आज वृंदाविपिन कुंज अद्भुत नई

नंददास

Pada 2

(राग सारंग) आज वृंदाविपिन कुंज अद्भुत नई । परम सीतल सुखद स्याम सोभित तहाँ, माधुरी मधुर और पीत फूलन छई ॥ विविध कदली खंभ, झूमका झुक रहे, मधुप गुंजार, सुर कोकिला धुनि ठई । तहाँ राजत श्री वृषभान की लाड़िली, मनों हो घनस्याम ढिंग उलही सोभा नई ॥ तरनि-तनया-तीर धीर समीर जहाँ, सुनत ब्रजबधू अति होय हरषित मई । ’नंददास’ निनाथ और छवि को कहै, निरखि सोभा नैन पंगु गति ह्वै गई ॥
छोटो सो कन्हैया एक मुरली मधुर छोटीतपन लाग्यौ घाम, परत अति धूप भैया