लंका काण्ड — Sections 101–110
अस कहि बहुत भाँति समुझाई। पुनि त्रिजटा निज भवन सिधाई।। राम सुभाउ सुमिरि बैदेही। उपजी बिरह बिथा अति तेही।। निसिहि ससिहि निंदति बहु भाँती। जुग सम भई सिराति न राती।। करति बिलाप मनहिं मन भारी। राम बिरहँ जानकी दुखारी।। जब अति भयउ बिरह उर दाहू। फरकेउ बाम नयन अरु बाहू।। सगुन बिचारि धरी मन धीरा। अब मिलिहहिं कृपाल रघुबीरा।। इहाँ अर्धनिसि रावनु जागा। निज सारथि सन खीझन लागा।। सठ रनभूमि छड़ाइसि मोही। धिग धिग अधम मंदमति तोही।। तेहिं पद गहि बहु बिधि समुझावा। भौरु भएँ रथ चढ़ि पुनि धावा।। सुनि आगवनु दसानन केरा। कपि दल खरभर भयउ घनेरा।। जहँ तहँ भूधर बिटप उपारी। धाए कटकटाइ भट भारी।।
धाए जो मर्कट बिकट भालु कराल कर भूधर धरा। अति कोप करहिं प्रहार मारत भजि चले रजनीचरा।। बिचलाइ दल बलवंत कीसन्ह घेरि पुनि रावनु लियो। चहुँ दिसि चपेटन्हि मारि नखन्हि बिदारि तनु ब्याकुल कियो।।
देखि महा मर्कट प्रबल रावन कीन्ह बिचार। अंतरहित होइ निमिष महुँ कृत माया बिस्तार।।100।।
जब कीन्ह तेहिं पाषंड। भए प्रगट जंतु प्रचंड।। बेताल भूत पिसाच। कर धरें धनु नाराच।।1।। जोगिनि गहें करबाल। एक हाथ मनुज कपाल।। करि सद्य सोनित पान। नाचहिं करहिं बहु गान।।2।। धरु मारु बोलहिं घोर। रहि पूरि धुनि चहुँ ओर।। मुख बाइ धावहिं खान। तब लगे कीस परान।।3।। जहँ जाहिं मर्कट भागि। तहँ बरत देखहिं आगि।। भए बिकल बानर भालु। पुनि लाग बरषै बालु।।4।। जहँ तहँ थकित करि कीस। गर्जेउ बहुरि दससीस।। लछिमन कपीस समेत। भए सकल बीर अचेत।।5।। हा राम हा रघुनाथ। कहि सुभट मीजहिं हाथ।। एहि बिधि सकल बल तोरि। तेहिं कीन्ह कपट बहोरि।।6।। प्रगटेसि बिपुल हनुमान। धाए गहे पाषान।। तिन्ह रामु घेरे जाइ। चहुँ दिसि बरूथ बनाइ।।7।। मारहु धरहु जनि जाइ। कटकटहिं पूँछ उठाइ।। दहँ दिसि लँगूर बिराज। तेहिं मध्य कोसलराज।।8।। तेहिं मध्य कोसलराज सुंदर स्याम तन सोभा लही। जनु इंद्रधनुष अनेक की बर बारि तुंग तमालही।। प्रभु देखि हरष बिषाद उर सुर बदत जय जय जय करी। रघुबीर एकहि तीर कोपि निमेष महुँ माया हरी।।1।। माया बिगत कपि भालु हरषे बिटप गिरि गहि सब फिरे। सर निकर छाड़े राम रावन बाहु सिर पुनि महि गिरे।। श्रीराम रावन समर चरित अनेक कल्प जो गावहीं। सत सेष सारद निगम कबि तेउ तदपि पार न पावहीं।।2।।
ताके गुन गन कछु कहे जड़मति तुलसीदास। जिमि निज बल अनुरूप ते माछी उड़इ अकास।।101(क)।। काटे सिर भुज बार बहु मरत न भट लंकेस। प्रभु क्रीड़त सुर सिद्ध मुनि ब्याकुल देखि कलेस।।101(ख)।।
काटत बढ़हिं सीस समुदाई। जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई।। मरइ न रिपु श्रम भयउ बिसेषा। राम बिभीषन तन तब देखा।। उमा काल मर जाकीं ईछा। सो प्रभु जन कर प्रीति परीछा।। सुनु सरबग्य चराचर नायक। प्रनतपाल सुर मुनि सुखदायक।। नाभिकुंड पियूष बस याकें। नाथ जिअत रावनु बल ताकें।। सुनत बिभीषन बचन कृपाला। हरषि गहे कर बान कराला।। असुभ होन लागे तब नाना। रोवहिं खर सृकाल बहु स्वाना।। बोलहि खग जग आरति हेतू। प्रगट भए नभ जहँ तहँ केतू।। दस दिसि दाह होन अति लागा। भयउ परब बिनु रबि उपरागा।। मंदोदरि उर कंपति भारी। प्रतिमा स्त्रवहिं नयन मग बारी।।
प्रतिमा रुदहिं पबिपात नभ अति बात बह डोलति मही। बरषहिं बलाहक रुधिर कच रज असुभ अति सक को कही।। उतपात अमित बिलोकि नभ सुर बिकल बोलहि जय जए। सुर सभय जानि कृपाल रघुपति चाप सर जोरत भए।।
खैचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस। रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस।।102।।
सायक एक नाभि सर सोषा। अपर लगे भुज सिर करि रोषा।। लै सिर बाहु चले नाराचा। सिर भुज हीन रुंड महि नाचा।। धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब सर हति प्रभु कृत दुइ खंडा।। गर्जेउ मरत घोर रव भारी। कहाँ रामु रन हतौं पचारी।। डोली भूमि गिरत दसकंधर। छुभित सिंधु सरि दिग्गज भूधर।। धरनि परेउ द्वौ खंड बढ़ाई। चापि भालु मर्कट समुदाई।। मंदोदरि आगें भुज सीसा। धरि सर चले जहाँ जगदीसा।। प्रबिसे सब निषंग महु जाई। देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई।। तासु तेज समान प्रभु आनन। हरषे देखि संभु चतुरानन।। जय जय धुनि पूरी ब्रह्मंडा। जय रघुबीर प्रबल भुजदंडा।। बरषहि सुमन देव मुनि बृंदा। जय कृपाल जय जयति मुकुंदा।।
जय कृपा कंद मुकंद द्वंद हरन सरन सुखप्रद प्रभो। खल दल बिदारन परम कारन कारुनीक सदा बिभो।। सुर सुमन बरषहिं हरष संकुल बाज दुंदुभि गहगही। संग्राम अंगन राम अंग अनंग बहु सोभा लही।। सिर जटा मुकुट प्रसून बिच बिच अति मनोहर राजहीं। जनु नीलगिरि पर तड़ित पटल समेत उड़ुगन भ्राजहीं।। भुजदंड सर कोदंड फेरत रुधिर कन तन अति बने। जनु रायमुनीं तमाल पर बैठीं बिपुल सुख आपने।।
कृपादृष्टि करि प्रभु अभय किए सुर बृंद। भालु कीस सब हरषे जय सुख धाम मुकंद।।103।।
पति सिर देखत मंदोदरी। मुरुछित बिकल धरनि खसि परी।। जुबति बृंद रोवत उठि धाईं। तेहि उठाइ रावन पहिं आई।। पति गति देखि ते करहिं पुकारा। छूटे कच नहिं बपुष सँभारा।। उर ताड़ना करहिं बिधि नाना। रोवत करहिं प्रताप बखाना।। तव बल नाथ डोल नित धरनी। तेज हीन पावक ससि तरनी।। सेष कमठ सहि सकहिं न भारा। सो तनु भूमि परेउ भरि छारा।। बरुन कुबेर सुरेस समीरा। रन सन्मुख धरि काहुँ न धीरा।। भुजबल जितेहु काल जम साईं। आजु परेहु अनाथ की नाईं।। जगत बिदित तुम्हारी प्रभुताई। सुत परिजन बल बरनि न जाई।। राम बिमुख अस हाल तुम्हारा। रहा न कोउ कुल रोवनिहारा।। तव बस बिधि प्रपंच सब नाथा। सभय दिसिप नित नावहिं माथा।। अब तव सिर भुज जंबुक खाहीं। राम बिमुख यह अनुचित नाहीं।। काल बिबस पति कहा न माना। अग जग नाथु मनुज करि जाना।।
जान्यो मनुज करि दनुज कानन दहन पावक हरि स्वयं। जेहि नमत सिव ब्रह्मादि सुर पिय भजेहु नहिं करुनामयं।। आजन्म ते परद्रोह रत पापौघमय तव तनु अयं। तुम्हहू दियो निज धाम राम नमामि ब्रह्म निरामयं।।
अहह नाथ रघुनाथ सम कृपासिंधु नहिं आन। जोगि बृंद दुर्लभ गति तोहि दीन्हि भगवान।।104।।
मंदोदरी बचन सुनि काना। सुर मुनि सिद्ध सबन्हि सुख माना।। अज महेस नारद सनकादी। जे मुनिबर परमारथबादी।। भरि लोचन रघुपतिहि निहारी। प्रेम मगन सब भए सुखारी।। रुदन करत देखीं सब नारी। गयउ बिभीषनु मन दुख भारी।। बंधु दसा बिलोकि दुख कीन्हा। तब प्रभु अनुजहि आयसु दीन्हा।। लछिमन तेहि बहु बिधि समुझायो। बहुरि बिभीषन प्रभु पहिं आयो।। कृपादृष्टि प्रभु ताहि बिलोका। करहु क्रिया परिहरि सब सोका।। कीन्हि क्रिया प्रभु आयसु मानी। बिधिवत देस काल जियँ जानी।।
मंदोदरी आदि सब देइ तिलांजलि ताहि। भवन गई रघुपति गुन गन बरनत मन माहि।।105।।
आइ बिभीषन पुनि सिरु नायो। कृपासिंधु तब अनुज बोलायो।। तुम्ह कपीस अंगद नल नीला। जामवंत मारुति नयसीला।। सब मिलि जाहु बिभीषन साथा। सारेहु तिलक कहेउ रघुनाथा।। पिता बचन मैं नगर न आवउँ। आपु सरिस कपि अनुज पठावउँ।। तुरत चले कपि सुनि प्रभु बचना। कीन्ही जाइ तिलक की रचना।। सादर सिंहासन बैठारी। तिलक सारि अस्तुति अनुसारी।। जोरि पानि सबहीं सिर नाए। सहित बिभीषन प्रभु पहिं आए।। तब रघुबीर बोलि कपि लीन्हे। कहि प्रिय बचन सुखी सब कीन्हे।।
किए सुखी कहि बानी सुधा सम बल तुम्हारें रिपु हयो। पायो बिभीषन राज तिहुँ पुर जसु तुम्हारो नित नयो।। मोहि सहित सुभ कीरति तुम्हारी परम प्रीति जो गाइहैं। संसार सिंधु अपार पार प्रयास बिनु नर पाइहैं।।
प्रभु के बचन श्रवन सुनि नहिं अघाहिं कपि पुंज। बार बार सिर नावहिं गहहिं सकल पद कंज।।106।।
पुनि प्रभु बोलि लियउ हनुमाना। लंका जाहु कहेउ भगवाना।। समाचार जानकिहि सुनावहु। तासु कुसल लै तुम्ह चलि आवहु।। तब हनुमंत नगर महुँ आए। सुनि निसिचरी निसाचर धाए।। बहु प्रकार तिन्ह पूजा कीन्ही। जनकसुता देखाइ पुनि दीन्ही।। दूरहि ते प्रनाम कपि कीन्हा। रघुपति दूत जानकीं चीन्हा।। कहहु तात प्रभु कृपानिकेता। कुसल अनुज कपि सेन समेता।। सब बिधि कुसल कोसलाधीसा। मातु समर जीत्यो दससीसा।। अबिचल राजु बिभीषन पायो। सुनि कपि बचन हरष उर छायो।।
अति हरष मन तन पुलक लोचन सजल कह पुनि पुनि रमा। का देउँ तोहि त्रेलोक महुँ कपि किमपि नहिं बानी समा।। सुनु मातु मैं पायो अखिल जग राजु आजु न संसयं। रन जीति रिपुदल बंधु जुत पस्यामि राममनामयं।।
सुनु सुत सदगुन सकल तव हृदयँ बसहुँ हनुमंत। सानुकूल कोसलपति रहहुँ समेत अनंत।।107।।
अब सोइ जतन करहु तुम्ह ताता। देखौं नयन स्याम मृदु गाता।। तब हनुमान राम पहिं जाई। जनकसुता कै कुसल सुनाई।। सुनि संदेसु भानुकुलभूषन। बोलि लिए जुबराज बिभीषन।। मारुतसुत के संग सिधावहु। सादर जनकसुतहि लै आवहु।। तुरतहिं सकल गए जहँ सीता। सेवहिं सब निसिचरीं बिनीता।। बेगि बिभीषन तिन्हहि सिखायो। तिन्ह बहु बिधि मज्जन करवायो।। बहु प्रकार भूषन पहिराए। सिबिका रुचिर साजि पुनि ल्याए।। ता पर हरषि चढ़ी बैदेही। सुमिरि राम सुखधाम सनेही।। बेतपानि रच्छक चहुँ पासा। चले सकल मन परम हुलासा।। देखन भालु कीस सब आए। रच्छक कोपि निवारन धाए।। कह रघुबीर कहा मम मानहु। सीतहि सखा पयादें आनहु।। देखहुँ कपि जननी की नाईं। बिहसि कहा रघुनाथ गोसाई।। सुनि प्रभु बचन भालु कपि हरषे। नभ ते सुरन्ह सुमन बहु बरषे।। सीता प्रथम अनल महुँ राखी। प्रगट कीन्हि चह अंतर साखी।।
तेहि कारन करुनानिधि कहे कछुक दुर्बाद। सुनत जातुधानीं सब लागीं करै बिषाद।।108।।
प्रभु के बचन सीस धरि सीता। बोली मन क्रम बचन पुनीता।। लछिमन होहु धरम के नेगी। पावक प्रगट करहु तुम्ह बेगी।। सुनि लछिमन सीता कै बानी। बिरह बिबेक धरम निति सानी।। लोचन सजल जोरि कर दोऊ। प्रभु सन कछु कहि सकत न ओऊ।। देखि राम रुख लछिमन धाए। पावक प्रगटि काठ बहु लाए।। पावक प्रबल देखि बैदेही। हृदयँ हरष नहिं भय कछु तेही।। जौं मन बच क्रम मम उर माहीं। तजि रघुबीर आन गति नाहीं।। तौ कृसानु सब कै गति जाना। मो कहुँ होउ श्रीखंड समाना।।
श्रीखंड सम पावक प्रबेस कियो सुमिरि प्रभु मैथिली। जय कोसलेस महेस बंदित चरन रति अति निर्मली।। प्रतिबिंब अरु लौकिक कलंक प्रचंड पावक महुँ जरे। प्रभु चरित काहुँ न लखे नभ सुर सिद्ध मुनि देखहिं खरे।।1।। धरि रूप पावक पानि गहि श्री सत्य श्रुति जग बिदित जो। जिमि छीरसागर इंदिरा रामहि समर्पी आनि सो।। सो राम बाम बिभाग राजति रुचिर अति सोभा भली। नव नील नीरज निकट मानहुँ कनक पंकज की कली।।2।।
बरषहिं सुमन हरषि सुन बाजहिं गगन निसान। गावहिं किंनर सुरबधू नाचहिं चढ़ीं बिमान।।109(क)।। जनकसुता समेत प्रभु सोभा अमित अपार। देखि भालु कपि हरषे जय रघुपति सुख सार।।109(ख)।।