कीच लगी ब्रज खिरक की
Braj Ke Dohe — ब्रज के दोहे
Verse 138 of 229
नहिं ब्रह्म सों काम कछु हमको, वैकुंठ की राह न जावनी है।
ब्रज की रज में रज ह्वै के मिलूँ, यही प्रीति की रीति निभावनी है॥
- ब्रज के दोहे
नहीं, ब्रह्मा के पुत्र, मैं सेक्स नहीं जानता, यौवन वैकुंठ का मार्ग नहीं है। ब्रज की रज में रज और हवाई का मिलन, यही है प्रेम का पथ.. -ब्रज के दोहे