यदैव सच्चिद्रसरूप
Vrindavan Mahimamrita — श्री प्रबोधानन्द सरस्वती
Verse 112 of 124
मिलन्ति चिन्तामणि कोटि कोटयः स्वयं बहिर्दुष्टि मुपैति वा हरिः।
तथापि वृन्दावन धूलिधूसरं न हेदमन्यत्र कदापि यातु मे॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (17.23)
मिलन्ति चिंतामणि कोटि कोटायः स्वयं बहिर्दुष्टि मुपैति वै हरियः। हालाँकि, वृन्दावन धूलिधूशरण या हेदमन्यायात्रा इस स्थान पर कभी नहीं होगी.. - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (17.23)