यदैव सच्चिद्रसरूप

Vrindavan Mahimamrita — श्री प्रबोधानन्द सरस्वती

Verse 37 of 124

जन्मनि जन्मनि वृन्दावन भुवि वृन्दारकेन्द्र वन्द्यायां। अपि तृण गुल्मक भावे भवतु ममाशासमुल्लासम्॥ - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (17.9) जन्मनि जन्मनि वृन्दावन भुवि वृन्दकेन्द्र वन्द्यायन। अपि त्रिन गुल्मक भवे भवतु ममशासमुल्लासम्। - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (17.9) देवेन्द्र भी भजते हैं, ऐसी है श्री वृन्दावन की भूमि, मैं मनुष्य के रूप में जन्मा हूँ, मैं मनुष्य के रूप में जन्मा हूँ, मनुष्य के रूप में जन्म लेने का भाव मेरे मन में बना रहे।
यदैव सच्चिद्रसरूपयदैव सच्चिद्रसरूप