Ayodhya Kanda

अयोध्या काण्ड — Sections 141150

Section 141
चौपाई

राम संग सिय रहति सुखारी। पुर परिजन गृह सुरति बिसारी।। छिनु छिनु पिय बिधु बदनु निहारी। प्रमुदित मनहुँ चकोरकुमारी।। नाह नेहु नित बढ़त बिलोकी। हरषित रहति दिवस जिमि कोकी।। सिय मनु राम चरन अनुरागा। अवध सहस सम बनु प्रिय लागा।। परनकुटी प्रिय प्रियतम संगा। प्रिय परिवारु कुरंग बिहंगा।। सासु ससुर सम मुनितिय मुनिबर। असनु अमिअ सम कंद मूल फर।। नाथ साथ साँथरी सुहाई। मयन सयन सय सम सुखदाई।। लोकप होहिं बिलोकत जासू। तेहि कि मोहि सक बिषय बिलासू।।

दोहा/सोरठा

-सुमिरत रामहि तजहिं जन तृन सम बिषय बिलासु। रामप्रिया जग जननि सिय कछु न आचरजु तासु।।140।।

Section 142
चौपाई

सीय लखन जेहि बिधि सुखु लहहीं। सोइ रघुनाथ करहि सोइ कहहीं।। कहहिं पुरातन कथा कहानी। सुनहिं लखनु सिय अति सुखु मानी। जब जब रामु अवध सुधि करहीं। तब तब बारि बिलोचन भरहीं।। सुमिरि मातु पितु परिजन भाई। भरत सनेहु सीलु सेवकाई।। कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी। धीरजु धरहिं कुसमउ बिचारी।। लखि सिय लखनु बिकल होइ जाहीं। जिमि पुरुषहि अनुसर परिछाहीं।। प्रिया बंधु गति लखि रघुनंदनु। धीर कृपाल भगत उर चंदनु।। लगे कहन कछु कथा पुनीता। सुनि सुखु लहहिं लखनु अरु सीता।।

दोहा/सोरठा

रामु लखन सीता सहित सोहत परन निकेत। जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत।।141।।

Section 143
चौपाई

जोगवहिं प्रभु सिय लखनहिं कैसें। पलक बिलोचन गोलक जैसें।। सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि। जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि।। एहि बिधि प्रभु बन बसहिं सुखारी। खग मृग सुर तापस हितकारी।। कहेउँ राम बन गवनु सुहावा। सुनहु सुमंत्र अवध जिमि आवा।। फिरेउ निषादु प्रभुहि पहुँचाई। सचिव सहित रथ देखेसि आई।। मंत्री बिकल बिलोकि निषादू। कहि न जाइ जस भयउ बिषादू।। राम राम सिय लखन पुकारी। परेउ धरनितल ब्याकुल भारी।। देखि दखिन दिसि हय हिहिनाहीं। जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं।।

दोहा/सोरठा

नहिं तृन चरहिं पिअहिं जलु मोचहिं लोचन बारि। ब्याकुल भए निषाद सब रघुबर बाजि निहारि।।142।।

Section 144
चौपाई

धरि धीरज तब कहइ निषादू। अब सुमंत्र परिहरहु बिषादू।। तुम्ह पंडित परमारथ ग्याता। धरहु धीर लखि बिमुख बिधाता बिबिध कथा कहि कहि मृदु बानी। रथ बैठारेउ बरबस आनी।। सोक सिथिल रथ सकइ न हाँकी। रघुबर बिरह पीर उर बाँकी।। चरफराहिं मग चलहिं न घोरे। बन मृग मनहुँ आनि रथ जोरे।। अढ़ुकि परहिं फिरि हेरहिं पीछें। राम बियोगि बिकल दुख तीछें।। जो कह रामु लखनु बैदेही। हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेही।। बाजि बिरह गति कहि किमि जाती। बिनु मनि फनिक बिकल जेहि भाँती।।

दोहा/सोरठा

भयउ निषाद बिषादबस देखत सचिव तुरंग। बोलि सुसेवक चारि तब दिए सारथी संग।।143।।

Section 145
चौपाई

गुह सारथिहि फिरेउ पहुँचाई। बिरहु बिषादु बरनि नहिं जाई।। चले अवध लेइ रथहि निषादा। होहि छनहिं छन मगन बिषादा।। सोच सुमंत्र बिकल दुख दीना। धिग जीवन रघुबीर बिहीना।। रहिहि न अंतहुँ अधम सरीरू। जसु न लहेउ बिछुरत रघुबीरू।। भए अजस अघ भाजन प्राना। कवन हेतु नहिं करत पयाना।। अहह मंद मनु अवसर चूका। अजहुँ न हृदय होत दुइ टूका।। मीजि हाथ सिरु धुनि पछिताई। मनहँ कृपन धन रासि गवाँई।। बिरिद बाँधि बर बीरु कहाई। चलेउ समर जनु सुभट पराई।।

दोहा/सोरठा

बिप्र बिबेकी बेदबिद संमत साधु सुजाति। जिमि धोखें मदपान कर सचिव सोच तेहि भाँति।।144।।

Section 146
चौपाई

जिमि कुलीन तिय साधु सयानी। पतिदेवता करम मन बानी।। रहै करम बस परिहरि नाहू। सचिव हृदयँ तिमि दारुन दाहु।। लोचन सजल डीठि भइ थोरी। सुनइ न श्रवन बिकल मति भोरी।। सूखहिं अधर लागि मुहँ लाटी। जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी।। बिबरन भयउ न जाइ निहारी। मारेसि मनहुँ पिता महतारी।। हानि गलानि बिपुल मन ब्यापी। जमपुर पंथ सोच जिमि पापी।। बचनु न आव हृदयँ पछिताई। अवध काह मैं देखब जाई।। राम रहित रथ देखिहि जोई। सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई।।

दोहा/सोरठा

-धाइ पूँछिहहिं मोहि जब बिकल नगर नर नारि। उतरु देब मैं सबहि तब हृदयँ बज्रु बैठारि।।145।।

Section 147
चौपाई

पुछिहहिं दीन दुखित सब माता। कहब काह मैं तिन्हहि बिधाता।। पूछिहि जबहिं लखन महतारी। कहिहउँ कवन सँदेस सुखारी।। राम जननि जब आइहि धाई। सुमिरि बच्छु जिमि धेनु लवाई।। पूँछत उतरु देब मैं तेही। गे बनु राम लखनु बैदेही।। जोइ पूँछिहि तेहि ऊतरु देबा।जाइ अवध अब यहु सुखु लेबा।। पूँछिहि जबहिं राउ दुख दीना। जिवनु जासु रघुनाथ अधीना।। देहउँ उतरु कौनु मुहु लाई। आयउँ कुसल कुअँर पहुँचाई।। सुनत लखन सिय राम सँदेसू। तृन जिमि तनु परिहरिहि नरेसू।।

दोहा/सोरठा

-ह्रदउ न बिदरेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरु।। जानत हौं मोहि दीन्ह बिधि यहु जातना सरीरु।।146।।

Section 148
चौपाई

एहि बिधि करत पंथ पछितावा। तमसा तीर तुरत रथु आवा।। बिदा किए करि बिनय निषादा। फिरे पायँ परि बिकल बिषादा।। पैठत नगर सचिव सकुचाई। जनु मारेसि गुर बाँभन गाई।। बैठि बिटप तर दिवसु गवाँवा। साँझ समय तब अवसरु पावा।। अवध प्रबेसु कीन्ह अँधिआरें। पैठ भवन रथु राखि दुआरें।। जिन्ह जिन्ह समाचार सुनि पाए। भूप द्वार रथु देखन आए।। रथु पहिचानि बिकल लखि घोरे। गरहिं गात जिमि आतप ओरे।। नगर नारि नर ब्याकुल कैंसें। निघटत नीर मीनगन जैंसें।।

दोहा/सोरठा

-सचिव आगमनु सुनत सबु बिकल भयउ रनिवासु। भवन भयंकरु लाग तेहि मानहुँ प्रेत निवासु।।147।।

Section 149
चौपाई

अति आरति सब पूँछहिं रानी। उतरु न आव बिकल भइ बानी।। सुनइ न श्रवन नयन नहिं सूझा। कहहु कहाँ नृप तेहि तेहि बूझा।। दासिन्ह दीख सचिव बिकलाई। कौसल्या गृहँ गईं लवाई।। जाइ सुमंत्र दीख कस राजा। अमिअ रहित जनु चंदु बिराजा।। आसन सयन बिभूषन हीना। परेउ भूमितल निपट मलीना।। लेइ उसासु सोच एहि भाँती। सुरपुर तें जनु खँसेउ जजाती।। लेत सोच भरि छिनु छिनु छाती। जनु जरि पंख परेउ संपाती।। राम राम कह राम सनेही। पुनि कह राम लखन बैदेही।।

दोहा/सोरठा

देखि सचिवँ जय जीव कहि कीन्हेउ दंड प्रनामु। सुनत उठेउ ब्याकुल नृपति कहु सुमंत्र कहँ रामु।।148।।

Section 150
चौपाई

भूप सुमंत्रु लीन्ह उर लाई। बूड़त कछु अधार जनु पाई।। सहित सनेह निकट बैठारी। पूँछत राउ नयन भरि बारी।। राम कुसल कहु सखा सनेही। कहँ रघुनाथु लखनु बैदेही।। आने फेरि कि बनहि सिधाए। सुनत सचिव लोचन जल छाए।। सोक बिकल पुनि पूँछ नरेसू। कहु सिय राम लखन संदेसू।। राम रूप गुन सील सुभाऊ। सुमिरि सुमिरि उर सोचत राऊ।। राउ सुनाइ दीन्ह बनबासू। सुनि मन भयउ न हरषु हराँसू।। सो सुत बिछुरत गए न प्राना। को पापी बड़ मोहि समाना।।

दोहा/सोरठा

सखा रामु सिय लखनु जहँ तहाँ मोहि पहुँचाउ। नाहिं त चाहत चलन अब प्रान कहउँ सतिभाउ।।149।।

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