विनयावली(प्रथम पद),

विनय पत्रिका

मुख्य

विनयावली ऐसेहू साहब की सेवा सों होत चोरू रे। अपनी न बूझ, न कहै को राँडरोरू रे।। मुनि-मन-अगम, सुगत माइ-बापु सों। कृपासिंधु, सहज सखा, सनेही आपु सों।। लोक-बेद-बिदित बड़ो न रघुनाथ सों । सब दिन सब देस, सबहिकें साथ सों।। स्वामी सरबग्य सों चलै न चोरी चारकी। प्रीति पहिचानि यह रीति दरबारकी।। काय न कलेस-लेस, लेत मान मनकी। सुमिरे सकुचि रूचि जोगवत जनकी । रीझे बस होत, खीजे देत निज धाम रे। फलत सकल फल कामतरू नाम रे।। बेंचे खोटो दाम न मिलै, न राखे काम रे। सोऊ तुलसी निवाज्यो राजराम रे।। म्ेारो भलो कियो राम आपनी भलाई। हौं तो साईं-द्रोही पै सेवक-हित साईं।। रामसों बडो है कौन, मोसों कौन छोटेा। राम सेा खरो हैं कौन, मोसो कौन खोटो।। लोक कहै रामको गुलाम हौं कहावौं। एतो बडो अपराध भौ न मन बावौं।। पाथ माथे चढ़े तृन तुलसी ज्यांे नीचो। बोरत न बारि ताहि जानि आपु सींचो।।
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