(सुरत केलि)
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 74 of 268
(सुरत केलि)
केलि करैं सुकुमारी-बिहारी, बढ़ी छबि भारी कही नहिं जाई। [1]
लालची लाल रँगे रस-बाल, बिलोकि रहे 'ध्रुव' सुंदरताई॥ [2]
पीवत नैंन कटाक्षनि माधुरी , कौतुक एक न कैंहूँ अघाई। [3]
सो हित हेरि लुभाइ रह्यौ, रुचि कौं रुचि देखिकै आप लजाई॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत (3.3)
(सूरत केली) केली करे सुकुमारी-बिहारी, बधाई हो, भावी छवि कहीं नहीं जाएगी। [1] लोभी लाल रंग, रस शक्ति, बिलोखी रहे 'ध्रुव' सौंदर्य.. [2] कतर नयन कात्शानि माधुरी, कौतुक एक कहिन अघाई। [4]