काली-दमन

वृंदावन लीला · 19 padas

नारद ऋषि नृप तौ यौं भाषत । वे हैं काल तुम्हारे प्रगटे काहैं उनकौं राखत । काली उरग रहै जमुना मैं, तहै तैं कमल मँगावहु । दूत पठाइ देहु ब्रज ऊपर, नंदहिं अति डरपावहु । यह सुनि कै ब्रज लोग डरैंगै, वैं सुनिहैं यह बात । पुहुप लैन जैहैं नँद-ढौटा, उरग करै तहँ घात । यह सुनि कंस बहुत पायौ, भली कही यह मोहि । सूरदास प्रभु कौं मुनि जानत, ध्यान धरत मन जोहि ॥1॥

Pada 1

कंस बुलाइ दूत इक लीन्हौ । कालीदह के फूल मँगाए, पत्र लिखाइ ताहि कर दीन्हौ । यह कहियौ ब्रज जाइ नंद सौं, कंस राज अति काज मँगायो । तुरत पठाइ दिऐं हो बनि है, भली-भाँति कहि-कहि समुझायौ । येह अंतरजामी जानी जिय ,आपु रहे बन ग्वाल पठाए । सूरस्याम, ब्रज-जन-सुखदायक, कंस-काल, जिय हरष बढ़ाए॥2॥

Pada 2

पाती बाँचत नंद डराने । कालीदेह के फूल पठावहु,सुनि सबही घबराने । जो मौकौं नहिं फूल पठावहु, तौ ब्रज देहुँ उजारि । महर, गोप, उपनंद न राखौं, सबहिनि डारौं मारि । पुहुप देहु तौ बनै तुम्हारी, ना तरु गए बिलाइ । सूर स्याम बलरामु तिहारे, माँगौं उनहिं धराइ ॥3॥

Pada 3

पूछौ जाइ तात सौं बात । मैं बलि जाउँ मुखारबिंद की, तुहीं काज कंस अकुलात । आए स्याम नंद पै धाए जान्यौ मातु-पिता बिलखात । अबहीं दूर करौं दुख इनकौ, कंसहिं पठै देऊँ जलजात । मोसौ कही बात बाबा यह, बहुत करत तुम सोच विचार । कहा कहौं तुमसौं मैं प्यारे, कंस करत तुमसौं कछु झार । जब तैं जनम भयौ है तुम्हरौ, केते करबर टरे कन्हाइ । सूर स्याम कुलदेवनि तुमकौं जहाँ तहाँ करि लियौ सहाइ ॥4॥

Pada 4

खेलत स्याम, सखा लिए संग । इक मारत, इक रोकत गेंदहिं, इक भागत करि नाना रंग । मार परसपर करत आपु मैं, अति आनंद भए माहिं । खेलत ही मैं स्याम सबनि कौं, जमुना तट कौं, लीन्हैं जाहिं । मारि भजत जो जाहि, ताहि सो मारत, लेत आपनौ दाउ । सूर स्याम के गुन को जानै कहत और कछु और उपाउ ॥5॥

Pada 5

स्याम सखा कौ गेंद चलाई । श्रीदामा मुरि अंग बचायौ, गेंद परी कालीदह जाई । धाइ गही तब फेंट स्याम की, देहु न मेरी गेंद मँगाई । और सखा जनि मौकों जानौ, मोसौं तुम जनि करौ ढिठाई । जानि-बूझि तुम गेंद गिराई, अब दीन्हैं ही बनै कन्हाई । सूर सखा सब हँसत परसपर, भली करी हरि गेंद गँवाई ॥6॥

Pada 6

फेंट छाँड़ि मेरी देहु श्रीदामा । काहे कौं तुम रारि बढ़ावत,तनक बात कैं कामा । मेरी गेंद लेहु ता बदलैं, बाँह गहत हौ धाइ । छोटौ बड़ौ न जानत काहूँ करत बराबरि आइ । हम काहे कौं तुमहिं बराबर बड़े नंद के पूत । सूर स्याम दीन्हैं ही बनिहै, बहुत कहावत धूत ॥7॥

Pada 7

रिस करि लीन्ही फेंट छुड़ाई । सखा सबै देखत हैं ठाढ़े, आपुन चढ़े कदम पर धाइ । तारी दै दै हँसत सबै मिलि, स्याम गए तुम भाजि डराइ । रोवत चले श्रीदामा घर कौं, जसुमति आगैं कहिहौं जाइ । सखा-सखा कहि स्याम पुकार्‌यौ, गेंद आपनौ लेहु न आइ । सूर-स्याम पीतांबर काछे, कूदि परे दह में भहराइ ॥8॥

Pada 8

चौंकि परी तन की सुध आई । आजु कहा ब्रज सोर मचायौ, तब जान्यौ दह गिर्‌यौ कन्हाई । पुत्र-पुत्र कहिकै उठि दौरी, व्याकुल जमुना तीरहि धाई । ब्रज-बनिता सब संगहि लागीं आइ गए बल, अग्रज भाई । जननी व्याकुल देखि प्रबोधत धीरज करि नीकैं जदुराई । सूर स्याम कौं नैं कुँ नहीं डर, जनि तू रोवै जसुमति माई ॥9॥

Pada 9

जसुमति टेरति कुँवर कन्हैया । आगैं देखि कहत बलरामहिं, कहाँ रह्यौ तुव भैया । मेरौ भैया आवत अबहीं तौहि दिखाऊँ मैया । धीरज करहु, नैकु तुम देखहु, यह सुनि लेत बलैया पुनि यह कहति मोहिं परमोधत, धरनि गिरी मुरझैया । सूर बिना सुत भई अति व्याकुल, मेरौ बाल कन्हैया ॥10॥

Pada 10

अति कोमल तनु धर्‌यौ कन्हाई । गए तहाँ जहँ काली सोवत, उरग-नारि देखत अकुलाई । कह्यौ कौन कौ बालक है तू, बार-बार कही; भागि न जाई । छनकहि मैं जरि भस्म होइगो, जब देखे उठि जाग जम्हाई । उरग-नारि की बानी सुनि कै, आपु हँसे मन मैं मुसुकाई । मौकौं कंस पठायौ देखन, तू याकौं अब देहि जगाई । कहा कंस दिखरावत इनकौं, एक फूँकहिं मैं जरि जाई । पुनि-पुनि कहत सूर के प्रभु कौ, तू अब काहे न जाई पराई ॥11॥

Pada 11

झिरकि कै नारि, दै गारि धारि तब, पूँछ पर लात दै अहि जगायौ । उठ्यौ अकुलाइ, डर पाइ खग-राइ कौं, देखि बालक गरब अति बढ़ायौ । पूँछ लीन्ही झटकि, धरनि सौं गहि पटकि, फुँकर्‌यौ लटकि करि क्रोध फूले । पूँछ राखी चाँपि, रिसनि काली काँपि, देखि सब साँपि-अवसान भूले । करत फन घात, विष जात उतरात, अति नीर जरि जात नहिं गात परसै । सूर के स्याम प्रभु, लोक अभिराम, बिनु जान अहिराज विष ज्वाल बरसै ॥12॥

Pada 12

उरग लियौ हरि कौं लपटाइ । गर्व-वचन कहि-कहि मुख भाषत, मौकौ नहिं जानत अहिराइ । लियौ लपेटि चरन तैं सिख लौं, अति इहिं मोसौं करत ढिठाइ । चाँपी पूँछ लुकावत अपनी, जुवतिनि कौं नहिं सकत दिखाइ । प्रभु अंतरजामी सब जानत, अब डारौं इहिं सकुचि मिटाइ । सूरदास प्रभु तन बिस्तार्‌यौ, काली बिकल भयौ तब जाइ ॥13॥

Pada 13

जबहिं स्याम तन, अति बिस्तार्‌यौ । पटपटात टूटत अँग जान्यौ, सरन-सरन सु पुकार्‌यौ । यह बानी सुनतहिं करुनामय, तुरत गए सकुचाइ । यहै बचन सुनि द्रुपद-सुता-मुख दीन्हौं बसन बढ़ाइ । यहै बचन गजराज सुनायौ, गरुड़ छाँड़ि तहँ धाए । यहै वचन सुनि लाखा गृह मैं, पांडव जरत बचाए । यह बानी सहि जात न प्रभु सौं, ऐसे परम कृपाल । सूरदास प्रभु अंग सकोर्‌यौ, ब्याकुल देख्यौ ब्याल ॥14॥

Pada 14

नाथत ब्याल बिलंब न कीन्हौं। पग सौं चाँपि धींच बल तोर्‌यौ नाकि फोरि गहि लीन्हौ । कूदि चढ़े ताके माथे पर, काली करत बिचार । स्रवननि सुनी रही यह बानी, ब्रज ह्वै है अवतार । तेइ अवतरे आइ गोकुल मैं, मैं जानी यह बात । अस्तुति करन लग्यौ सहसौ मुख, धन्य-धन्य जग-तात । बार-बार कहि सरन पुकार्‌यौ, राखि-राखि गोपाल । सूरदास प्रभु प्रगट भए जब, देख्यौ ब्याल बिहाल ॥15॥

Pada 15

आवत उरग नाथे स्याम । नंद जसुदा, गोप गोपी, कहत हैं बलराम । मोर-मुकुट, बिसाल लोचन, स्रवन कुंडल लोल । कटि पितंबर, वेष नटवर, नूतन फन प्रति डोल । देव दिवि दुँदुभि बजावत, सुमन गन बरषाइ । सूर स्याम बिलोकि ब्रज-जन, मातु, पितु सुख पाइ ॥16॥

Pada 16

गोपाल रइ निरतत फन-प्रति ऐसे । गिरि पर आए बादर देखत मोर अनंदित जैसे । डोलत मुकुट सीस पर हरि के, कुंडल-मंडित-गंड । पीत बसन, दामिन मनु घन पर, तापर सूर-कोदंड । उरग-नारि आगैं सब ठाढ़ीं, मुख मुख अस्तुति गावैं । सूर स्याम अपराध छमहु अब, हम माँगैं पति पावैं ॥17॥

Pada 17

गरुड़-त्रास तैं जौ ह्याँ आयौ । तौ प्रभु चरन-कमल-फन-फन-प्रति, अपनैं सीस धरायौ । धनि रिषि साप दियौ खगपति कौं, ह्याँ तब रह्यौ छपाइ । प्रभु वाहन-डर भाजि बच्यौ, नातरु लेतौ खाइ । यह सुनि कृपा करी नँन-नंदन, चरन चिह्न प्रगटाए । सूरदास प्रभु अभय ताहि करि, उरग-द्वीप पहुँचाए ॥18॥

Pada 18

सहस सकट भरि कमल चलाए । अपनी समसरि और गोप जे, तिनकौ साथ पठाए । और बहुत काँवरि दधि-माखन, अहिरनि काँधै जोरि । नृप कैं हाथ पत्र यह दीजौ, बिनती कीजौ मोरि । मेरो नाम नृपति सौं लीजौ, स्याम कमल लै आए । कोटि कमल आपुन नृप माँगे, तीनि कोटि हैं पाए । नृपति हमहिं अपनौं करि जानौ, तुम लायक हम नाहिं । सूरदास कहियौ नृप आगैं, तुमहिं छाँड़ि कहँ जाहिं ॥19॥

Pada 19

गो-चारणमुरली