राधा-सखी संवाद

राधा-कृष्ण · 9 padas

घरहिं जाति मन हरष बढ़ायौ । दुख डार्‌यौ, सुख अंग भार भरि, चली लूट सौ पायौ ॥ भौंह सकोरति चलति मंद गति, नैकु बदन मुसुकायौ । तहँ इक सखी मिली राधा कौं, कहति भयौ मन भायौ । कुँज-भवन हरि-सँग बिलसि रस, मन कौ सुफल करायौ ॥ सूर सुगंध चुरावनहारौ, कैसैं दुरत दुरायौ ॥1॥

Pada 1

मोसौं कहा दुरावति राधा । कहाँ मिली नँद-नंदन कौं, जिनि पुरई मन की साधा ॥ ब्याकुल भई फिरति ही अबहीं, काम-बिथा तनु बाधा । पुलकित रोम रोम गद-गद, अब अँग अँग रूप अगाधा ॥ नहिं पावत जो रस जोगी जन, जप तप करता समाधा । सुनहुँ सूर तिहिं रस परिपूरन, दूरि कियौ तनु दाधा ॥2॥

Pada 2

स्याम कौन कारे की गोरे । कहाँ रहत काकै पै ढोटा, वृद्ध, तरुन की धौं हैं भोरे ॥ इहँई रहत कि और गाउँ कहूँ, मैं देखे नाहिं न कहू उनको । कहै नहीं समुझाइ बात यह मोहिं लगावति हौ तुम जिनकौं ॥ कहाँ रहौं मैं, वै धौं कहँकै, तुम मिलवति हो काहैं ऐसी । सुनहु सूर मोसी भोरी कौं, जोरि जोरि लावति हौ कैसी ॥3॥

Pada 3

सुनहु सखी राधा की बातैं । मौसौ कहति स्याम हैं कैसे, ऐसी मिलई घातैं ॥ की गोरे, की कारे-रँग हरि, की जोबन, की भोरे । की इहिं गाउँ बसत, की अनतहिं, दिननि बहुत की थोरे ॥ की तू कहति बात हँसि मोसौं, की बूझति सति -भाउ । सपनैं हूँ उनकौं नहिं देखे, बाके सुनहु उपाउ ॥ मोसौ कही कौन तोसी प्रिय, तोसौं बात दुरैहौं । सूर कही राधा मो आगैं, कैसें मुख दरसैहौं ॥4॥

Pada 4

राधा तेरौ बदन बिराजत नीकौ । जब तू इत-उत बंक बिलोकति, होत निसा-पति फीकौ ॥ भृकुटी धनुष, नैन सर, साँधे, सिर केसरि कौ टीकौ । मन घूँघट-पट मैं दुरि बैठ्यौ, पारधि रति-पतिही कौ ॥ गति मैमंत नाग ज्यौं नागरि, करे कहति हौं लीकौ ! सूरदास-प्रभु बिबिध भाँति करि, मन रिझायौ हरि पी कौ ॥5॥

Pada 5

काकौ काकौ मुख माई बातनि कौं गहियै ॥ पाँत की सात लगायौ, झूठी झूठी कै बनायौ, साँची जौ तनक होइ, तौलौं सब सहियै ॥ बातनि गह्यौ अकास, सुनत न आवै साँस, बोलि तौ कछु न आवै,तातैं मौन गहियै । ऐसैं कहैं नर नारि, बिना भीति चित्रकारि, काहे कों देखे मैं कान्ह कहा कहौ कहियै ॥ घर घर यहै घैर, बृथा मोसौं करै बैर यह सुनि स्रौन, हिरदय दहिए । सूरदास बरु उपहास होइ सिर मैरैं, नँद की सुवन मिलै तौ पै कहा चहियै ॥6॥

Pada 6

कैसै हैं नँद-सुवन कन्हाई । देखे नहीं नैन भरि कबहूँ, ब्रज मैं रहत सदाई ॥ सकुचति हौं इक बात कहति तोहिं, सो नहिं जाति सुनाई ॥ कैसैहुँ मोहिं दिखावहु उनकौं, यह मेरैं मन आई ॥ अतिहीं सुंदर कहियत हैं वै, मोकौं देहु बताई । सूरदास राधा की बानी, सुनत सखी भरमाई ॥7॥

Pada 7

सुनहु सखी राधा की बानी । ब्रज बसि हरि देखे नहिं कबहूँ, लोग कहत कछु अकथ कहानी ॥ यह अब कहति दिखावहु हरि कौं , देखहु री यह अचिरज मानी । जो हम सुनति रही सो नाहीं, ऐसै ही यह वायु बहानी ॥ ज्वाब न देत बनै काहू सौं, मन मैं यह काहू नहिं मानी । सूर सबै तरुनी मुख चाहतिं, चतुर चतुर सौं चतुरई ठानी ॥8॥

Pada 8

सुनि राधे तोहिं स्याम दिखैहैं । जहाँ तहाँ ब्रज-गलिनि फिरत हैं, जब इहिं मारग ऐहैं ॥ जबहीं हम उनकौ देखैंगी तबहीं तोहिं बुलैहैं । उनहूँ कै लालसा बहुत यह, तोहिं देखि सुख पैहैं ॥ दरसन तैं धीरज जब रैहै, तब हम तोहि पत्यैहैं तुमकौं देखि स्याम सुंदर घन, मुरली मधुर बजैहैं ॥ तनु त्रिभंग करि अंग-अंग सौं, नाना भाव जनैंहैं । सूरदास-प्रभु नवल कान्ह बर, पीतांबर फहरैहैं ॥9॥

Pada 9

संबंध रहस्यमाता की सीख