Kaanda 20, Sukta 134
खिलानि । इ॒हेत्थ प्रागपा॒गुद॑ग॒धरा॒ग् – अरा॑ला॒गुद॑भर्त्सथ ॥१॥ इ॒हेत्थ प्रागपा॒गुद॑ग॒धराग् – व॒त्साः पुरु॑षन्त आसते ॥२॥ इ॒हेत्थ प्रागपा॒गुद॑ग॒धराग् – स्थाली॑पाको॒ वि ली॑यते ॥३॥ इ॒हेत्थ प्रागपा॒गुद॑ग॒धराग् – स वै॑ पृ॒थु ली॑यते ॥४॥ इ॒हेत्थ प्रागपा॒गुद॑ग॒धराग् – आष्टे॑ लाहणि॒ लीशा॑थी ॥५॥ इ॒हेत्थ प्रागपा॒गुद॑ग॒धराग् – अक्ष्लि॑ली॒ पुच्छिली॑यते ॥६॥