यदैव सच्चिद्रसरूप
Vrindavan Mahimamrita — श्री प्रबोधानन्द सरस्वती
Verse 17 of 124
न कुरु न वद किञ्चद् विस्मराशेषदृश्यं स्मर मिथुनमहस्तद् गौरनीलं स्मरार्त्तम्।
बहुजन समवायाद् दूरमुद्विज्य याहि प्रिय निवसतु दिव्यश्रीलवृन्दावनान्तः॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.32)
न कुरु न वद किंचद् विसर्मशेषादृष्यं स्म्र मिथुनमहस्तद् गोरानिलं स्मरत्तम्। बहुजन समवयेद दुर्मुद्विज्य याहि प्रिय निवासतु दिव्यश्रीलावरिन्दवनन्त। - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.32)