कृष्ण दर्शन

राधा-कृष्ण · 7 padas

राधा जल बिहरति सखियनि सँग । ग्रीव-प्रजंत नीर मै ठाढ़ी, छिरकति जल अपनैं अपनैं रंग ॥ मुख भरि नीर परसपर डारतिं, सोभा अतिहिं अनूप बढ़ी तब । मनहु चंद-मन सुधा गँडूषनि, डारति हैं आनंद भरे सब ॥ आईं निकसि जानु कटि लौं सब, अँजुरिनि तैं लै लै जल डारतिं । मानहु सूर कनक-बल्ली जुरि अमृत-बूँद पवन-मिस झारतिं ॥1॥

Pada 1

जमुना-जल बिहरति ब्रज-नारी । तट ठाढ़े देखत नँद-नंदन, मधुरि मुरलि कर धारी ॥ मोर मुकुट, स्रवननि मनि कुंडल, जलज-माल उर भ्राजत । सुंदर सुभग स्याम तन नव घन, बिच बग पाँति बिराजत ॥ उर वनमाल सुमन बहु भाँतिनि, सेत, लाल, सित,पीत । मनहु सुरसरी तट बैठे सुक, बरन बरन तजि भीत ॥ पीतांबर कटि तट छुद्रावलि, बाजति परम रसाल । सूरदास मनु कनकभूमि ढिग, बोलत रुचिर मराल ॥2॥

Pada 2

चितवनि रोकै हूँ न रही । स्याम सुंदर सिंधु-सनमुख, सरित उमंगि बही ॥ प्रेम-सलिल-प्रवाह भँवरनि, मिलि न कबहुँ लही । लोभ लहर कटाच्छ, घूँघट-पट-करार ढही ॥ थके पल पथ, नाव धीरज परति नहिंन गही । मिली सूर सुभाव स्यामहिं, फेरहू न चही ॥3॥

Pada 3

हमहिं कह्यौ हौ स्याम दिखावहु । देखहु दरस नैन भरि नीकैं, पुनि-पुनि दरस न पावहु ॥ बहुत लालसा करति रही तुम, वे तुम कारन आए । पूरी साध मिली तुम उनकौं, यातैं हमहिं भुलाए ॥ नीकैं सगुन आजु ह्याँ आईं, भयौ तुम्हारी काज । सुनहु सूर हमकौं कछु देहौ, तुमहिं मिले ब्रजराज ॥4॥

Pada 4

राधा चलहु भवनहिं जाहि । कबहिं की हम जमुन आई, कहहिं अरु पछिताहिं ॥ कियौ दरसन स्याम कौ तुम, चलौगी की नाहिं । बहुरि मिलिहौ चीन्हि राखहु, कहत, सब मुसुकाहिं ॥ हम चलीं घर तुमहुँ आवहु, सोच भयौ मन माहिं सूर राधा सहित गोपी, चलीं ब्रज-समुहाहिं ॥5॥

Pada 5

कहि राधा हरि कैसे हैं । तेरै मन भाए की नाहीं, की सुंदर, की नैसे हें ॥ की पुनि हमहिं दुराव करौगी, की कैहौ वै जैसे हैं । की हम तुमसौ कहति रहीं ज्यौं, साँच कहौ की तैसे है ॥ नटवर-वेष काछनी काछे, अंगनि रति-पति-सै से हैं । सूर स्याम तुम नीकैं देखे, हम जानत हरि ऐसे हैं ॥6॥

Pada 6

स्याम सखि नीकैं देखे नाहिं । चितवन ही लोचन भरि आए, बार-बार पछिताहिं ॥ कैसेहुँ करि इकटक मैं राखति, नैंकहिं मैं अकुलाहिं । निमिष मनौ छबि पर रखवारे , तातैं अतिहिं डराहिं ॥ कहा करै इनकौ कह दूषन,इन अपनी सी कीन्ही । सूर स्याम-छबि पर मन अटक्यौ, उन सोभा लीन्ही ॥7॥

Pada 7

माता की सीखराधा का अनुराग