लंका काण्ड — Sections 121–121
Section 121
चौपाई
तुरत बिमान तहाँ चलि आवा। दंडक बन जहँ परम सुहावा।। कुंभजादि मुनिनायक नाना। गए रामु सब कें अस्थाना।। सकल रिषिन्ह सन पाइ असीसा। चित्रकूट आए जगदीसा।। तहँ करि मुनिन्ह केर संतोषा। चला बिमानु तहाँ ते चोखा।। बहुरि राम जानकिहि देखाई। जमुना कलि मल हरनि सुहाई।। पुनि देखी सुरसरी पुनीता। राम कहा प्रनाम करु सीता।। तीरथपति पुनि देखु प्रयागा। निरखत जन्म कोटि अघ भागा।। देखु परम पावनि पुनि बेनी। हरनि सोक हरि लोक निसेनी।। पुनि देखु अवधपुरी अति पावनि। त्रिबिध ताप भव रोग नसावनि।।।
दोहा/सोरठा
सीता सहित अवध कहुँ कीन्ह कृपाल प्रनाम। सजल नयन तन पुलकित पुनि पुनि हरषित राम।।120(क)।। पुनि प्रभु आइ त्रिबेनीं हरषित मज्जनु कीन्ह। कपिन्ह सहित बिप्रन्ह कहुँ दान बिबिध बिधि दीन्ह।।120(ख)।।