Ayodhya Kanda

अयोध्या काण्ड — Sections 3140

Section 31
चौपाई

एहि बिधि राउ मनहिं मन झाँखा। देखि कुभाँति कुमति मन माखा।। भरतु कि राउर पूत न होहीं। आनेहु मोल बेसाहि कि मोही।। जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें। काहे न बोलहु बचनु सँभारे।। देहु उतरु अनु करहु कि नाहीं। सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं।। देन कहेहु अब जनि बरु देहू। तजहुँ सत्य जग अपजसु लेहू।। सत्य सराहि कहेहु बरु देना। जानेहु लेइहि मागि चबेना।। सिबि दधीचि बलि जो कछु भाषा। तनु धनु तजेउ बचन पनु राखा।। अति कटु बचन कहति कैकेई। मानहुँ लोन जरे पर देई।।

दोहा/सोरठा

धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायँ। सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठायँ।।30।।

Section 32
चौपाई

आगें दीखि जरत रिस भारी। मनहुँ रोष तरवारि उघारी।। मूठि कुबुद्धि धार निठुराई। धरी कूबरीं सान बनाई।। लखी महीप कराल कठोरा। सत्य कि जीवनु लेइहि मोरा।। बोले राउ कठिन करि छाती। बानी सबिनय तासु सोहाती।। प्रिया बचन कस कहसि कुभाँती। भीर प्रतीति प्रीति करि हाँती।। मोरें भरतु रामु दुइ आँखी। सत्य कहउँ करि संकरू साखी।। अवसि दूतु मैं पठइब प्राता। ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भ्राता।। सुदिन सोधि सबु साजु सजाई। देउँ भरत कहुँ राजु बजाई।।

दोहा/सोरठा

लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति। मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति।।31।।

Section 33
चौपाई

राम सपथ सत कहुउँ सुभाऊ। राममातु कछु कहेउ न काऊ।। मैं सबु कीन्ह तोहि बिनु पूँछें। तेहि तें परेउ मनोरथु छूछें।। रिस परिहरू अब मंगल साजू। कछु दिन गएँ भरत जुबराजू।। एकहि बात मोहि दुखु लागा। बर दूसर असमंजस मागा।। अजहुँ हृदय जरत तेहि आँचा। रिस परिहास कि साँचेहुँ साँचा।। कहु तजि रोषु राम अपराधू। सबु कोउ कहइ रामु सुठि साधू।। तुहूँ सराहसि करसि सनेहू। अब सुनि मोहि भयउ संदेहू।। जासु सुभाउ अरिहि अनुकूला। सो किमि करिहि मातु प्रतिकूला।।

दोहा/सोरठा

प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु। जेहिं देखाँ अब नयन भरि भरत राज अभिषेकु।।32।।

Section 34
चौपाई

जिऐ मीन बरू बारि बिहीना। मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना।। कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं। जीवनु मोर राम बिनु नाहीं।। समुझि देखु जियँ प्रिया प्रबीना। जीवनु राम दरस आधीना।। सुनि म्रदु बचन कुमति अति जरई। मनहुँ अनल आहुति घृत परई।। कहइ करहु किन कोटि उपाया। इहाँ न लागिहि राउरि माया।। देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं। मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं। रामु साधु तुम्ह साधु सयाने। राममातु भलि सब पहिचाने।। जस कौसिलाँ मोर भल ताका। तस फलु उन्हहि देउँ करि साका।।

दोहा/सोरठा

होत प्रात मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं। मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं।।33।।

Section 35
चौपाई

अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी।। पाप पहार प्रगट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई।। दोउ बर कूल कठिन हठ धारा। भवँर कूबरी बचन प्रचारा।। ढाहत भूपरूप तरु मूला। चली बिपति बारिधि अनुकूला।। लखी नरेस बात फुरि साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाची।। गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी। जनि दिनकर कुल होसि कुठारी।। मागु माथ अबहीं देउँ तोही। राम बिरहँ जनि मारसि मोही।। राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती। नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती।।

दोहा/सोरठा

देखी ब्याधि असाध नृपु परेउ धरनि धुनि माथ। कहत परम आरत बचन राम राम रघुनाथ।।34।।

Section 36
चौपाई

ब्याकुल राउ सिथिल सब गाता। करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता।। कंठु सूख मुख आव न बानी। जनु पाठीनु दीन बिनु पानी।। पुनि कह कटु कठोर कैकेई। मनहुँ घाय महुँ माहुर देई।। जौं अंतहुँ अस करतबु रहेऊ। मागु मागु तुम्ह केहिं बल कहेऊ।। दुइ कि होइ एक समय भुआला। हँसब ठठाइ फुलाउब गाला।। दानि कहाउब अरु कृपनाई। होइ कि खेम कुसल रौताई।। छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू। जनि अबला जिमि करुना करहू।। तनु तिय तनय धामु धनु धरनी। सत्यसंध कहुँ तृन सम बरनी।।

दोहा/सोरठा

मरम बचन सुनि राउ कह कहु कछु दोषु न तोर। लागेउ तोहि पिसाच जिमि कालु कहावत मोर।।35।।

Section 37
चौपाई

चहत न भरत भूपतहि भोरें। बिधि बस कुमति बसी जिय तोरें।। सो सबु मोर पाप परिनामू। भयउ कुठाहर जेहिं बिधि बामू।। सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई। सब गुन धाम राम प्रभुताई।। करिहहिं भाइ सकल सेवकाई। होइहि तिहुँ पुर राम बड़ाई।। तोर कलंकु मोर पछिताऊ। मुएहुँ न मिटहि न जाइहि काऊ।। अब तोहि नीक लाग करु सोई। लोचन ओट बैठु मुहु गोई।। जब लगि जिऔं कहउँ कर जोरी। तब लगि जनि कछु कहसि बहोरी।। फिरि पछितैहसि अंत अभागी। मारसि गाइ नहारु लागी।।

दोहा/सोरठा

परेउ राउ कहि कोटि बिधि काहे करसि निदानु। कपट सयानि न कहति कछु जागति मनहुँ मसानु।।36।।

Section 38
चौपाई

राम राम रट बिकल भुआलू। जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू।। हृदयँ मनाव भोरु जनि होई। रामहि जाइ कहै जनि कोई।। उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर। अवध बिलोकि सूल होइहि उर।। भूप प्रीति कैकइ कठिनाई। उभय अवधि बिधि रची बनाई।। बिलपत नृपहि भयउ भिनुसारा। बीना बेनु संख धुनि द्वारा।। पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक। सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक।। मंगल सकल सोहाहिं न कैसें। सहगामिनिहि बिभूषन जैसें।। तेहिं निसि नीद परी नहि काहू। राम दरस लालसा उछाहू।।

दोहा/सोरठा

द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि। जागेउ अजहुँ न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि।।37।।

Section 39
चौपाई

पछिले पहर भूपु नित जागा। आजु हमहि बड़ अचरजु लागा।। जाहु सुमंत्र जगावहु जाई। कीजिअ काजु रजायसु पाई।। गए सुमंत्रु तब राउर माही। देखि भयावन जात डेराहीं।। धाइ खाइ जनु जाइ न हेरा। मानहुँ बिपति बिषाद बसेरा।। पूछें कोउ न ऊतरु देई। गए जेंहिं भवन भूप कैकैई।। कहि जयजीव बैठ सिरु नाई। दैखि भूप गति गयउ सुखाई।। सोच बिकल बिबरन महि परेऊ। मानहुँ कमल मूलु परिहरेऊ।। सचिउ सभीत सकइ नहिं पूँछी। बोली असुभ भरी सुभ छूछी।।

दोहा/सोरठा

परी न राजहि नीद निसि हेतु जान जगदीसु। रामु रामु रटि भोरु किय कहइ न मरमु महीसु।।38।।

Section 40
चौपाई

आनहु रामहि बेगि बोलाई। समाचार तब पूँछेहु आई।। चलेउ सुमंत्र राय रूख जानी। लखी कुचालि कीन्हि कछु रानी।। सोच बिकल मग परइ न पाऊ। रामहि बोलि कहिहि का राऊ।। उर धरि धीरजु गयउ दुआरें। पूछँहिं सकल देखि मनु मारें।। समाधानु करि सो सबही का। गयउ जहाँ दिनकर कुल टीका।। रामु सुमंत्रहि आवत देखा। आदरु कीन्ह पिता सम लेखा।। निरखि बदनु कहि भूप रजाई। रघुकुलदीपहि चलेउ लेवाई।। रामु कुभाँति सचिव सँग जाहीं। देखि लोग जहँ तहँ बिलखाहीं।।

दोहा/सोरठा

जाइ दीख रघुबंसमनि नरपति निपट कुसाजु।। सहमि परेउ लखि सिंघिनिहि मनहुँ बृद्ध गजराजु।।39।।

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