यदैव सच्चिद्रसरूप

Vrindavan Mahimamrita — श्री प्रबोधानन्द सरस्वती

Verse 12 of 124

राधापदाम्बुजरस-महामाधुरीमत्त-चेतो भृंगो निर्भंगुरपरिमिल्लोक-वेद प्रसंगः। कंचिद्भावमधुरमधुरं भावयन् विश्वचेतो दृष्ट्याकृष्ट्याकृतिरपि भावयत्र वृन्दावने किम्॥ - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (9.04) राधापदम्बुजरसा-महामाधुरीमत्त-चेतो भृंगो निर्भंगुरपरिमिलोका-वेद प्रश्न। कांचीद्भव मधुरमधुर्न भावयम विश्वचेतो विश्वकृति भावयात्रा वृन्दावन कि.मी.. - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (9.04)
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