परसाद विहारिनि रानी कौ

Lalit Kishori Vani — श्री ललित किशोरी देव

Verse 10 of 35

लडैती तेरी रीति महा सुखदाई। जब तें धरी हिये में दृढ करि आनँद उर न समाई॥ [1] कहाँ कहाँ लौं नित्य किसोरी तेरी कृपा कही नहिं जाई। श्री हरिदासी रसिक सिरोंमनि हँसि हँसि कंठ लगाई॥ [2] - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (154) आपकी लड़ने की शैली बहुत अच्छी है. जब मैं तुम्हें पकड़ता हूं, तो मेरा दिल दुखता है और मेरी खुशी समाहित नहीं होती है... [1] मैं कहां जाऊं नित्य किशोरी, आपकी कृपा कहीं नहीं मिलती। श्री हरिदासी रसिक सिरोनमणि हंसि हंसि कंठ लागै.. [2] - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत पद (154)
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