अहो मधु-पुरी धन्या

Bhakti Rasamrit Sindhu — श्री रूप गोस्वामी

Verse 7 of 8

तट-भुवि कृत-कान्तिः श्यामला यास् तटिन्याः स्फुटित-नव-कदम्बालम्बि-कूजद्-द्विरेफा। निरवधि-मधुरिम्णा मण्डितेयं कथं मे मनसि कम् अपि भावं कानन-श्रीस् तनोति॥ - श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.243) तत्-भुवि कृत-कान्तिः श्यामला यस ततिन्यः स्फुटित-नव-कदम्बलम्बि-कुजद-द्विरेफ़ाः। निर्वधि-मधुरीम्ना मंदितेन कथा में मानसी काम अपि भवन कानन-श्री तनोति.. - श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.243)
अहो मधु-पुरी धन्याअहो मधु-पुरी धन्या