धनि धनि वृंदावन के बासी

Rasik Mahima — श्री किशोरी अलि

Verse 1 of 1

(राग सारंग) धनि धनि वृंदावन के बासी। जिनकी करत प्रसंसा सुक मुनि, उद्धव बिधि कमलासी॥ [1] आन देव की संक न मानत, संतत जुगल-उपासी। बैकुंठहु की रुचै न संपति, कब मन आवै कासी॥ [2] श्रीजमुना-जल रुचि सों अचवत, मुक्ति भई तहाँ दासी। अष्ट-सिद्धि नव-निधि कर जोरे, जिनकी करत खवासी॥ [3] जिनकै दरस-परस रस उपजत, हियै बसत रस-रासी। श्री बंसी अंलि कृपा किसोरी, कछु इक महिमा भासी॥ [4] - श्री किशोरी अलि, रसिक महिमा (6) (राग सारंगा) धनि धनि वृन्दावन की बासी। जिनके कर्मों से शुक मुनि प्रसन्न होते हैं,उद्धव बिधि कमलासी। [1] अन देव नाग और मानत, संतत जुगला-उपासी। वैकुण्ठहु सनापति नहीं, काशी की याद कब आती है? [2] श्री जमुना-जल अछवत के पुत्र हैं, मुक्ति भाई वहाँ की दासी हैं। अष्ट-सिद्धि नव-निधि कर जोरे, जिनकी करि खवासी.. [3] जिनके दरसा-पारस रस उपजे, हिया बसत रस-रासी। श्री बंसी अनलि कृपा किशोरी, कछू एक महिमा भासी.. [4] - श्री किशोरी अली, रसिक महिमा (6)