Ayodhya Kanda

अयोध्या काण्ड — Sections 7180

Section 71
चौपाई

समाचार जब लछिमन पाए। ब्याकुल बिलख बदन उठि धाए।। कंप पुलक तन नयन सनीरा। गहे चरन अति प्रेम अधीरा।। कहि न सकत कछु चितवत ठाढ़े। मीनु दीन जनु जल तें काढ़े।। सोचु हृदयँ बिधि का होनिहारा। सबु सुखु सुकृत सिरान हमारा।। मो कहुँ काह कहब रघुनाथा। रखिहहिं भवन कि लेहहिं साथा।। राम बिलोकि बंधु कर जोरें। देह गेह सब सन तृनु तोरें।। बोले बचनु राम नय नागर। सील सनेह सरल सुख सागर।। तात प्रेम बस जनि कदराहू। समुझि हृदयँ परिनाम उछाहू।।

दोहा/सोरठा

मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहि सुभायँ। लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ।।70।।

Section 72
चौपाई

अस जियँ जानि सुनहु सिख भाई। करहु मातु पितु पद सेवकाई।। भवन भरतु रिपुसूदन नाहीं। राउ बृद्ध मम दुखु मन माहीं।। मैं बन जाउँ तुम्हहि लेइ साथा। होइ सबहि बिधि अवध अनाथा।। गुरु पितु मातु प्रजा परिवारू। सब कहुँ परइ दुसह दुख भारू।। रहहु करहु सब कर परितोषू। नतरु तात होइहि बड़ दोषू।। जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृपु अवसि नरक अधिकारी।। रहहु तात असि नीति बिचारी। सुनत लखनु भए ब्याकुल भारी।। सिअरें बचन सूखि गए कैंसें। परसत तुहिन तामरसु जैसें।।

दोहा/सोरठा

उतरु न आवत प्रेम बस गहे चरन अकुलाइ। नाथ दासु मैं स्वामि तुम्ह तजहु त काह बसाइ।।71।।

Section 73
चौपाई

दीन्हि मोहि सिख नीकि गोसाईं। लागि अगम अपनी कदराईं।। नरबर धीर धरम धुर धारी। निगम नीति कहुँ ते अधिकारी।। मैं सिसु प्रभु सनेहँ प्रतिपाला। मंदरु मेरु कि लेहिं मराला।। गुर पितु मातु न जानउँ काहू। कहउँ सुभाउ नाथ पतिआहू।। जहँ लगि जगत सनेह सगाई। प्रीति प्रतीति निगम निजु गाई।। मोरें सबइ एक तुम्ह स्वामी। दीनबंधु उर अंतरजामी।। धरम नीति उपदेसिअ ताही। कीरति भूति सुगति प्रिय जाही।। मन क्रम बचन चरन रत होई। कृपासिंधु परिहरिअ कि सोई।।

दोहा/सोरठा

करुनासिंधु सुबंध के सुनि मृदु बचन बिनीत। समुझाए उर लाइ प्रभु जानि सनेहँ सभीत।।72।।

Section 74
चौपाई

मागहु बिदा मातु सन जाई। आवहु बेगि चलहु बन भाई।। मुदित भए सुनि रघुबर बानी। भयउ लाभ बड़ गइ बड़ि हानी।। हरषित ह्दयँ मातु पहिं आए। मनहुँ अंध फिरि लोचन पाए। जाइ जननि पग नायउ माथा। मनु रघुनंदन जानकि साथा।। पूँछे मातु मलिन मन देखी। लखन कही सब कथा बिसेषी।। गई सहमि सुनि बचन कठोरा। मृगी देखि दव जनु चहु ओरा।। लखन लखेउ भा अनरथ आजू। एहिं सनेह बस करब अकाजू।। मागत बिदा सभय सकुचाहीं। जाइ संग बिधि कहिहि कि नाही।।

दोहा/सोरठा

समुझि सुमित्राँ राम सिय रूप सुसीलु सुभाउ। नृप सनेहु लखि धुनेउ सिरु पापिनि दीन्ह कुदाउ।।73।।

Section 75
चौपाई

धीरजु धरेउ कुअवसर जानी। सहज सुह्द बोली मृदु बानी।। तात तुम्हारि मातु बैदेही। पिता रामु सब भाँति सनेही।। अवध तहाँ जहँ राम निवासू। तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू।। जौ पै सीय रामु बन जाहीं। अवध तुम्हार काजु कछु नाहिं।। गुर पितु मातु बंधु सुर साई। सेइअहिं सकल प्रान की नाईं।। रामु प्रानप्रिय जीवन जी के। स्वारथ रहित सखा सबही कै।। पूजनीय प्रिय परम जहाँ तें। सब मानिअहिं राम के नातें।। अस जियँ जानि संग बन जाहू। लेहु तात जग जीवन लाहू।।

दोहा/सोरठा

भूरि भाग भाजनु भयहु मोहि समेत बलि जाउँ। जौम तुम्हरें मन छाड़ि छलु कीन्ह राम पद ठाउँ।।74।।

Section 76
चौपाई

पुत्रवती जुबती जग सोई। रघुपति भगतु जासु सुतु होई।। नतरु बाँझ भलि बादि बिआनी। राम बिमुख सुत तें हित जानी।। तुम्हरेहिं भाग रामु बन जाहीं। दूसर हेतु तात कछु नाहीं।। सकल सुकृत कर बड़ फलु एहू। राम सीय पद सहज सनेहू।। राग रोषु इरिषा मदु मोहू। जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू।। सकल प्रकार बिकार बिहाई। मन क्रम बचन करेहु सेवकाई।। तुम्ह कहुँ बन सब भाँति सुपासू। सँग पितु मातु रामु सिय जासू।। जेहिं न रामु बन लहहिं कलेसू। सुत सोइ करेहु इहइ उपदेसू।।

छंद

उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम सिय सुख पावहीं। पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख सुरति बन बिसरावहीं।। तुलसी प्रभुहि सिख देइ आयसु दीन्ह पुनि आसिष दई। रति होउ अबिरल अमल सिय रघुबीर पद नित नित नई।।

दोहा/सोरठा

मातु चरन सिरु नाइ चले तुरत संकित हृदयँ। बागुर बिषम तोराइ मनहुँ भाग मृगु भाग बस।।75।।

Section 77
चौपाई

गए लखनु जहँ जानकिनाथू। भे मन मुदित पाइ प्रिय साथू।। बंदि राम सिय चरन सुहाए। चले संग नृपमंदिर आए।। कहहिं परसपर पुर नर नारी। भलि बनाइ बिधि बात बिगारी।। तन कृस दुखु बदन मलीने। बिकल मनहुँ माखी मधु छीने।। कर मीजहिं सिरु धुनि पछिताहीं। जनु बिन पंख बिहग अकुलाहीं।। भइ बड़ि भीर भूप दरबारा। बरनि न जाइ बिषादु अपारा।। सचिवँ उठाइ राउ बैठारे। कहि प्रिय बचन रामु पगु धारे।। सिय समेत दोउ तनय निहारी। ब्याकुल भयउ भूमिपति भारी।।

दोहा/सोरठा

सीय सहित सुत सुभग दोउ देखि देखि अकुलाइ। बारहिं बार सनेह बस राउ लेइ उर लाइ।।76।।

Section 78
चौपाई

सकइ न बोलि बिकल नरनाहू। सोक जनित उर दारुन दाहू।। नाइ सीसु पद अति अनुरागा। उठि रघुबीर बिदा तब मागा।। पितु असीस आयसु मोहि दीजै। हरष समय बिसमउ कत कीजै।। तात किएँ प्रिय प्रेम प्रमादू। जसु जग जाइ होइ अपबादू।। सुनि सनेह बस उठि नरनाहाँ। बैठारे रघुपति गहि बाहाँ।। सुनहु तात तुम्ह कहुँ मुनि कहहीं। रामु चराचर नायक अहहीं।। सुभ अरु असुभ करम अनुहारी। ईस देइ फलु ह्दयँ बिचारी।। करइ जो करम पाव फल सोई। निगम नीति असि कह सबु कोई।।

दोहा/सोरठा

औरु करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु। अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु।।77।।

Section 79
चौपाई

रायँ राम राखन हित लागी। बहुत उपाय किए छलु त्यागी।। लखी राम रुख रहत न जाने। धरम धुरंधर धीर सयाने।। तब नृप सीय लाइ उर लीन्ही। अति हित बहुत भाँति सिख दीन्ही।। कहि बन के दुख दुसह सुनाए। सासु ससुर पितु सुख समुझाए।। सिय मनु राम चरन अनुरागा। घरु न सुगमु बनु बिषमु न लागा।। औरउ सबहिं सीय समुझाई। कहि कहि बिपिन बिपति अधिकाई।। सचिव नारि गुर नारि सयानी। सहित सनेह कहहिं मृदु बानी।। तुम्ह कहुँ तौ न दीन्ह बनबासू। करहु जो कहहिं ससुर गुर सासू।।

दोहा/सोरठा

-सिख सीतलि हित मधुर मृदु सुनि सीतहि न सोहानि। सरद चंद चंदनि लगत जनु चकई अकुलानि।।78।।

Section 80
चौपाई

सीय सकुच बस उतरु न देई। सो सुनि तमकि उठी कैकेई।। मुनि पट भूषन भाजन आनी। आगें धरि बोली मृदु बानी।। नृपहि प्रान प्रिय तुम्ह रघुबीरा। सील सनेह न छाड़िहि भीरा।। सुकृत सुजसु परलोकु नसाऊ। तुम्हहि जान बन कहिहि न काऊ।। अस बिचारि सोइ करहु जो भावा। राम जननि सिख सुनि सुखु पावा।। भूपहि बचन बानसम लागे। करहिं न प्रान पयान अभागे।। लोग बिकल मुरुछित नरनाहू। काह करिअ कछु सूझ न काहू।। रामु तुरत मुनि बेषु बनाई। चले जनक जननिहि सिरु नाई।।

दोहा/सोरठा

सजि बन साजु समाजु सबु बनिता बंधु समेत। बंदि बिप्र गुर चरन प्रभु चले करि सबहि अचेत।।79।।

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