यदैव सच्चिद्रसरूप
Vrindavan Mahimamrita — श्री प्रबोधानन्द सरस्वती
Verse 51 of 124
इह न सुखं न सुखमरे क्वापि वृथा न पत मोहजालेऽस्मिन्।
अनुदिनं परमानन्दवृन्दावनं हि समाश्रयाद्यैव॥
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (3.58)
इह न सुखन सुखन सुखमरे कुप्पी वृथा न पत् मोहजलेऽस्मिन। नित्यानंदमय वृन्दावन हि समाश्रयाद्यैव। - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (3.58)