वृन्दाविपिन प्रणाम करि

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 170 of 268

देह स्वाद छुटि जाहिं सब, कछु होइ छीन सरीर। प्रेम रंग उर में बढ़े, बिहरै जमुना तीर॥ - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (90) जहां भी शरीर का स्वाद खो जाता है, वहां शरीर छिन जाता है। हृदय में प्रेम का रंग बढ़े, बिहारै जमुना तीर.. - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, वृन्दावन शत लीला (90)
आज सखि निरख रूप भरि नैनआज सखि निरख रूप भरि नैन