बाल काण्ड — Sections 351–360
चारि सिंघासन सहज सुहाए। जनु मनोज निज हाथ बनाए।। तिन्ह पर कुअँरि कुअँर बैठारे। सादर पाय पुनित पखारे।। धूप दीप नैबेद बेद बिधि। पूजे बर दुलहिनि मंगलनिधि।। बारहिं बार आरती करहीं। ब्यजन चारु चामर सिर ढरहीं।। बस्तु अनेक निछावर होहीं। भरीं प्रमोद मातु सब सोहीं।। पावा परम तत्व जनु जोगीं। अमृत लहेउ जनु संतत रोगीं।। जनम रंक जनु पारस पावा। अंधहि लोचन लाभु सुहावा।। मूक बदन जनु सारद छाई। मानहुँ समर सूर जय पाई।।
एहि सुख ते सत कोटि गुन पावहिं मातु अनंदु।। भाइन्ह सहित बिआहि घर आए रघुकुलचंदु।।350(क)।। लोक रीत जननी करहिं बर दुलहिनि सकुचाहिं। मोदु बिनोदु बिलोकि बड़ रामु मनहिं मुसकाहिं।।350(ख)।।
देव पितर पूजे बिधि नीकी। पूजीं सकल बासना जी की।। सबहिं बंदि मागहिं बरदाना। भाइन्ह सहित राम कल्याना।। अंतरहित सुर आसिष देहीं। मुदित मातु अंचल भरि लेंहीं।। भूपति बोलि बराती लीन्हे। जान बसन मनि भूषन दीन्हे।। आयसु पाइ राखि उर रामहि। मुदित गए सब निज निज धामहि।। पुर नर नारि सकल पहिराए। घर घर बाजन लगे बधाए।। जाचक जन जाचहि जोइ जोई। प्रमुदित राउ देहिं सोइ सोई।। सेवक सकल बजनिआ नाना। पूरन किए दान सनमाना।।
देंहिं असीस जोहारि सब गावहिं गुन गन गाथ। तब गुर भूसुर सहित गृहँ गवनु कीन्ह नरनाथ।।351।।
जो बसिष्ठ अनुसासन दीन्ही। लोक बेद बिधि सादर कीन्ही।। भूसुर भीर देखि सब रानी। सादर उठीं भाग्य बड़ जानी।। पाय पखारि सकल अन्हवाए। पूजि भली बिधि भूप जेवाँए।। आदर दान प्रेम परिपोषे। देत असीस चले मन तोषे।। बहु बिधि कीन्हि गाधिसुत पूजा। नाथ मोहि सम धन्य न दूजा।। कीन्हि प्रसंसा भूपति भूरी। रानिन्ह सहित लीन्हि पग धूरी।। भीतर भवन दीन्ह बर बासु। मन जोगवत रह नृप रनिवासू।। पूजे गुर पद कमल बहोरी। कीन्हि बिनय उर प्रीति न थोरी।।
बधुन्ह समेत कुमार सब रानिन्ह सहित महीसु। पुनि पुनि बंदत गुर चरन देत असीस मुनीसु।।352।।
बिनय कीन्हि उर अति अनुरागें। सुत संपदा राखि सब आगें।। नेगु मागि मुनिनायक लीन्हा। आसिरबादु बहुत बिधि दीन्हा।। उर धरि रामहि सीय समेता। हरषि कीन्ह गुर गवनु निकेता।। बिप्रबधू सब भूप बोलाई। चैल चारु भूषन पहिराई।। बहुरि बोलाइ सुआसिनि लीन्हीं। रुचि बिचारि पहिरावनि दीन्हीं।। नेगी नेग जोग सब लेहीं। रुचि अनुरुप भूपमनि देहीं।। प्रिय पाहुने पूज्य जे जाने। भूपति भली भाँति सनमाने।। देव देखि रघुबीर बिबाहू। बरषि प्रसून प्रसंसि उछाहू।।
चले निसान बजाइ सुर निज निज पुर सुख पाइ। कहत परसपर राम जसु प्रेम न हृदयँ समाइ।।353।।
सब बिधि सबहि समदि नरनाहू। रहा हृदयँ भरि पूरि उछाहू।। जहँ रनिवासु तहाँ पगु धारे। सहित बहूटिन्ह कुअँर निहारे।। लिए गोद करि मोद समेता। को कहि सकइ भयउ सुखु जेता।। बधू सप्रेम गोद बैठारीं। बार बार हियँ हरषि दुलारीं।। देखि समाजु मुदित रनिवासू। सब कें उर अनंद कियो बासू।। कहेउ भूप जिमि भयउ बिबाहू। सुनि हरषु होत सब काहू।। जनक राज गुन सीलु बड़ाई। प्रीति रीति संपदा सुहाई।। बहुबिधि भूप भाट जिमि बरनी। रानीं सब प्रमुदित सुनि करनी।।
सुतन्ह समेत नहाइ नृप बोलि बिप्र गुर ग्याति। भोजन कीन्ह अनेक बिधि घरी पंच गइ राति।।354।।
मंगलगान करहिं बर भामिनि। भै सुखमूल मनोहर जामिनि।। अँचइ पान सब काहूँ पाए। स्त्रग सुगंध भूषित छबि छाए।। रामहि देखि रजायसु पाई। निज निज भवन चले सिर नाई।। प्रेम प्रमोद बिनोदु बढ़ाई। समउ समाजु मनोहरताई।। कहि न सकहि सत सारद सेसू। बेद बिरंचि महेस गनेसू।। सो मै कहौं कवन बिधि बरनी। भूमिनागु सिर धरइ कि धरनी।। नृप सब भाँति सबहि सनमानी। कहि मृदु बचन बोलाई रानी।। बधू लरिकनीं पर घर आईं। राखेहु नयन पलक की नाई।।
लरिका श्रमित उनीद बस सयन करावहु जाइ। अस कहि गे बिश्रामगृहँ राम चरन चितु लाइ।।355।।
भूप बचन सुनि सहज सुहाए। जरित कनक मनि पलँग डसाए।। सुभग सुरभि पय फेन समाना। कोमल कलित सुपेतीं नाना।। उपबरहन बर बरनि न जाहीं। स्त्रग सुगंध मनिमंदिर माहीं।। रतनदीप सुठि चारु चँदोवा। कहत न बनइ जान जेहिं जोवा।। सेज रुचिर रचि रामु उठाए। प्रेम समेत पलँग पौढ़ाए।। अग्या पुनि पुनि भाइन्ह दीन्ही। निज निज सेज सयन तिन्ह कीन्ही।। देखि स्याम मृदु मंजुल गाता। कहहिं सप्रेम बचन सब माता।। मारग जात भयावनि भारी। केहि बिधि तात ताड़का मारी।।
घोर निसाचर बिकट भट समर गनहिं नहिं काहु।। मारे सहित सहाय किमि खल मारीच सुबाहु।।356।।
मुनि प्रसाद बलि तात तुम्हारी। ईस अनेक करवरें टारी।। मख रखवारी करि दुहुँ भाई। गुरु प्रसाद सब बिद्या पाई।। मुनितय तरी लगत पग धूरी। कीरति रही भुवन भरि पूरी।। कमठ पीठि पबि कूट कठोरा। नृप समाज महुँ सिव धनु तोरा।। बिस्व बिजय जसु जानकि पाई। आए भवन ब्याहि सब भाई।। सकल अमानुष करम तुम्हारे। केवल कौसिक कृपाँ सुधारे।। आजु सुफल जग जनमु हमारा। देखि तात बिधुबदन तुम्हारा।। जे दिन गए तुम्हहि बिनु देखें। ते बिरंचि जनि पारहिं लेखें।।
राम प्रतोषीं मातु सब कहि बिनीत बर बैन। सुमिरि संभु गुर बिप्र पद किए नीदबस नैन।।357।।
नीदउँ बदन सोह सुठि लोना। मनहुँ साँझ सरसीरुह सोना।। घर घर करहिं जागरन नारीं। देहिं परसपर मंगल गारीं।। पुरी बिराजति राजति रजनी। रानीं कहहिं बिलोकहु सजनी।। सुंदर बधुन्ह सासु लै सोई। फनिकन्ह जनु सिरमनि उर गोई।। प्रात पुनीत काल प्रभु जागे। अरुनचूड़ बर बोलन लागे।। बंदि मागधन्हि गुनगन गाए। पुरजन द्वार जोहारन आए।। बंदि बिप्र सुर गुर पितु माता। पाइ असीस मुदित सब भ्राता।। जननिन्ह सादर बदन निहारे। भूपति संग द्वार पगु धारे।।
कीन्ह सौच सब सहज सुचि सरित पुनीत नहाइ। प्रातक्रिया करि तात पहिं आए चारिउ भाइ।।358।।
भूप बिलोकि लिए उर लाई। बैठै हरषि रजायसु पाई।। देखि रामु सब सभा जुड़ानी। लोचन लाभ अवधि अनुमानी।। पुनि बसिष्टु मुनि कौसिक आए। सुभग आसनन्हि मुनि बैठाए।। सुतन्ह समेत पूजि पद लागे। निरखि रामु दोउ गुर अनुरागे।। कहहिं बसिष्टु धरम इतिहासा। सुनहिं महीसु सहित रनिवासा।। मुनि मन अगम गाधिसुत करनी। मुदित बसिष्ट बिपुल बिधि बरनी।। बोले बामदेउ सब साँची। कीरति कलित लोक तिहुँ माची।। सुनि आनंदु भयउ सब काहू। राम लखन उर अधिक उछाहू।।
मंगल मोद उछाह नित जाहिं दिवस एहि भाँति। उमगी अवध अनंद भरि अधिक अधिक अधिकाति।।359।।