प्रथम दरस गोविंद रूप के प्रानपियारे
Bhagvat Rasik Extras — श्री भगवत रसिक
Verse 2 of 2
(छप्पय)
प्रथम सुने भागवत, भक्त मुख भगवत वाणी। [1]
द्वितीय अराधे भक्ति, व्यास नव भांति बखानी॥ [2]
तृतीय करे गुरु समुझी, दक्ष सर्वज्ञ रसीलो। [3]
चौथे होई विरक्त, बसे वनराज जसि॥ [4]
पांचे भूले देह सुध, छठी भावना रास की। [5]
सातै पावे रीति रस श्री स्वामी हरिदास की॥ [6]
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (36)
(छप्पय) सबसे पहले भक्त के मुख से भागवत, भागवत वाणी सुनें। [1] द्वितीया अराधे भक्ति, व्यास नव भांति बखानी।।[2] तृतीया करे गुरु समुझि, दक्ष सर्वज्ञ रसिलो। [3] चौथा विरक्त हो जाता है, जंगल के राजा की तरह रहता है.. [4] पांचवां शरीर का भान भूल जाता है, छठा सुख का अनुभव करता है। [5] श्री स्वामी हरिदास के सतै पवे रीति रस.. [6] - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चतम ग्रंथ - स्वर्गीय (36) सबसे पहले किसी भगवत भक्त के मुख से श्रीमद्भागवत, श्रीभागवत गीता, सत्शास्त्र आदि का श्रवण करें। [1]