कवितावली

कवितावली

भाग-2 अयोध्या काण्ड

सुन्दर बदन , सरसीरूह सुहाए नैन, मंजुल प्रसून माथें मुकुट जटनि के। अंसनि सरासन, लसत सुचि सर कर, तून कटि , मुनिपट लूटक पटनि के।। नारि सुकुमारि संग, जाके अंग उबटि कै, बिधि बिरचैं बरूथ बिद्युतछटनि के।। गोरेको बरनु देखें सोनो न सलोनेा लागै, साँवरे बिलोकें गर्ब घटत धटनि के।16। बलकल-बसन, धनु-बान पानि, तून कटि, रूपके निधान घन-दामिनी-बरन हैं। तुलसी सुतीय संग, सहज सुहाए अंग, नवल कँवलहू तें केामल चरत हैं।। औरै सो बसंतु, और रति, औरै रतिपति, मूरति बिलोकें तन-मनके हरन हैं। तापस बेषै बनाइ पथिक पथें सुहाइ, चले लोकलोचननि सुफल करन हैं।17। बनिता बनी स्यामल गौर के बीच , बिलोकहु, री सखि! मोहि-सी ह्वै। मनुजोगु न कोमल, क्यों चलिहै, सकुचाति मही पदपंकज छ्वै।। तुलसी सुनि ग्रामबधू बिथकीं, पुलकीं तन, औ चले लोचन च्वै। सब भाँति मनोहर मोहनरूप, अनूप हैं भूपके बालक द्वै।18। साँवरे-गोरे सलेाने सुभायँ, मनोहरताँ जिति मैनु लियो है। बान-कमान, निषंग कसें, सिर सोहैं जटा, मुनिबेषु कियेा है।। संग लिएँ बिधुबैनी बधू, रतिको जेहि रंचक रूप दियो है। पायन तौ पनहीं न , पयादेहिं क्यों चलिहैं, सकुचात हियो है।19। रानी मैं जानी अयानी महा, पबि-पाहनहू तें कठोर हियो है। राजहुँ काजु अकाजु न जान्यो, कह्यो तियको जेहिं कान कियो है।। ऐसी मनेाहर मूरति ए, बिछुरें कैसे प्रीतम लोगु जियो है। आँखिनमें सखि! राखिबे जोगु , इन्हैं किमि कै बनबासु दियो है।20।
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