नेहिन की गति जानत भाखी
Ashtayam Prathama — श्री किशोरी अलि
Verse 1 of 1
नेहिन की गति जानत भाखी।
ज्यों गंगा बिच पर्यौ पपीहा, स्वाति-बूँद बिन और न चाखी॥ [1]
जल बिन मीन, पलक नहिं जीवै, जो कोउ चाहौ पय में राखी।
चंद्र चन्द्रिका बिन नहीं निरखत, प्रगट चकोर जगत में साखी॥ [2]
श्रीवन तजि त्यौं चैन न पावैं, रसिकन लोभ दिखावौ लाखी।
‘अली किशोरी’ पिय गोरी हित, प्रेम विवस मरजादा नाखी॥ [3]
- श्री किशोरी अलि जी, अष्टयाम प्रथम (36)
नहीं, मैं गति नहीं जानता. जैसे गंगा के बीच में पपीता नहीं, पिए बिना स्वाति की बूंद नहीं... [1] मिन के बिना जल नहीं, जीवन में पलक नहीं, जो चाहे नर। चांद के बिना चांद नहीं लिखा जा सकता, दुनिया दिखती है और दुनिया मेरी दोस्त है.. [2] श्रीवन, तुम्हें शांति नहीं मिलती, तुम अपना लालच दिखाने के लिए लिखते हो। 'अली किशोरी' पिया गोरी हित, प्रेम विवास मरजादा नखी.. [3] - श्री किशोरी अली जी, अष्टयाम प्रथम (36)