विनयावली(राग जैतश्री )

विनय पत्रिका

मुख्य

विनयावली(राग जैतश्री) (83) कछु ह्वै न आई गयो जनम जाय। अति दुरलभ तनु पाइ कपट तजि भजे राम मन बचन-काय।। लरिकाईं बीती अचेत चित, चंचलता चौगुने चाय। जोबन-जुर जुबती कुपथ्य करि, भयो त्रिदोष भरि मदन-बाय।। मध्य बसस धन हेेतु गँवाई, कृषी बनिज नाना उपाय। राम-बिमुख सुख लह्यो न सपनेहुँ, निसिबासर तयौ तिहूँ ताय।। सेये नहिं सीतापति-सेवक, साधु सुमति भलि भगति भाय। सुने न पुलकि तनु, कहे न मुदित मन किये जे चरित रघुबंसराय।। अब सोचत मनि बिनु भुअंग ज्यों, बिकल अंग दले जरा धाय। सिर धुनि-धुनि पछितात मींजि कर कोउ न मीत हित दुसह दाय।। जिन्ह लगि निज परलोक बिगार्यो, ते लजात होत ठाढ़े ठाँय। तुलसी अजहुँ सुमिरि रघुनाथहिं, तर्यौ गयँद जाके एक नाँय।।
1
Section 1 · 28Section 1 · 30