कहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँ
Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास
Verse 110 of 139
(राग सारंग)
जौ पै (श्री) वृन्दावन धन भावै।
तौ कत स्वारथ परमारथ लगि मूढ़ मनहि दौरावै॥ [1]
नव निधि अष्ट सिधि वनवैभव, स्वपनैं अंत न पावै।
घर घर भटकत मुक्ति वापुरी, कमलहिं को बतरावै॥ [2]
महा पतित पावन जमुना जल, भूतल ताप नसावै।
नव निकुंज रति पुंजनि वरषत हरषि राधे गुन गावै॥ [3]
सदा अधीन रहत नित मोहन मन लै प्रियहि रिझावै।
व्यास स्वामिनी रास-मंडलमें चुटकिनि पियहिं नचावै॥ [4]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (221)
(राग सारंग) जौ पै (श्री) वृन्दावन धन भवै। इसलिए मूर्ख स्वार्थ के लिए नहीं भटकता। [1] नये खजाने का अंत नहीं, आठ सिद्धियाँ, एक वैभव, स्वप्न समान। मुक्ति वापुरी घर-घर घूमती है, कमल के फूल बिखरते हैं.. [2] जमुना का पवित्र जल अति अशुद्ध है, भूतल का जल तप से भरा है। नव निकुंज रति पुंजनि वरश, हरषि राधे गुण गाती है। [3] सदा वश में रहो, सदा मोहन को मन में बसाओ और मुझे प्रसन्न करो। व्यास स्वामिनी रस-मंडलमेन चुटकिनी पियाहिं नाचवै। [4] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (221)