राधे मेरे प्रान अधार
Jugal Rahasy Siddhanta — श्री रूप मंजरी
Verse 1 of 1
राधे मेरे प्रान अधार।
काहू कैं जीवनि काइ की, मेरैं तो तू ही निरधार॥ [1]
जुगल दरस की प्रीति रहौ नित, और न कोउ विचार।
वेद भागवत स्मृति सबनि में, रूपमंजरी है इह सार॥ [2]
- श्री रूप मंजरी, जुगल रहस्य सिद्धांत (150)
मेरे जीवन का आधार है राधे। क्यों है कोई प्यार, तुम मेरे हो, तुम बेबुनियाद हो.. [1] जुगल दरस से नित प्यार करो, और कुछ न सोचो। वेद भागवत स्मृति सब मन है, रूपमंजरी उसका सार है.. [2] - श्री रूपमंजरी, जुगल रहस्य सिद्धांत (150)