Bala Kanda

बाल काण्ड — Sections 121130

Section 121
चौपाई

ससि कर सम सुनि गिरा तुम्हारी। मिटा मोह सरदातप भारी।। तुम्ह कृपाल सबु संसउ हरेऊ। राम स्वरुप जानि मोहि परेऊ।। नाथ कृपाँ अब गयउ बिषादा। सुखी भयउँ प्रभु चरन प्रसादा।। अब मोहि आपनि किंकरि जानी। जदपि सहज जड नारि अयानी।। प्रथम जो मैं पूछा सोइ कहहू। जौं मो पर प्रसन्न प्रभु अहहू।। राम ब्रह्म चिनमय अबिनासी। सर्ब रहित सब उर पुर बासी।। नाथ धरेउ नरतनु केहि हेतू। मोहि समुझाइ कहहु बृषकेतू।। उमा बचन सुनि परम बिनीता। रामकथा पर प्रीति पुनीता।।

दोहा/सोरठा

हिंयँ हरषे कामारि तब संकर सहज सुजान बहु बिधि उमहि प्रसंसि पुनि बोले कृपानिधान।।120(क)।। सुनु सुभ कथा भवानि रामचरितमानस बिमल। कहा भुसुंडि बखानि सुना बिहग नायक गरुड।।120(ख)।। सो संबाद उदार जेहि बिधि भा आगें कहब। सुनहु राम अवतार चरित परम सुंदर अनघ।।120(ग)।। हरि गुन नाम अपार कथा रूप अगनित अमित। मैं निज मति अनुसार कहउँ उमा सादर सुनहु।।120(घ।।

Section 122
चौपाई

सुनु गिरिजा हरिचरित सुहाए। बिपुल बिसद निगमागम गाए।। हरि अवतार हेतु जेहि होई। इदमित्थं कहि जाइ न सोई।। राम अर्तक्य बुद्धि मन बानी। मत हमार अस सुनहि सयानी।। तदपि संत मुनि बेद पुराना। जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना।। तस मैं सुमुखि सुनावउँ तोही। समुझि परइ जस कारन मोही।। जब जब होइ धरम कै हानी। बाढहिं असुर अधम अभिमानी।। करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी।। तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहि कृपानिधि सज्जन पीरा।।

दोहा/सोरठा

असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु। जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु।।121।।

Section 123
चौपाई

सोइ जस गाइ भगत भव तरहीं। कृपासिंधु जन हित तनु धरहीं।। राम जनम के हेतु अनेका। परम बिचित्र एक तें एका।। जनम एक दुइ कहउँ बखानी। सावधान सुनु सुमति भवानी।। द्वारपाल हरि के प्रिय दोऊ। जय अरु बिजय जान सब कोऊ।। बिप्र श्राप तें दूनउ भाई। तामस असुर देह तिन्ह पाई।। कनककसिपु अरु हाटक लोचन। जगत बिदित सुरपति मद मोचन।। बिजई समर बीर बिख्याता। धरि बराह बपु एक निपाता।। होइ नरहरि दूसर पुनि मारा। जन प्रहलाद सुजस बिस्तारा।।

दोहा/सोरठा

भए निसाचर जाइ तेइ महाबीर बलवान। कुंभकरन रावण सुभट सुर बिजई जग जान।।122 ।

Section 124
चौपाई

मुकुत न भए हते भगवाना। तीनि जनम द्विज बचन प्रवाना।। एक बार तिन्ह के हित लागी। धरेउ सरीर भगत अनुरागी।। कस्यप अदिति तहाँ पितु माता। दसरथ कौसल्या बिख्याता।। एक कलप एहि बिधि अवतारा। चरित्र पवित्र किए संसारा।। एक कलप सुर देखि दुखारे। समर जलंधर सन सब हारे।। संभु कीन्ह संग्राम अपारा। दनुज महाबल मरइ न मारा।। परम सती असुराधिप नारी। तेहि बल ताहि न जितहिं पुरारी।।

दोहा/सोरठा

छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह।। जब तेहि जानेउ मरम तब श्राप कोप करि दीन्ह।।123।।

Section 125
चौपाई

तासु श्राप हरि दीन्ह प्रमाना। कौतुकनिधि कृपाल भगवाना।। तहाँ जलंधर रावन भयऊ। रन हति राम परम पद दयऊ।। एक जनम कर कारन एहा। जेहि लागि राम धरी नरदेहा।। प्रति अवतार कथा प्रभु केरी। सुनु मुनि बरनी कबिन्ह घनेरी।। नारद श्राप दीन्ह एक बारा। कलप एक तेहि लगि अवतारा।। गिरिजा चकित भई सुनि बानी। नारद बिष्नुभगत पुनि ग्यानि।। कारन कवन श्राप मुनि दीन्हा। का अपराध रमापति कीन्हा।। यह प्रसंग मोहि कहहु पुरारी। मुनि मन मोह आचरज भारी।।

दोहा/सोरठा

बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोइ। जेहि जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होइ।।124(क)।। कहउँ राम गुन गाथ भरद्वाज सादर सुनहु। भव भंजन रघुनाथ भजु तुलसी तजि मान मद।।124(ख)।।

Section 126
चौपाई

हिमगिरि गुहा एक अति पावनि। बह समीप सुरसरी सुहावनि।। आश्रम परम पुनीत सुहावा। देखि देवरिषि मन अति भावा।। निरखि सैल सरि बिपिन बिभागा। भयउ रमापति पद अनुरागा।। सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी। सहज बिमल मन लागि समाधी।। मुनि गति देखि सुरेस डेराना। कामहि बोलि कीन्ह सनमाना।। सहित सहाय जाहु मम हेतू। चकेउ हरषि हियँ जलचरकेतू।। सुनासीर मन महुँ असि त्रासा। चहत देवरिषि मम पुर बासा।। जे कामी लोलुप जग माहीं। कुटिल काक इव सबहि डेराहीं।।

दोहा/सोरठा

सुख हाड़ लै भाग सठ स्वान निरखि मृगराज। छीनि लेइ जनि जान जड़ तिमि सुरपतिहि न लाज।।125।।

Section 127
चौपाई

तेहि आश्रमहिं मदन जब गयऊ। निज मायाँ बसंत निरमयऊ।। कुसुमित बिबिध बिटप बहुरंगा। कूजहिं कोकिल गुंजहि भृंगा।। चली सुहावनि त्रिबिध बयारी। काम कृसानु बढ़ावनिहारी।। रंभादिक सुरनारि नबीना । सकल असमसर कला प्रबीना।। करहिं गान बहु तान तरंगा। बहुबिधि क्रीड़हि पानि पतंगा।। देखि सहाय मदन हरषाना। कीन्हेसि पुनि प्रपंच बिधि नाना।। काम कला कछु मुनिहि न ब्यापी। निज भयँ डरेउ मनोभव पापी।। सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासु। बड़ रखवार रमापति जासू।।

दोहा/सोरठा

सहित सहाय सभीत अति मानि हारि मन मैन। गहेसि जाइ मुनि चरन तब कहि सुठि आरत बैन।।126।।

Section 128
चौपाई

भयउ न नारद मन कछु रोषा। कहि प्रिय बचन काम परितोषा।। नाइ चरन सिरु आयसु पाई। गयउ मदन तब सहित सहाई।। मुनि सुसीलता आपनि करनी। सुरपति सभाँ जाइ सब बरनी।। सुनि सब कें मन अचरजु आवा। मुनिहि प्रसंसि हरिहि सिरु नावा।। तब नारद गवने सिव पाहीं। जिता काम अहमिति मन माहीं।। मार चरित संकरहिं सुनाए। अतिप्रिय जानि महेस सिखाए।। बार बार बिनवउँ मुनि तोहीं। जिमि यह कथा सुनायहु मोहीं।। तिमि जनि हरिहि सुनावहु कबहूँ। चलेहुँ प्रसंग दुराएडु तबहूँ।।

दोहा/सोरठा

संभु दीन्ह उपदेस हित नहिं नारदहि सोहान। भारद्वाज कौतुक सुनहु हरि इच्छा बलवान।।127।।

Section 129
चौपाई

राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई। करै अन्यथा अस नहिं कोई।। संभु बचन मुनि मन नहिं भाए। तब बिरंचि के लोक सिधाए।। एक बार करतल बर बीना। गावत हरि गुन गान प्रबीना।। छीरसिंधु गवने मुनिनाथा। जहँ बस श्रीनिवास श्रुतिमाथा।। हरषि मिले उठि रमानिकेता। बैठे आसन रिषिहि समेता।। बोले बिहसि चराचर राया। बहुते दिनन कीन्हि मुनि दाया।। काम चरित नारद सब भाषे। जद्यपि प्रथम बरजि सिवँ राखे।। अति प्रचंड रघुपति कै माया। जेहि न मोह अस को जग जाया।।

दोहा/सोरठा

रूख बदन करि बचन मृदु बोले श्रीभगवान । तुम्हरे सुमिरन तें मिटहिं मोह मार मद मान।।128।।

Section 130
चौपाई

सुनु मुनि मोह होइ मन ताकें। ग्यान बिराग हृदय नहिं जाके।। ब्रह्मचरज ब्रत रत मतिधीरा। तुम्हहि कि करइ मनोभव पीरा।। नारद कहेउ सहित अभिमाना। कृपा तुम्हारि सकल भगवाना।। करुनानिधि मन दीख बिचारी। उर अंकुरेउ गरब तरु भारी।। बेगि सो मै डारिहउँ उखारी। पन हमार सेवक हितकारी।। मुनि कर हित मम कौतुक होई। अवसि उपाय करबि मै सोई।। तब नारद हरि पद सिर नाई। चले हृदयँ अहमिति अधिकाई।। श्रीपति निज माया तब प्रेरी। सुनहु कठिन करनी तेहि केरी।।

दोहा/सोरठा

बिरचेउ मग महुँ नगर तेहिं सत जोजन बिस्तार। श्रीनिवासपुर तें अधिक रचना बिबिध प्रकार।।129।।

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