यदैव सच्चिद्रसरूप
Vrindavan Mahimamrita — श्री प्रबोधानन्द सरस्वती
Verse 98 of 124
रे मूढ़ गूढ़मखिलोपनिषत् स्वगाढ़- प्रेन्मावगाढ़मखिलार्थ शिरोऽधिरूढ़म्।
आनन्दसिन्धु मन पाश्रय दीनबन्धुं वृन्दावनं व्रज हठौत् कलितात्मबन्धः॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (12.62)
अरे मूर्ख गूढ़वेत्ता, स्वग्धा- प्रेणम्वगधम्खिलार्थ शिरोधिरुढम्। आनंदसिन्धु मन पश्रय दीनबन्धुम वृन्दावन व्रज हतौत कलितात्मबन्ध.. - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (12.62)