नाहिं मोहि साधन आराधन सुख तीन लोक

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Verse 14 of 14

(कवित्त) नाहिं मोहि साधन आराधन सुख तीन लोक, नाहिं मोहि लीन रवन संपति रजधानी कौ। [1] नाहिं मोहि चाहन अवगाहन जस आन-आन, नाहिं मोहि बानि दरस परस खान पानी कौ॥ [2] (हित) कृष्णदास जोपै प्रभु सींवा तजि बाहिर होंइ, तऊ हौं न जाऊँ यहै साँची मन मानी कौ। [3] रहौं कुंज-द्वार दोऊ खेलत सुकुमार जहाँ, झलमलात वृन्दावन वृन्दावनरानी कौ॥ [4] - श्री हित कृष्णदास जी, श्री हित कृष्णदास जी भावुक की वाणी, श्री वृंदावनष्टक (8) (कविता) तीनों लोकों में पूजा और सुख के साधनों का कोई आकर्षण नहीं है, रावण को राजधानी का कोई आकर्षण नहीं है। [1] नहिं मोहि चाहन अवगहन जस आना-अन, नहिं मोहि बनि दरस पारस खान पानी कोउ.. [2] (हिता) कृष्णदास जोपै सींवा प्रभु तजि बहार होनि, तो हौं न जाउ है सांची मन मनि कोउ। [3] रहौं कुंजा-द्वार युगल खेलत सुकुमार जहां, झालामलात वृन्दावन वृन्दावनरानी कौ.. [4] - श्री हित कृष्णदास जी, श्री हित कृष्णदास जी भावुक की वाणी, श्री वृन्दावनष्टक (8)
कदंबारूढं या निजपतिमजानंत्यहनि