उपहास

राधा-कृष्ण · 2 padas

तुम कुल बधू निलज जनि ह्वै हौ । यह करनी उनहीं कौं छाजै, उनकैं संग न जैहौ ॥ राध-कान्ह-कथा ब्रज-घर-घर, ऐसें जनि कहवैहौ । यह करनी उन नई चलाई, तुम जनि हमहिं हँसैहौ ॥ तुम हौ बड़े महर की बेटी, कुल जनि नाउँ धरैहौ । सूर स्याम राधा की महिमा, यहै जानि सरमैहौ ॥1॥

Pada 1

यह सुनि कै हँसि मौन रहीं री । ब्रज उपहास कान्ह-राधा कौ, यह महिमा जानी उनहीं री ॥ जैसी बुद्धि हृदय है इनकैं, तैसीयै मुख बात कही री । रबि कौ तेज उलूक न जानै, तरनि सदा पूरन नभहीं री ॥ विष कौ कीट बिरहिं रुचि मानै, कहा सुधा रसहीं री । सूरदास तिल-तेल-सवादी , स्वाद कहा जानै घृतहीं री ॥2॥

Pada 2

राधा का अनुरागसहसा भेंट