यर्थः। मनःशब्दस्य संकल्पविकल्पात्मककरणविषयत्वमाशङ्क्याह मन इतीति। न खल्वहंकाराभावे संकल्पविकल्पयोरसंभवात्तदात्मकं मनः संभवतीत्यर्थः। निश्चयलक्षणा बुद्धिरित्यभ्युपगमाद्बुद्धिशब्दस्य निश्चयात्मककरणाविषयत्वमाशङ्क्याह बुद्धिरितीति। नहि हिरण्यगर्भसमष्टिबुद्धिरूपमन्तरेण व्यष्टिबुद्धिः सिध्यतीत्यर्थः। अहंकारस्याभिमानविशेषात्मकत्वेनान्तःकरणप्रभेदत्वं व्यावर्तयति अहंकार इतीति। अविद्यासंयुक्तमित्यविद्यात्मकमित्यर्थः। कथं मूलकारणस्याहंकारशब्दत्वमित्याशङ्क्योक्तमर्थं दृष्टान्तेन स्पष्टयति यथेत्यादिना। मूलकारणस्याहंकारशब्दत्वे हेतुमाह प्रवर्तकत्वादिति। तस्य प्रवर्तकत्वं प्रपञ्चयति अहंकार एवेति। सत्येवाहंकारे ममकारो भवति तयोश्च भावे सर्वाप्रवृत्तिरिति प्रसिद्धमित्यर्थः। उक्तां प्रकृतिमुपसंहरति इतीयमिति। इयमित्यपरोक्षा साक्षिदृश्येति यावत्। ऐश्वरी तदाश्रया तदैश्वर्योपाधिभूता। प्रक्रियते महदाद्याकारेणेति प्रकृतिः। त्रिगुणं जगदुपादानं प्रधानमिति मतं व्युदस्यति मायेति। तस्यास्तत्कार्याकारेण परिणामयोग्यत्वं द्योतयति शक्तिरिति। अष्टधेति। अष्टभिः प्रकारैरिति यावत्।
Sri Dhanpati
।।7.4।।यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यत इत्युक्तेन श्रोतारममिमुखीकृत्य तदुपपत्तये चेतनातेतनप्रपञ्चस्य स्वस्मिन्परमात्मन्यध्यस्तत्वहबोधनायाह भूमिरिति। आकाशादिभिः शब्दस्पर्शरुपरगन्धाख्यानि तन्मात्राणि लक्ष्यन्ते। इत्तीयं मे भिन्न प्रकृतिरष्टधेति वाक्यशेषात्। मनःशब्देन तत्कारणमहंकारो लक्ष्यते। बुद्धिरित्यहंकारकारणं महत्तत्त्वं गृह्यते। अहंकार इत्यविद्यासंमिश्रमव्यक्तं लक्ष्यते। यथा विषसंमिश्रमन्नं विषमित्युच्यते तथाहंकारवासनावदव्यक्तं मूलकारणमहंकार इत्युच्यते। यत्तु बुद्य्धाहंकारशब्दौ तु स्वार्थावेन मनःशब्देनावशिष्टमव्यक्तं लक्ष्यते इति यत्पक्षान्तरं कैश्चित्प्रदर्शितं कैश्चत्प्रदर्शितं तदरुचिग्रस्तम्। तद्वीजं तु क्रमत्यागप्रसङ्गादि। यत्तु भूम्यादिशब्दैः पञ्चमहाभूतानि सूक्ष्मैः सैकीकृत्य गृह्यन्तेऽहंकारशब्देनैवाहंकारस्तेनैव तत्कार्याणीन्द्रियाण्यपि गृह्यन्ते बुद्धिरिति महत्तत्त्वं मनः शब्देन तु मनसवोन्नेयमव्यक्तरुपं प्रधानमिति। अनेन रुपेण प्रकृतिर्मायाख्या शक्तिरष्टधा भिन्ना विभागं प्राप्ता। चतुर्विशतिभेदभिन्नैवेत्यष्टास्वेवान्तर्भावविवक्ष्याष्टधा भिन्नेत्युक्तम्। तथाच वक्ष्यमाणक्षेत्राध्याये इमामेव प्रकृतिं चतुर्विशतितत्त्वात्मना प्रपञ्चयिष्यतिमहाभून्यहांकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च। इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः इत्यपरेवर्णयन्ति। तत्रेदमवधेयम्मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त। षोडशकस्तु विकारः इति सांख्योक्तप्रकारेणष्टस्वेव प्रकृतित्वव्यवहारो न विकारेषु। अत्रापि इतीयं से भिन्ना प्रकृतिरष्टघेति बचनादष्टौ प्रकृतय एव गृह्यन्ते। विकारस्य तु एतद्योनीनि भूतानिति भूतपदाभिधेयस्य सर्वस्याप्युपादानं क्षेत्राध्याये तु क्षेत्रनिरुपणावसरे इदमुक्तं तत्क्षेत्रमित्यारम्भइच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघाश्चेतना धृतिः। एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् इत्यन्तम्। यत्त्वन्ये नात्राव्यक्तमहदहंकारपञ्चतन्मात्राण्येवाष्टौ सांख्याभिमता एव प्रकृतयो ग्राह्या इति नियमोऽस्ति।मनसा ह्येव पश्यति मनसा श्रृणेति इति मनस इन्द्रियान्तरप्रकृतित्वश्रवणेन नवापि प्रकृतयः। तथाचैवं योज्यम्। इयं मे मम मदभिन्ना प्रकृतिरव्याकृताख्या द्विजसत्तम इतिअव्यक्तं पुरुषे ब्रह्मन्निष्कले संप्रसीयते इति तस्या अपि प्रभवप्रलययोः स्मरणादिति व्याचख्युस्तत्प्रकृताननुगुणम्। निर्देशानुसरणे तु मनःशब्देनोक्तश्रुत्या तस्य प्रकृतित्वात्तस्यैव ग्रहस्ततग्रहे मूलप्रकृतिग्रहे चोभयोरुपादाने वाष्टघेति विरोधापत्तेः मनसः प्रकृतित्ववर्णनमप्यसंगतम्। उदाहृतश्रुत्या तदलाभात्। मसा करणेनेन्द्रियद्वारकेण पश्यतीति श्रुत्यर्थाभ्युपगमात्। करणं विना द्वारस्याकिंचित्कतत्वात्। किंच विद्यारण्यादिभिराचार्यैर्मनसः श्रोत्राद्युत्पन्नमिति न प्रदर्शितं किंतुवियत्पवनतेजोऽम्बुभुवो भूतानि जज्ञिरे। सत्त्वांशैः पञ्चभिस्तेषां क्रमाद्धीन्द्रियपञ्चकम्। रजौशैः पञ्चभिस्तेषां क्रमात्कर्मेन्द्रियाणि तु।। इति भूतेभ्य इन्द्रियाणामुत्पत्तिर्दर्शिता। पुराणेषु तु अहंकारदेव सात्त्विकादिरुपेण त्रिविधात्समनस्कानामिन्द्रियदेवतानां त्वगादीन्द्रियाणां भूतानां च क्रमात्सेति सर्वथापि मनस इन्द्रियंप्रति प्रकृतित्वं नास्ति। यत्र क्वापि मनसस्तत्कल्पकत्वं श्रुयते तत्रापि मनउपाधिकस्यात्मन उपाधिप्रधानस्येति द्रष्टव्यम्।वदन्वाक्पश्यंश्चक्षुः श्रृण्वञश्रोत्रम् इत्यादिश्रुतेः। यदपि प्रकृतेः सादित्वं साधितं तदपि सिद्धान्तविरुद्धम्। मायाविद्यारूपेण द्विविधाया अपि मूलप्रकृतेः सर्वैरपि वेदान्तिभिरनादित्वेन सिद्धान्तित्वात्। तदुत्पत्तिलयवचनानि त्वाविर्भावतिरोभावपराणि। अन्यथा तत्कारणभूतायाः प्रकृतेरावश्यकत्वेनानवस्थापातादिति दिक्। इदीयं यथोक्ता प्रकृतिर्मे मम माया पारमेश्वरी अष्टधा अष्टभिः प्रकारैर्भिन्ना भेदमागता।
Sri Madhavacharya
।।7.4।।प्रतिज्ञातं ज्ञानमाह महतोऽहङ्कार एवान्तर्भावः।
Sri Neelkanth
।।7.4।।एवमेकविज्ञानात्सर्वविज्ञानं प्रतिज्ञाय तदुपपत्तये सर्वस्य जडाजडप्रपञ्चस्य ज्ञानात्मकब्रह्मप्रभवत्वमाह त्रिभिः भूमिरिति। अत्र भूम्यादिपदैस्तत्तत्कारणान्येव गृह्यन्ते प्रकृतिरित्यधिकारात् स्थूलभूम्यादेश्च विकृतिमात्रत्वात्। तथा च भूमिरिति गन्धतन्मात्रं आप इति रसतन्मात्रं अनल इति रूपतन्मात्रं वायुरिति स्पर्शतन्मात्रं खमिति शब्दतन्मात्रं मन इति तत्कारणमहंकारः बुद्धिरिति समष्टिबुद्धिर्महत्तत्त्वं अहंकरोत्यनयेत्यहंकारो मूलप्रकृतिः। करणे घञो दुर्लभत्वेऽप्यगत्या बाहुलकात्तद्बोध्यम्। इयं मे मत्तोऽभिन्नाऽपृथक्सिद्धा शुक्तिशकलादिव रजतं अष्टधा अष्टप्रकारा प्रकृतिर्जडप्रपञ्चोपादानभूता। यद्वा नात्राव्यक्तमहदहंकारपञ्चतन्मात्राण्येवाष्टौ सांख्याभिमता एव प्रकृतयो ग्राह्या इति नियमोऽस्ति।मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति इति मनस इन्द्रियान्तरप्रकृतित्वश्रवणेन सन्तु नवापि प्रकृतयः। तथा चैवं योज्यम्। इयं मे मदभिन्ना प्रकृतिरव्याकृताख्या भूम्यादिभेदेनाष्टधेति मूलप्रकृतेरत्र भूम्यादिभिः सह पाठाज्जन्यत्वमवगम्यते न सांख्यानामिवाजन्यत्वम्।तस्मादव्यक्तमुत्पन्नं त्रिगुणं द्विजसत्तम इतिअव्यक्तं पुरुषे ब्रह्मन्निष्कले प्रविलीयते इति च तस्या अपि प्रभवप्रलययोः स्मरणात्।
Sri Ramanujacharya
।।7.4।।अस्य विचित्रानन्दभोग्यभोगोपकरणभोगस्थानरूपेण अवस्थितस्य जगतः प्रकृतिः इयं गन्धादिगुणकपृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशादिरूपेण मनःप्रभृतीन्द्रियरूपेण च महदंकाररूपेण च अष्टधा भिन्ना मदीया इति विद्धि।
Sri Sridhara Swami
।।7.4।।एवं श्रोतारमभिमुखीकृत्येदानीं प्रकृतिद्वारा सृष्ट्यादिकर्तृत्वेनेश्वरतत्त्वं प्रतिज्ञातं निरूपयिष्यन्परापरभेदेन प्रकृतिद्वयमाह भूमिरिति द्वाभ्याम्। भूम्यादिशब्दैः पञ्चगन्धादितन्मात्राण्युच्यन्ते मनःशब्देन तत्कारणभूतोऽहंकारः बुद्धिशब्देन तत्कारणभूतं महत्तत्त्वं अहंकारशब्देन तत्कारणमविद्येत्येवमष्टधा भिन्ना। यद्वा भूम्यादिशब्दैः पञ्चमहाभूतानि सूक्ष्मैः सहैकीकृत्य गृह्यन्ते अहंकारशब्देनैवाहंकारस्तेनैव तत्कार्याणीन्द्रियाण्यपि गृह्यन्ते बुद्धिरिति महत्तत्त्वं मनःशब्देन मनसैवोन्नेयमव्यक्तरूपं प्रधानमित्यनेन प्रकारेण मे प्रकृतिर्मायाख्या शक्तिरब्टधा भिन्ना विभागं प्राप्ता। चतुर्विंशतिभेदभिन्नाप्यष्टस्वेवान्तर्भावविवक्षयाष्टधा भिन्नेत्युक्तम्। तथाच वक्ष्यमाणक्षेत्राध्याये इमामेव प्रकृतिं चतुर्विंशतितत्त्वात्मना प्रपञ्चयिष्यतिमहाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च। इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः इति।
Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha
।।7.4।।अथभूमिः इत्यादिनानत्वहं तेषु ते मयि 7।12 इत्यन्तेन स्वयाथात्म्यमुपदिश्यते। तत्र प्रथमं कार्यकारणरूपाचिद्विलक्षणत्वं तच्छेषत्वादिमुखेन दर्शयति। भूम्यादीनां प्रकृतिकार्याणामत्र प्रकृतित्वेन उच्यमानत्वाद्व्यष्टिसृष्ट्यपेक्षया प्रकृतित्वमिह विवक्षितमित्यभिप्रायेणाह अस्येति। केचिदाहुः अष्टौ प्रकृतयः गर्भो.3 इति श्रुतेरिह भूम्यादिशब्दैस्तन्मात्राणि गृह्यन्ते मनश्शब्देन मनसः कारणभूतोऽहङ्कारः अहङ्कारशब्देन त्वहङ्कारवासनास्पदं अव्यक्तं मूलकारणमिति। एवं समस्तपदमुख्यार्थभङ्गक्लेशाद्व्यष्ट्यपेक्षया प्रकृतित्वं वरमिति भावः। यद्वा प्रकृतिशब्देन मूलप्रकृतिरेवोच्यते द्रव्यैक्यात्सैवाष्टधाऽवस्थितेत्युच्यते एषा हि पूर्वमेका पश्चादष्टधा परिणता। अत्र स्वोपदेश प्रवृत्तस्यप्रकृतेरष्टविधत्वोपदेशो न सङ्गतः नच स्वकीयत्वात् तत्सङ्गतिः तथात्वेनेतः प्रागनुपदिष्टत्वात्। अतः प्रत्यक्षादिसिद्धपृथिव्याद्याकारपरिणता प्रकृतिरिहानूद्यते स्वस्य तद्विलक्षणत्वतच्छेषित्वतन्नियामकत्वादिसिद्ध्यर्थंमे इति तस्याः स्वकीयत्वं विधीयत इत्यभिप्रायेणोक्तं मदीयेति।विद्धि इति पृथिव्यादीनामितरेतरवैषम्यार्थं भोग्यत्वसिद्ध्यर्थमनुक्तानां तन्मात्राणां कार्यविशेषप्रदर्शनार्थं चगन्धादिगुणकेत्युक्तम्। एतेन भूतोक्तिस्तन्मात्रोपलक्षणार्थेत्यपि दर्शितम्। तदभिप्रायेणआकाशादीत्यादिशब्दोऽपि पठ्यते। तन्मात्राणां भूतानामप्यनतिविप्रकर्षात्सङ्ख्यानिवेशः। मनश्शब्दः करणभूतेन्द्रियवर्गोपलक्षणार्थ इति दर्शयितुंमनःप्रभृतीन्द्रियरूपेणेत्युक्तम्। बुद्ध्यहङ्कारशब्दयोरत्र ज्ञानगर्वाद्यर्थान्तरभ्रमव्युदासाय तत्त्वविशेषविषयत्वं ज्ञापयतिमहदहङ्काररूपेणेति। एवं समष्टिव्यष्टितत्त्वमखिलमुक्तं भवति। अत्र सम्बन्धसामान्यविहितापि षष्ठी स्वस्वामिलक्षणसम्बन्धविशेषपर्यवसिता।
Sri Abhinavgupta
।।7.4 7.5।।भूमिरिति। अपरेति। इयमिति प्रत्यक्षेण या संसारावस्थायां। सर्वजनपरिदृश्यमाना सा चैकैव सती प्रकाराष्टकेन भिद्यते इति एकप्रकृत्यारब्धत्वादेकमेव विश्वमिति प्रकृतिवादेऽपि अद्वैतं प्रदर्शितम्। सैव जीवत्वं पुरुषत्वं प्राप्ता परा ममैव नान्यस्य च। सा (S omits सा) उभयरूपा वेद्यवेदकात्मकप्रपञ्चोपरचनविचित्रा तत एव स्वात्मविमलमुकुरतलकलितसकलभावभूमिः स्वस्वभावात्मिका सततमव्यभिचारिणी प्रकृतिः। इदं जगत् भूम्यादि।
Sri Jayatritha
।।7.4।।मनुष्याणामितिवदुत्तरमप्यन्यार्थमिति प्रतीतिनिरासार्थं प्रतिज्ञातयोरुभयोः किमादावुच्यते इत्यपेक्षायां चाह प्रतिज्ञातमिति। असङ्गतिपरिहारायानन्यार्थताज्ञापनाय च ज्ञानस्य प्राथम्ये हेतुसूचनाय च प्रतिज्ञातमित्युक्तम्। प्रतिज्ञातत्वेन सङ्गतं प्रतिज्ञातमेव। न तु तदर्थं प्राथम्येन प्रतिज्ञातम्।रसोऽहं इत्यतः प्राक्तनग्रन्थसङ्ग्रहायादिपदम्। महत्तत्त्वमत्र नोपात्तं तत्किं नास्त्येव इत्यत आह महत इति। अहङ्कारेऽहङ्कारशब्दार्थेऽन्तर्भावः। कार्यवाचिनाऽहङ्कारशब्देन कारणस्य महतोऽप्युलक्षणमेव न त्वभाव इत्यर्थः।
Sri Madhusudan Saraswati
।।7.4।।एवं प्ररोचनेन श्रोतारमभिमुखीकृत्यात्मनः सर्वात्मकत्वेन परिपूर्णत्वमवतारयन्नादावपरां प्रकृतिमुपन्यस्यति सांख्यैर्हि पञ्चतन्मात्राण्यहंकारो महानव्यक्तमित्यष्टौ प्रकृतयः पञ्च महाभूतानि पञ्च कर्मेन्द्रियाणि पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि उभयसाधारणं मनश्चेति षोडशविकारा उच्यन्ते। एतान्येव चतुर्विशतितत्त्वानि। तत्र भूमिरापोऽनलो वायुः खमिति पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशाख्यपञ्चमहाभूतसूक्ष्मावस्थारूपाणि गन्धरसरूपस्पर्शशब्दात्मकानि पञ्चतन्मात्राणि लक्ष्यन्ते।बुद्ध्यहंकारशब्दौ तु स्वार्थावेव। मनःशब्देन च परिशिष्टमव्यक्तं लक्ष्यते प्रकृतिशब्दसामानाधिकरण्येन स्वार्थहानेरावश्यकत्वात्। मनःशब्देन वा स्वकारणमहंकारो लक्ष्यते पञ्चतन्मात्रसंनिकर्षात्। बुद्धिशब्दस्त्वहंकारकारणे महत्तत्त्वे मुख्यवृत्तिरेव। अहंकारशब्देन च सर्ववासनावासितमविद्यात्मकमव्यक्तं लक्ष्यते प्रवर्तकत्वाद्यसाधारणधर्मयोगाच्च। इत्युक्तकारेणेयमपरोक्षा साक्षिभास्यत्वात्प्रकृतिर्मायाख्या पारमेश्वरी शक्तिरनिर्वचनीयस्वभावा त्रिगुणात्मिकाऽष्टधा भिन्नाऽष्टभिः प्रकारैर्भेदमागता। सर्वोऽपि जडवर्गोऽत्रैवान्तर्भवतीत्यर्थः। स्वसिद्धान्ते चेक्षणसंकल्पात्मकौ मायापरिणामावेव बुद्ध्यहंकारौ। पञ्चतन्मात्राणि चापञ्चीकृतपञ्चमहाभूतानीत्यसकृदवोचाम।
Sri Purushottamji
।।7.4।।एवं सावधानतया श्रोतव्यत्वेनार्जुनं बोधयित्वा पूर्वप्रतिज्ञातस्वस्वरूपज्ञानार्थं स्वस्य सर्वकर्त्तृत्वं सर्वस्वरूपत्वं चाह भूमिराप इत्यादिभिः। भूमिः आपः अनलः वायुः खम् एवं पञ्च महाभूतानि। मनः सङ्कल्पादिसाधनम् बुद्धिर्ज्ञानात्मिका अहङ्कारोऽभिमानादिरूपः इति। अनेन प्रकारेण इयं मे अष्टधा प्रकृतिर्माया भिन्ना विभागं प्राप्ता। लौकिककार्यार्थमिति भावः।
Sri Shankaracharya
।।7.4।। भूमिः इति पृथिवीतन्मात्रमुच्यते न स्थूला भिन्ना प्रकृतिरष्टधा इति वचनात्। तथा अबादयोऽपि तन्मात्राण्येव उच्यन्ते आपः अनलः वायुः खम्। मनः इति मनसः कारणमहंकारो गृह्यते। बुद्धिः इति अहंकारकारणं महत्तत्त्वम्। अहंकारः इति अविद्यासंयुक्तमव्यक्तम्। यथा विषसंयुक्तमन्नं विषमित्युच्यते एवमहंकारवासनावत् अव्यक्तं मूलकारणमहंकार इत्युच्यते प्रवर्तकत्वात् अहंकारस्य। अहंकार एव हि सर्वस्य प्रवृत्तिबीजं दृष्टं लोके। इतीयं यथोक्ता प्रकृतिः मे मम ऐश्वरी मायाशक्तिः अष्टधा भिन्ना भेदमागता।।
Sri Vallabhacharya
।।7.4।।तथाविधं स्वमहिमज्ञानं ब्रह्मवादानुसारेण स्वयमेवोपदिशति भूमिरित्यादिना। तत्रादौ सर्वधर्माश्रयं पुरुषोत्तमापरपर्यायं ब्रह्मैव परं स्वेच्छया सर्वं भवतीति श्रूयते भूमिवत् दुग्धवच्च अतएवक्षीरवद्धि इति सूत्रे व्यवस्थापितम्आत्मकृतेः परिणामात् ब्र.सू.1।4।26 इत्येवं श्रुत्यर्थं व्याख्यायाभिन्ननिमित्तोपादानकारणं तद्ब्रह्मेति भाष्ये निगदितं च। भागवतेऽपि 10।10।3031त्वमेव कालो भगवान्विष्णुपुरव्यय ईश्वरः। त्वं महान् प्रकृतिः सूक्ष्मा रजस्सत्त्वतमोमयी।। इति। परापरप्रकृतिरूपेण स्वात्मनाऽसाधारणसृष्ट्यादिकार्यकरणमाहात्म्यं ज्ञापयितुं स्वस्य प्रकृतिद्वयं तावदाह द्वाभ्यां भूमिराप इति। मे निरतिशयानन्तमहिम्नः सम्बन्धिनी संदशभूताऽप्यजा प्रकृतिरित्यष्टधा भिन्ना भूम्यादिरूपेण परिणताऽष्टविधा तत्र पञ्चधा स्थूलभावमिता पञ्चमहाभूतानि स्पष्टान्येव। मनो बुद्धिरहङ्कारश्चेत्यनिरुद्धप्रद्युम्नसङ्कर्षणाधिष्ठानभूता सूक्ष्मा। चित्तं च स्वाभेदाभिप्रायेण नोक्तं दृश्यमानत्वात् स्वस्य भागवतं वा तन्न प्राकृतमिति नोक्तम्। इयं च प्रकृतिः सदंशभूताऽचिदित्युच्यते चित्सम्बन्धे सर्वकार्यकरणक्षमा नान्यथेत्यपरा इयम्।