रटो रे मन! छिन छिन श्यामा श्याम
Siddhant Madhuri — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
Verse 1 of 1
रटो रे मन! छिन छिन श्यामा श्याम।
सद्घन चिद्घन आनंदघन जो, रूप एक द्वै नाम। [1]
जासु नाम शिव शुक सनकादिक, गावत आठों याम।
जाकी लीला लखन ज्ञानिजन, बने विटप ब्रजधाम। [2]
जासु धाम विधि ब्रज-रज याचत, ठड़े एक ही पाम।
जिन ‘कृपालु’ गुन सुनि शुक से मुनि, तजत समाधि ललाम॥ [3]
-जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी [88]
एक मिनट रुको दोस्त! श्याम-श्याम, श्याम-श्याम. सद्घं चिदघं आनंदघं जो, रूप एक द्वै नमः। [1] जासु नाम शिव शुक सनकादिक, गावत आठों यम। जाकी लीला लखन ज्ञानीजन, बने विटप ब्रजधाम। [2] जासु धाम विधि ब्रज-रज याचत, ठाढ़े एक पैम। जिन 'कृपालु' गुन सुनि शुक से मुनि, तजत समाधि ललाम.. [3] -जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी [88]