युगल नाम सौं नेम, जपत नित कुंजबिहारी
Bhaktamala —
Verse 2 of 2
(छप्पय)
जुगल नाम सौं नेम, जपत नित कुंजबिहारी।
अवलोकत रहैं केलि, सखी सुख के अधिकारी॥ [1]
गान कला गन्धर्व, श्याम श्यामा कौं तोषैं।
उत्तम भोग लगाय, मोर मरकट तिमि पोषैं॥ [2]
नृपति द्वार ठाड़े रहैं, दरसन आसा जास की।
(श्री) आसुधीर उद्योतकर, रसिक छाप हरिदास की॥ [3]
- श्री नाभादास जी, भक्तमाल (91)
(छप्पया) जुगल नाम सौं नेम, जपत नित कुंजबिहारी। हे सुख के पात्र मित्र, सावधान हो जाओ। [1] गण कला गंधर्व, श्याम श्याम कौन तोषैं। सर्वोत्तम, मोर और पन्ना पोषण का आनंद लें। [2] द्वार पर खड़े नृपति मानो देख रहे हों। (श्री) असुधीर उद्योतकर, रसिक छाप हरिदास की.. [3] - श्री नाभादास जी, भक्तमाल (91)