ऐसैं बसिऐ ब्रज की बीथिनि
Kelimal — स्वामी श्री हरिदास
Verse 46 of 69
(राग सारंग)
डोल झूलत बिहारी बिहारिनि पुहुप वृष्टि होति।
सुर पुर पुर गंधर्व और पुर
तिनकी नारि देखति बारति लर मोति॥ [1]
घेरा करति परस्पर सब मिलि
कहूँ न देखी ऐसी जुवती जोति।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारिनि
सादा चुरी खुभी पोति॥ [2]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (75)
(राग सारंगा) डोल झूलत बिहारी बिहारिणी पुहुप वृष्टि होति। सुरपुर गंधर्व और पुर टिंकी की स्त्रियाँ मोतियों की माला टपकाते हुए बारात को देख रही हैं। [1] कैसे कह दूं कि एक-दूसरे का चक्कर लगाकर ऐसी नई रोशनी न देखूं। स्वामी श्यामा कुंजबिहारिणी सदा चूरी खूबी श्री हरिदास की पोती.. [2] - ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमल (75)