जो मारग खोजत फिरत अजहूँ शेष महेश

Rasik Anany Parachavali — श्री चाचा हित वृंदावनदास

Verse 1 of 1

जो मारग खोजत फिरत, अजहूँ शेष महेश। सो दुर्लभ भूतल कियौ, जै जै रसिक नरेश॥ - चाचा वृन्‍दावनदासजी, रसिक अनन्य परचावली (32) मौत की तलाश में निकला महेश अकेला रह गया है। सो दुर्लभ सतह, जय जय रसिक नरेश.. - चाचा वृन्दावन दासजी, रसिक एवं अन्य परचावली (32)