Uttara Kanda

उत्तर काण्ड — Sections 5160

Section 51
चौपाई

अस कहि मुनि बसिष्ट गृह आए। कृपासिंधु के मन अति भाए।। हनूमान भरतादिक भ्राता। संग लिए सेवक सुखदाता।। पुनि कृपाल पुर बाहेर गए। गज रथ तुरग मगावत भए।। देखि कृपा करि सकल सराहे। दिए उचित जिन्ह जिन्ह तेइ चाहे।। हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई। गए जहाँ सीतल अवँराई।। भरत दीन्ह निज बसन डसाई। बैठे प्रभु सेवहिं सब भाई।। मारुतसुत तब मारूत करई। पुलक बपुष लोचन जल भरई।। हनूमान सम नहिं बड़भागी। नहिं कोउ राम चरन अनुरागी।। गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई। बार बार प्रभु निज मुख गाई।।

दोहा/सोरठा

तेहिं अवसर मुनि नारद आए करतल बीन। गावन लगे राम कल कीरति सदा नबीन।।50।।

Section 52
चौपाई

मामवलोकय पंकज लोचन। कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन।। नील तामरस स्याम काम अरि। हृदय कंज मकरंद मधुप हरि।। जातुधान बरूथ बल भंजन। मुनि सज्जन रंजन अघ गंजन।। भूसुर ससि नव बृंद बलाहक। असरन सरन दीन जन गाहक।। भुज बल बिपुल भार महि खंडित। खर दूषन बिराध बध पंडित।। रावनारि सुखरूप भूपबर। जय दसरथ कुल कुमुद सुधाकर।। सुजस पुरान बिदित निगमागम। गावत सुर मुनि संत समागम।। कारुनीक ब्यलीक मद खंडन। सब बिधि कुसल कोसला मंडन।। कलि मल मथन नाम ममताहन। तुलसीदास प्रभु पाहि प्रनत जन।।

दोहा/सोरठा

प्रेम सहित मुनि नारद बरनि राम गुन ग्राम। सोभासिंधु हृदयँ धरि गए जहाँ बिधि धाम।।51।।

Section 53
चौपाई

गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा। मैं सब कही मोरि मति जथा।। राम चरित सत कोटि अपारा। श्रुति सारदा न बरनै पारा।। राम अनंत अनंत गुनानी। जन्म कर्म अनंत नामानी।। जल सीकर महि रज गनि जाहीं। रघुपति चरित न बरनि सिराहीं।। बिमल कथा हरि पद दायनी। भगति होइ सुनि अनपायनी।। उमा कहिउँ सब कथा सुहाई। जो भुसुंडि खगपतिहि सुनाई।। कछुक राम गुन कहेउँ बखानी। अब का कहौं सो कहहु भवानी।। सुनि सुभ कथा उमा हरषानी। बोली अति बिनीत मृदु बानी।। धन्य धन्य मैं धन्य पुरारी। सुनेउँ राम गुन भव भय हारी।।

दोहा/सोरठा

तुम्हरी कृपाँ कृपायतन अब कृतकृत्य न मोह। जानेउँ राम प्रताप प्रभु चिदानंद संदोह।।52(क)।। नाथ तवानन ससि स्रवत कथा सुधा रघुबीर। श्रवन पुटन्हि मन पान करि नहिं अघात मतिधीर।।52(ख)।।

Section 54
चौपाई

राम चरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं।। जीवनमुक्त महामुनि जेऊ। हरि गुन सुनहीं निरंतर तेऊ।। भव सागर चह पार जो पावा। राम कथा ता कहँ दृढ़ नावा।। बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा। श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा।। श्रवनवंत अस को जग माहीं। जाहि न रघुपति चरित सोहाहीं।। ते जड़ जीव निजात्मक घाती। जिन्हहि न रघुपति कथा सोहाती।। हरिचरित्र मानस तुम्ह गावा। सुनि मैं नाथ अमिति सुख पावा।। तुम्ह जो कही यह कथा सुहाई। कागभसुंडि गरुड़ प्रति गाई।।

दोहा/सोरठा

बिरति ग्यान बिग्यान दृढ़ राम चरन अति नेह। बायस तन रघुपति भगति मोहि परम संदेह।।53।।

Section 55
चौपाई

नर सहस्त्र महँ सुनहु पुरारी। कोउ एक होइ धर्म ब्रतधारी।। धर्मसील कोटिक महँ कोई। बिषय बिमुख बिराग रत होई।। कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई। सम्यक ग्यान सकृत कोउ लहई।। ग्यानवंत कोटिक महँ कोऊ। जीवनमुक्त सकृत जग सोऊ।। तिन्ह सहस्त्र महुँ सब सुख खानी। दुर्लभ ब्रह्मलीन बिग्यानी।। धर्मसील बिरक्त अरु ग्यानी। जीवनमुक्त ब्रह्मपर प्रानी।। सब ते सो दुर्लभ सुरराया। राम भगति रत गत मद माया।। सो हरिभगति काग किमि पाई। बिस्वनाथ मोहि कहहु बुझाई।।

दोहा/सोरठा

राम परायन ग्यान रत गुनागार मति धीर। नाथ कहहु केहि कारन पायउ काक सरीर।।54।।

Section 56
चौपाई

यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा। कहहु कृपाल काग कहँ पावा।। तुम्ह केहि भाँति सुना मदनारी। कहहु मोहि अति कौतुक भारी।। गरुड़ महाग्यानी गुन रासी। हरि सेवक अति निकट निवासी।। तेहिं केहि हेतु काग सन जाई। सुनी कथा मुनि निकर बिहाई।। कहहु कवन बिधि भा संबादा। दोउ हरिभगत काग उरगादा।। गौरि गिरा सुनि सरल सुहाई। बोले सिव सादर सुख पाई।। धन्य सती पावन मति तोरी। रघुपति चरन प्रीति नहिं थोरी।। सुनहु परम पुनीत इतिहासा। जो सुनि सकल लोक भ्रम नासा।। उपजइ राम चरन बिस्वासा। भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा।।

दोहा/सोरठा

ऐसिअ प्रस्न बिहंगपति कीन्ह काग सन जाइ। सो सब सादर कहिहउँ सुनहु उमा मन लाइ।।55।।

Section 57
चौपाई

मैं जिमि कथा सुनी भव मोचनि। सो प्रसंग सुनु सुमुखि सुलोचनि।। प्रथम दच्छ गृह तव अवतारा। सती नाम तब रहा तुम्हारा।। दच्छ जग्य तब भा अपमाना। तुम्ह अति क्रोध तजे तब प्राना।। मम अनुचरन्ह कीन्ह मख भंगा। जानहु तुम्ह सो सकल प्रसंगा।। तब अति सोच भयउ मन मोरें। दुखी भयउँ बियोग प्रिय तोरें।। सुंदर बन गिरि सरित तड़ागा। कौतुक देखत फिरउँ बेरागा।। गिरि सुमेर उत्तर दिसि दूरी। नील सैल एक सुन्दर भूरी।। तासु कनकमय सिखर सुहाए। चारि चारु मोरे मन भाए।। तिन्ह पर एक एक बिटप बिसाला। बट पीपर पाकरी रसाला।। सैलोपरि सर सुंदर सोहा। मनि सोपान देखि मन मोहा।।

दोहा/सोरठा

-सीतल अमल मधुर जल जलज बिपुल बहुरंग। कूजत कल रव हंस गन गुंजत मजुंल भृंग।।56।।

Section 58
चौपाई

तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग सोई। तासु नास कल्पांत न होई।। माया कृत गुन दोष अनेका। मोह मनोज आदि अबिबेका।। रहे ब्यापि समस्त जग माहीं। तेहि गिरि निकट कबहुँ नहिं जाहीं।। तहँ बसि हरिहि भजइ जिमि कागा। सो सुनु उमा सहित अनुरागा।। पीपर तरु तर ध्यान सो धरई। जाप जग्य पाकरि तर करई।। आँब छाहँ कर मानस पूजा। तजि हरि भजनु काजु नहिं दूजा।। बर तर कह हरि कथा प्रसंगा। आवहिं सुनहिं अनेक बिहंगा।। राम चरित बिचीत्र बिधि नाना। प्रेम सहित कर सादर गाना।। सुनहिं सकल मति बिमल मराला। बसहिं निरंतर जे तेहिं ताला।। जब मैं जाइ सो कौतुक देखा। उर उपजा आनंद बिसेषा।।

दोहा/सोरठा

तब कछु काल मराल तनु धरि तहँ कीन्ह निवास। सादर सुनि रघुपति गुन पुनि आयउँ कैलास।।57।।

Section 59
चौपाई

गिरिजा कहेउँ सो सब इतिहासा। मैं जेहि समय गयउँ खग पासा।। अब सो कथा सुनहु जेही हेतू। गयउ काग पहिं खग कुल केतू।। जब रघुनाथ कीन्हि रन क्रीड़ा। समुझत चरित होति मोहि ब्रीड़ा।। इंद्रजीत कर आपु बँधायो। तब नारद मुनि गरुड़ पठायो।। बंधन काटि गयो उरगादा। उपजा हृदयँ प्रचंड बिषादा।। प्रभु बंधन समुझत बहु भाँती। करत बिचार उरग आराती।। ब्यापक ब्रह्म बिरज बागीसा। माया मोह पार परमीसा।। सो अवतार सुनेउँ जग माहीं। देखेउँ सो प्रभाव कछु नाहीं।।

दोहा/सोरठा

-भव बंधन ते छूटहिं नर जपि जा कर नाम। खर्च निसाचर बाँधेउ नागपास सोइ राम।।58।।

Section 60
चौपाई

नाना भाँति मनहि समुझावा। प्रगट न ग्यान हृदयँ भ्रम छावा।। खेद खिन्न मन तर्क बढ़ाई। भयउ मोहबस तुम्हरिहिं नाई।। ब्याकुल गयउ देवरिषि पाहीं। कहेसि जो संसय निज मन माहीं।। सुनि नारदहि लागि अति दाया। सुनु खग प्रबल राम कै माया।। जो ग्यानिन्ह कर चित अपहरई। बरिआई बिमोह मन करई।। जेहिं बहु बार नचावा मोही। सोइ ब्यापी बिहंगपति तोही।। महामोह उपजा उर तोरें। मिटिहि न बेगि कहें खग मोरें।। चतुरानन पहिं जाहु खगेसा। सोइ करेहु जेहि होइ निदेसा।।

दोहा/सोरठा

अस कहि चले देवरिषि करत राम गुन गान। हरि माया बल बरनत पुनि पुनि परम सुजान।।59।।

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