दोहावली

दोहावली

भाग-5 दोहा संख्या 201 से 250 तक

दोहा संख्या 241 से 250 और करै अपरधु कोउ और पाव फल भोगु। अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु।241।
241
प्रेम सरीर प्रपंच रूज उपजी अधिक उपाधि। तुलसी भली सुबैदई बेगि बाँधिऐ ब्याधि।242।
242
हम हमार आचार बड़ भूरि भार धरि सीस। हठि सठ परबस परत जिमि कीर कोस कृमि कीस।243।
243
केहिं मग प्रबिसति जाति केहिं कहु दरपनमें छाहँ। तुलसी ज्यों जगज ीव गति करी जीव के नाहँ।244।
244
सुखसागर सुख नींद बस सपने सब करतार। माया माया नाथ की को जग जाननिहार।245।
245
जीव सीव सम सुख सयन सपनें कछु करतूति। जागत दीन मलीन सोइ बिकल बिषाद बिभूति।246।
246
सपनें होइ भिखारि नृपु रंकु नाकपति होइ। जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ।247।
247
तुलसी देखत अनुभवत सुनत न समुझत नीच। चपरि चपेटे देत नित केस गहें कर मीच।248।
248
करम खरी कर मोह थल अंक चराचर जाल। हनत गुनत गनि गुनि हनत जगत ज्यौतिषी काल।249।
249
कहिबे कहँ रसना रची सुनिबे कहँ किये कान । धरिबे कहँ चित हित सहित परमारथहि सुजान।250।
250
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