शिव स्तुति

विनय पत्रिका

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विनय पत्रिका शिव-स्तुति को जाँचिये संभु तजि आन. दीनदयालु भगत-आरति-हर, सब प्रकार समरथ भगवान..१.. कालकूट-जुर जरत सुरासुर, निज पन लागि किये बिष पान. दारुन दनुज. जगत-दुखदायक, मारेउ त्रिपुर एक ही बान..२.. जो गति अगम महामुनि दुर्लभ, कहत संत, श्रुति, सकल पुरान. सो गति मरन-काल अपने पुर, देत सदासिव सबहिं समान..३.. सेवत सुलभ, उदार कलपतरु, पारबती-पति परम सुजान. देहु काम-रिपु राम-चरन-रति, तुलसिदास कहँ क्रिपानिधान..४.. (2) बावरो रावरो नाह भवानी। दानि बडो दिन दये बिनु, बेद-बड़ाई भानी।1। निज घरकी बरबात बिलाकहु, हौ तुम परम सयानी। सिवकी दई संपदा देखत, श्री-सारदा सिहानी।। जिनके भाल लिखी लिपि मेरी, सुखकी नहीं निसानी। तिन रंकनकौ नाक सँवारत, हौं आयो नकबानी।। दुख-दीनता दुखी इनके दुख, जाचकता अकुलानी। यह अधिकार सौंपिये औरहिं, भाीख भली मैं जानी।। प्रेम-प्रसंसा-बिनय-ब्यंगजुत, सुति बिधिकी बर बानी।। तुलसी मुदित महेस मनहिं मन, जगतु-मातु मुसकानी।।
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