किष्किन्धा काण्ड — Sections 11–20
सुनत राम अति कोमल बानी। बालि सीस परसेउ निज पानी।। अचल करौं तनु राखहु प्राना। बालि कहा सुनु कृपानिधाना।। जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं। अंत राम कहि आवत नाहीं।। जासु नाम बल संकर कासी। देत सबहि सम गति अविनासी।। मम लोचन गोचर सोइ आवा। बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा।।
सो नयन गोचर जासु गुन नित नेति कहि श्रुति गावहीं। जिति पवन मन गो निरस करि मुनि ध्यान कबहुँक पावहीं।। मोहि जानि अति अभिमान बस प्रभु कहेउ राखु सरीरही। अस कवन सठ हठि काटि सुरतरु बारि करिहि बबूरही।।1।। अब नाथ करि करुना बिलोकहु देहु जो बर मागऊँ। जेहिं जोनि जन्मौं कर्म बस तहँ राम पद अनुरागऊँ।। यह तनय मम सम बिनय बल कल्यानप्रद प्रभु लीजिऐ। गहि बाहँ सुर नर नाह आपन दास अंगद कीजिऐ।।2।।
राम चरन दृढ़ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग। सुमन माल जिमि कंठ ते गिरत न जानइ नाग।।10।।
राम बालि निज धाम पठावा। नगर लोग सब ब्याकुल धावा।। नाना बिधि बिलाप कर तारा। छूटे केस न देह सँभारा।। तारा बिकल देखि रघुराया । दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया।। छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा।। प्रगट सो तनु तव आगें सोवा। जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा।। उपजा ग्यान चरन तब लागी। लीन्हेसि परम भगति बर मागी।। उमा दारु जोषित की नाई। सबहि नचावत रामु गोसाई।। तब सुग्रीवहि आयसु दीन्हा। मृतक कर्म बिधिबत सब कीन्हा।। राम कहा अनुजहि समुझाई। राज देहु सुग्रीवहि जाई।। रघुपति चरन नाइ करि माथा। चले सकल प्रेरित रघुनाथा।।
लछिमन तुरत बोलाए पुरजन बिप्र समाज। राजु दीन्ह सुग्रीव कहँ अंगद कहँ जुबराज।।11।।
उमा राम सम हित जग माहीं। गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं।। सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।। बालि त्रास ब्याकुल दिन राती। तन बहु ब्रन चिंताँ जर छाती।। सोइ सुग्रीव कीन्ह कपिराऊ। अति कृपाल रघुबीर सुभाऊ।। जानतहुँ अस प्रभु परिहरहीं। काहे न बिपति जाल नर परहीं।। पुनि सुग्रीवहि लीन्ह बोलाई। बहु प्रकार नृपनीति सिखाई।। कह प्रभु सुनु सुग्रीव हरीसा। पुर न जाउँ दस चारि बरीसा।। गत ग्रीषम बरषा रितु आई। रहिहउँ निकट सैल पर छाई।। अंगद सहित करहु तुम्ह राजू। संतत हृदय धरेहु मम काजू।। जब सुग्रीव भवन फिरि आए। रामु प्रबरषन गिरि पर छाए।।
प्रथमहिं देवन्ह गिरि गुहा राखेउ रुचिर बनाइ। राम कृपानिधि कछु दिन बास करहिंगे आइ।।12।।
सुंदर बन कुसुमित अति सोभा। गुंजत मधुप निकर मधु लोभा।। कंद मूल फल पत्र सुहाए। भए बहुत जब ते प्रभु आए ।। देखि मनोहर सैल अनूपा। रहे तहँ अनुज सहित सुरभूपा।। मधुकर खग मृग तनु धरि देवा। करहिं सिद्ध मुनि प्रभु कै सेवा।। मंगलरुप भयउ बन तब ते । कीन्ह निवास रमापति जब ते।। फटिक सिला अति सुभ्र सुहाई। सुख आसीन तहाँ द्वौ भाई।। कहत अनुज सन कथा अनेका। भगति बिरति नृपनीति बिबेका।। बरषा काल मेघ नभ छाए। गरजत लागत परम सुहाए।।
लछिमन देखु मोर गन नाचत बारिद पैखि। गृही बिरति रत हरष जस बिष्नु भगत कहुँ देखि।।13।।
घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा।। दामिनि दमक रह न घन माहीं। खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं।। बरषहिं जलद भूमि निअराएँ। जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ।। बूँद अघात सहहिं गिरि कैंसें । खल के बचन संत सह जैसें।। छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई।। भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी।। समिटि समिटि जल भरहिं तलावा। जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा।। सरिता जल जलनिधि महुँ जाई। होई अचल जिमि जिव हरि पाई।।
हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ। जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ।।14।।
दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई।। नव पल्लव भए बिटप अनेका। साधक मन जस मिलें बिबेका।। अर्क जबास पात बिनु भयऊ। जस सुराज खल उद्यम गयऊ।। खोजत कतहुँ मिलइ नहिं धूरी। करइ क्रोध जिमि धरमहि दूरी।। ससि संपन्न सोह महि कैसी। उपकारी कै संपति जैसी।। निसि तम घन खद्योत बिराजा। जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा।। महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं । जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं।। कृषी निरावहिं चतुर किसाना। जिमि बुध तजहिं मोह मद माना।। देखिअत चक्रबाक खग नाहीं। कलिहि पाइ जिमि धर्म पराहीं।। ऊषर बरषइ तृन नहिं जामा। जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा।। बिबिध जंतु संकुल महि भ्राजा। प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा।। जहँ तहँ रहे पथिक थकि नाना। जिमि इंद्रिय गन उपजें ग्याना।।
कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं। जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं।।15(क)।। कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग। बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग।।15(ख)।।
बरषा बिगत सरद रितु आई। लछिमन देखहु परम सुहाई।। फूलें कास सकल महि छाई। जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई।। उदित अगस्ति पंथ जल सोषा। जिमि लोभहि सोषइ संतोषा।। सरिता सर निर्मल जल सोहा। संत हृदय जस गत मद मोहा।। रस रस सूख सरित सर पानी। ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी।। जानि सरद रितु खंजन आए। पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए।। पंक न रेनु सोह असि धरनी। नीति निपुन नृप कै जसि करनी।। जल संकोच बिकल भइँ मीना। अबुध कुटुंबी जिमि धनहीना।। बिनु धन निर्मल सोह अकासा। हरिजन इव परिहरि सब आसा।। कहुँ कहुँ बृष्टि सारदी थोरी। कोउ एक पाव भगति जिमि मोरी।।
चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि। जिमि हरिभगत पाइ श्रम तजहि आश्रमी चारि।।16।।
सुखी मीन जे नीर अगाधा। जिमि हरि सरन न एकउ बाधा।। फूलें कमल सोह सर कैसा। निर्गुन ब्रम्ह सगुन भएँ जैसा।। गुंजत मधुकर मुखर अनूपा। सुंदर खग रव नाना रूपा।। चक्रबाक मन दुख निसि पैखी। जिमि दुर्जन पर संपति देखी।। चातक रटत तृषा अति ओही। जिमि सुख लहइ न संकरद्रोही।। सरदातप निसि ससि अपहरई। संत दरस जिमि पातक टरई।। देखि इंदु चकोर समुदाई। चितवतहिं जिमि हरिजन हरि पाई।। मसक दंस बीते हिम त्रासा। जिमि द्विज द्रोह किएँ कुल नासा।।
भूमि जीव संकुल रहे गए सरद रितु पाइ। सदगुर मिले जाहिं जिमि संसय भ्रम समुदाइ।।17।।
बरषा गत निर्मल रितु आई। सुधि न तात सीता कै पाई।। एक बार कैसेहुँ सुधि जानौं। कालहु जीत निमिष महुँ आनौं।। कतहुँ रहउ जौं जीवति होई। तात जतन करि आनेउँ सोई।। सुग्रीवहुँ सुधि मोरि बिसारी। पावा राज कोस पुर नारी।। जेहिं सायक मारा मैं बाली। तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली।। जासु कृपाँ छूटहीं मद मोहा। ता कहुँ उमा कि सपनेहुँ कोहा।। जानहिं यह चरित्र मुनि ग्यानी। जिन्ह रघुबीर चरन रति मानी।। लछिमन क्रोधवंत प्रभु जाना। धनुष चढ़ाइ गहे कर बाना।।
तब अनुजहि समुझावा रघुपति करुना सींव।। भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव।।18।।
इहाँ पवनसुत हृदयँ बिचारा। राम काजु सुग्रीवँ बिसारा।। निकट जाइ चरनन्हि सिरु नावा। चारिहु बिधि तेहि कहि समुझावा।। सुनि सुग्रीवँ परम भय माना। बिषयँ मोर हरि लीन्हेउ ग्याना।। अब मारुतसुत दूत समूहा। पठवहु जहँ तहँ बानर जूहा।। कहहु पाख महुँ आव न जोई। मोरें कर ता कर बध होई।। तब हनुमंत बोलाए दूता। सब कर करि सनमान बहूता।। भय अरु प्रीति नीति देखाई। चले सकल चरनन्हि सिर नाई।। एहि अवसर लछिमन पुर आए। क्रोध देखि जहँ तहँ कपि धाए।।
धनुष चढ़ाइ कहा तब जारि करउँ पुर छार। ब्याकुल नगर देखि तब आयउ बालिकुमार।।19।।