बाल काण्ड — Sections 101–110
बोलि सकल सुर सादर लीन्हे। सबहि जथोचित आसन दीन्हे।। बेदी बेद बिधान सँवारी। सुभग सुमंगल गावहिं नारी।। सिंघासनु अति दिब्य सुहावा। जाइ न बरनि बिरंचि बनावा।। बैठे सिव बिप्रन्ह सिरु नाई। हृदयँ सुमिरि निज प्रभु रघुराई।। बहुरि मुनीसन्ह उमा बोलाई। करि सिंगारु सखीं लै आई।। देखत रूपु सकल सुर मोहे। बरनै छबि अस जग कबि को है।। जगदंबिका जानि भव भामा। सुरन्ह मनहिं मन कीन्ह प्रनामा।। सुंदरता मरजाद भवानी। जाइ न कोटिहुँ बदन बखानी।।
कोटिहुँ बदन नहिं बनै बरनत जग जननि सोभा महा। सकुचहिं कहत श्रुति सेष सारद मंदमति तुलसी कहा।। छबिखानि मातु भवानि गवनी मध्य मंडप सिव जहाँ।। अवलोकि सकहिं न सकुच पति पद कमल मनु मधुकरु तहाँ।।
मुनि अनुसासन गनपतिहि पूजेउ संभु भवानि। कोउ सुनि संसय करै जनि सुर अनादि जियँ जानि।।100।।
जसि बिबाह कै बिधि श्रुति गाई। महामुनिन्ह सो सब करवाई।। गहि गिरीस कुस कन्या पानी। भवहि समरपीं जानि भवानी।। पानिग्रहन जब कीन्ह महेसा। हिंयँ हरषे तब सकल सुरेसा।। बेद मंत्र मुनिबर उच्चरहीं। जय जय जय संकर सुर करहीं।। बाजहिं बाजन बिबिध बिधाना। सुमनबृष्टि नभ भै बिधि नाना।। हर गिरिजा कर भयउ बिबाहू। सकल भुवन भरि रहा उछाहू।। दासीं दास तुरग रथ नागा। धेनु बसन मनि बस्तु बिभागा।। अन्न कनकभाजन भरि जाना। दाइज दीन्ह न जाइ बखाना।।
दाइज दियो बहु भाँति पुनि कर जोरि हिमभूधर कह्यो। का देउँ पूरनकाम संकर चरन पंकज गहि रह्यो।। सिवँ कृपासागर ससुर कर संतोषु सब भाँतिहिं कियो। पुनि गहे पद पाथोज मयनाँ प्रेम परिपूरन हियो।।
नाथ उमा मन प्रान सम गृहकिंकरी करेहु। छमेहु सकल अपराध अब होइ प्रसन्न बरु देहु।।101।।
बहु बिधि संभु सास समुझाई। गवनी भवन चरन सिरु नाई।। जननीं उमा बोलि तब लीन्ही। लै उछंग सुंदर सिख दीन्ही।। करेहु सदा संकर पद पूजा। नारिधरमु पति देउ न दूजा।। बचन कहत भरे लोचन बारी। बहुरि लाइ उर लीन्हि कुमारी।। कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं।। भै अति प्रेम बिकल महतारी। धीरजु कीन्ह कुसमय बिचारी।। पुनि पुनि मिलति परति गहि चरना। परम प्रेम कछु जाइ न बरना।। सब नारिन्ह मिलि भेटि भवानी। जाइ जननि उर पुनि लपटानी।।
जननिहि बहुरि मिलि चली उचित असीस सब काहूँ दईं। फिरि फिरि बिलोकति मातु तन तब सखीं लै सिव पहिं गई।। जाचक सकल संतोषि संकरु उमा सहित भवन चले। सब अमर हरषे सुमन बरषि निसान नभ बाजे भले।।
चले संग हिमवंतु तब पहुँचावन अति हेतु। बिबिध भाँति परितोषु करि बिदा कीन्ह बृषकेतु।।102।।
तुरत भवन आए गिरिराई। सकल सैल सर लिए बोलाई।। आदर दान बिनय बहुमाना। सब कर बिदा कीन्ह हिमवाना।। जबहिं संभु कैलासहिं आए। सुर सब निज निज लोक सिधाए।। जगत मातु पितु संभु भवानी। तेही सिंगारु न कहउँ बखानी।। करहिं बिबिध बिधि भोग बिलासा। गनन्ह समेत बसहिं कैलासा।। हर गिरिजा बिहार नित नयऊ। एहि बिधि बिपुल काल चलि गयऊ।। तब जनमेउ षटबदन कुमारा। तारकु असुर समर जेहिं मारा।। आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। षन्मुख जन्मु सकल जग जाना।।
जगु जान षन्मुख जन्मु कर्मु प्रतापु पुरुषारथु महा। तेहि हेतु मैं बृषकेतु सुत कर चरित संछेपहिं कहा।। यह उमा संगु बिबाहु जे नर नारि कहहिं जे गावहीं। कल्यान काज बिबाह मंगल सर्बदा सुखु पावहीं।।
चरित सिंधु गिरिजा रमन बेद न पावहिं पारु। बरनै तुलसीदासु किमि अति मतिमंद गवाँरु।।103।।
संभु चरित सुनि सरस सुहावा। भरद्वाज मुनि अति सुख पावा।। बहु लालसा कथा पर बाढ़ी। नयनन्हि नीरु रोमावलि ठाढ़ी।। प्रेम बिबस मुख आव न बानी। दसा देखि हरषे मुनि ग्यानी।। अहो धन्य तव जन्मु मुनीसा। तुम्हहि प्रान सम प्रिय गौरीसा।। सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं। रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं।। बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू। राम भगत कर लच्छन एहू।। सिव सम को रघुपति ब्रतधारी। बिनु अघ तजी सती असि नारी।। पनु करि रघुपति भगति देखाई। को सिव सम रामहि प्रिय भाई।।
प्रथमहिं मै कहि सिव चरित बूझा मरमु तुम्हार। सुचि सेवक तुम्ह राम के रहित समस्त बिकार।।104।।
मैं जाना तुम्हार गुन सीला। कहउँ सुनहु अब रघुपति लीला।। सुनु मुनि आजु समागम तोरें। कहि न जाइ जस सुखु मन मोरें।। राम चरित अति अमित मुनिसा। कहि न सकहिं सत कोटि अहीसा।। तदपि जथाश्रुत कहउँ बखानी। सुमिरि गिरापति प्रभु धनुपानी।। सारद दारुनारि सम स्वामी। रामु सूत्रधर अंतरजामी।। जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी।। प्रनवउँ सोइ कृपाल रघुनाथा। बरनउँ बिसद तासु गुन गाथा।। परम रम्य गिरिबरु कैलासू। सदा जहाँ सिव उमा निवासू।।
सिद्ध तपोधन जोगिजन सूर किंनर मुनिबृंद। बसहिं तहाँ सुकृती सकल सेवहिं सिब सुखकंद।।105।।
हरि हर बिमुख धर्म रति नाहीं। ते नर तहँ सपनेहुँ नहिं जाहीं।। तेहि गिरि पर बट बिटप बिसाला। नित नूतन सुंदर सब काला।। त्रिबिध समीर सुसीतलि छाया। सिव बिश्राम बिटप श्रुति गाया।। एक बार तेहि तर प्रभु गयऊ। तरु बिलोकि उर अति सुखु भयऊ।। निज कर डासि नागरिपु छाला। बैठै सहजहिं संभु कृपाला।। कुंद इंदु दर गौर सरीरा। भुज प्रलंब परिधन मुनिचीरा।। तरुन अरुन अंबुज सम चरना। नख दुति भगत हृदय तम हरना।। भुजग भूति भूषन त्रिपुरारी। आननु सरद चंद छबि हारी।।
जटा मुकुट सुरसरित सिर लोचन नलिन बिसाल। नीलकंठ लावन्यनिधि सोह बालबिधु भाल।।106।।
बैठे सोह कामरिपु कैसें। धरें सरीरु सांतरसु जैसें।। पारबती भल अवसरु जानी। गई संभु पहिं मातु भवानी।। जानि प्रिया आदरु अति कीन्हा। बाम भाग आसनु हर दीन्हा।। बैठीं सिव समीप हरषाई। पूरुब जन्म कथा चित आई।। पति हियँ हेतु अधिक अनुमानी। बिहसि उमा बोलीं प्रिय बानी।। कथा जो सकल लोक हितकारी। सोइ पूछन चह सैलकुमारी।। बिस्वनाथ मम नाथ पुरारी। त्रिभुवन महिमा बिदित तुम्हारी।। चर अरु अचर नाग नर देवा। सकल करहिं पद पंकज सेवा।।
प्रभु समरथ सर्बग्य सिव सकल कला गुन धाम।। जोग ग्यान बैराग्य निधि प्रनत कलपतरु नाम।।107।।
जौं मो पर प्रसन्न सुखरासी। जानिअ सत्य मोहि निज दासी।। तौं प्रभु हरहु मोर अग्याना। कहि रघुनाथ कथा बिधि नाना।। जासु भवनु सुरतरु तर होई। सहि कि दरिद्र जनित दुखु सोई।। ससिभूषन अस हृदयँ बिचारी। हरहु नाथ मम मति भ्रम भारी।। प्रभु जे मुनि परमारथबादी। कहहिं राम कहुँ ब्रह्म अनादी।। सेस सारदा बेद पुराना। सकल करहिं रघुपति गुन गाना।। तुम्ह पुनि राम राम दिन राती। सादर जपहु अनँग आराती।। रामु सो अवध नृपति सुत सोई। की अज अगुन अलखगति कोई।।
जौं नृप तनय त ब्रह्म किमि नारि बिरहँ मति भोरि। देख चरित महिमा सुनत भ्रमति बुद्धि अति मोरि।।108।।
जौं अनीह ब्यापक बिभु कोऊ। कबहु बुझाइ नाथ मोहि सोऊ।। अग्य जानि रिस उर जनि धरहू। जेहि बिधि मोह मिटै सोइ करहू।। मै बन दीखि राम प्रभुताई। अति भय बिकल न तुम्हहि सुनाई।। तदपि मलिन मन बोधु न आवा। सो फलु भली भाँति हम पावा।। अजहूँ कछु संसउ मन मोरे। करहु कृपा बिनवउँ कर जोरें।। प्रभु तब मोहि बहु भाँति प्रबोधा। नाथ सो समुझि करहु जनि क्रोधा।। तब कर अस बिमोह अब नाहीं। रामकथा पर रुचि मन माहीं।। कहहु पुनीत राम गुन गाथा। भुजगराज भूषन सुरनाथा।।
बंदउ पद धरि धरनि सिरु बिनय करउँ कर जोरि। बरनहु रघुबर बिसद जसु श्रुति सिद्धांत निचोरि।।109।।