यदैव सच्चिद्रसरूप
Vrindavan Mahimamrita — श्री प्रबोधानन्द सरस्वती
Verse 93 of 124
श्रीवृन्दावनवत्तिरनि यत्र क्वचनापि सापराधस्य।
राधाकृष्णद्रोहिण उरुतरनरकात कदापि नोद्धार:॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (10.12)
श्रीवृंदावन्वत्तिराणी यत्र क्वचनापि सप्रदस्य। राधाकृष्णद्रोहिन उत्तरानारकात कदापि नोधारा:.. - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (10.12)