आज सखि निरख रूप भरि नैन
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 189 of 268
(राग विहागरौ)
अवधि प्रेम की दोऊ प्यारे।
तन-मन-नैंन रहे एकै है, कबहूँ होत न न्यारे॥ [1]
रुचि-रुचि सौं रचि रहे दोउ जन, ज्यौं नैननि के तारे।
'हित ध्रुव' रीझि परस्पर छवि पर, तन-मन देत हैं वारे॥ [2]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (101)
(राग विहागरौ) अवधी प्रेमी युगल प्रिया। तन, मन और आंखें एक ही रहें, कभी अलग न हों.. [1] रुचि और रुचि नानी के सितारों की तरह स्थिर रहें। 'हित ध्रुव' पारस्परिक छवि पर केंद्रित है, शरीर और मन देता है.. [2] - श्री हित ध्रुवदास, बयालिस लीला, पद्यावली (101)